हरियाणा विधानसभा चुनाव -2024 में बीजेपी क्यों जीती और कांग्रेस क्यों हारी?

हरियाणा विधानसभा चुनाव -2024 में बीजेपी क्यों जीती और कांग्रेस क्यों हारी?
October 13 15:10 2024

पीपी कपूर
जनता के बुनियादी सवालों और मुद्दों का कोई हल इन सामंती पूंजीवादी राजनैतिक दलों, नेताओं के पास नहीं है, जहां टिकटों के वितरण व जीत हार का प्रमुख आधार जातीय समीकरण हों, जातिवाद, धर्म और राष्ट्रवाद जैसे फर्जी मुद्दे जब चुनाव में सभी पार्टियों व आज़ाद कैंडिडेट के लिये चुनाव जीतने का मुख्य आधार हो, जनता की राजनैतिक चेतना शून्य हो, तो इस हालात में बीजेपी का साम, दाम, दंड, भेद युक्त नफऱत भरा व विभाजनकारी कुशल इलेक्शन मैनेजमेंट बीजेपी की जीत और कांग्रेस का ओवर कॉन्फिडेन्स कांग्रेस की हार का मुख्य कारण बने। बीजेपी सरकार के खिलाफ जनता के भारी गुस्से को योजनाबद्ध ढंग से कांग्रेस कैश करने में बुरी तरह विफल रही।
भारी जन आक्रोश : हरियाणा की बीजेपी सरकार के खिलाफ जनता में इतना भारी गुस्सा था कि ग्यारह में से नौ मंत्री चुनाव हार गये और अनिल विज जैसे कथित दबंग मंत्री चुनाव हारते-हारते जीते भी तो बड़ी मुश्किल से मामूली अंतर से जीत पाए। इतना ही नहीं पिछले पांंच वर्ष तक बीजेपी के साथ सत्ता में रही जन नायक जनता पार्टी (जेजेपी) के सभी उम्मीदवारों सहित डिप्टी सीएम दुष्यन्त चौटाला की भी जमानत जब्त हो गई, सूपड़ा साफ हों गया। लेकिन बीजेपी के खिलाफ इतने भारी जन आक्रोश को कांग्रेस संभाल नहीं सकी।

बीजेपी को इतनी ज्यादा सीटें तो वर्ष 2014, 2019 की मोदी लहर में भी नहीं मिलींं। यहां तक कि 25 मई 2024 को हुए लोकसभा चुनाव में भी इतने वोट नहीं मिले थे, तब भी दस में से पांच लोकसभा सीटें बीजेपी हार गई थी। लेकिन अब 2024 के विधान सभा चुनाव में बीजेपी का वोट और सीटें बढ़ गई। जबकि जनता के सभी हिस्सों में भारी गुस्सा सरकार के खिलाफ था। भाजपा ने इस जन आक्रोश पर कुशल चुनावी मैनेजमेंट के जरिये चमत्कारी जीत हासिल की।

मास्टर स्ट्रोक : बीजेपी ने अपने कमज़ोर हालात और जनता के गुस्से को भांंपते हुए साढ़े नौ साल तक सीएम रहे मनोहर लाल खट्टर को हटा कर नायब सिंह सैनी को सीएम बना दिया, जोकि वर्ष 2015 से प्रदेश में जारी बीजेपी की फूट परस्त और जात-पात की “जाट बनाम गैर जाट” की राजनीति में मास्टर स्ट्रोक साबित हुआ। पिछड़े वर्ग से संबंधित नायब सिंह सैनी को सीएम बनाते ही भाजपा ने जोर-शोर से पिछड़े वर्ग को सीएम बनाने का ढोल पीटना शुरु कर दिया। इससे अंदर खाते पिछड़ा वर्ग भाजपा से जुड़ गया और उसकी जीत में एक बड़ा फैक्टर रहा। बीजेपी के पक्ष में एकाएक बने इस इस अंडर करंट को कोई पकड़ नहीं पाया। यह वोटर साइलेंट रहा। जबकि कांग्रेस का वोट वोकल था। इसलिए रिजल्ट आने पर तमाम मीडिया और चुनावी पंडितों के सभी अनुमान और दावे गलत साबित हुए।

क्योंकि भाजपा ने पहले ही हरियाणा में वर्ष 2014 में मोदी लहर से सत्ता में आते ही फूट डालो, राज करो की फूट परस्त नीति चला कर हरियाणा में जाट बनाम गैर जाट के मुद्दे पर समाज में नफऱत फैला कर अपना स्थाई वोट बैंक तैयार कर लिया था। पिछले दस साल तक सरकार के स्तर पर व आरएसएस, बीजेपी के आईटी सेल की ओर से लगातार इस “जाट बनाम गैर जाट” व “मुसलमानों से हिन्दुओं को खतरा” के विभाजनकारी व नफरती उन्माद के नेरेटिव को जोर शोर से जारी रखा गया। कांग्रेस को मुस्लिम समर्थक और खुद को हिंदु रक्षक पार्टी होने का नैरेटिव चलाया गया। भाजपा ने इसी नफरती नीति को मौजूदा विधानसभा चुनावों में भी खूब उभार कर कैश किया और उसे भारी लाभ मिला।

माइक्रो मैनेजमेंट : बीजेपी ने एक-एक सीट का टिकट वितरण गंभीरतापूर्वक किया और चुनाव में माइक्रो मैनेजमेंट के तहत सिर्फ जीतने योग्य उम्मीदवार उतारे। कई सिटिंग एमएलए (जिनसे पब्लिक नाराज़ थी) की टिकटें काट कर नए उम्मीदवार उतारे ताकि जनता के गुस्से से बच पाएं। यह नीति भी सफल रही और इस तरह करीब 15 नए चेहरे भी भाजपा विधायक बन गये। कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया।

जबरदस्त फील्डिंग : केंद्रीय भाजपा नेतृत्व ने जबरदस्त फील्डिंग लगाते हुए प्रदेश में सत्ता विरोधी वोटों को बांटने के लिये जातीय समीकरणों के हिसाब से धनबल वाले निर्दलीयों को भी मैदान में खड़ा करवाया व फंडिंग की गई, ताकि विरोधी वोटों के बटवारे से भाजपा के उम्मीदवार यहांँ आराम से सीट निकाल सके। कांग्रेस से भाजपा का सीधा मुकाबला न होने पाए। जहां भाजपा को अपने बागियों से नुकसान हों सकता था तो वहांँ उनको मना कर बैठा दिया। इसी कारण सिर्फ एक परसेंट से भी कम वोट परसेंट का अंतर होने के बावजूद बीजेपी की सीटें पहले से भी बढ़ गईं और उसने अपने तौर पर बहुमत पा कर चमत्कार का दिया।

कांग्रेस की हालत : दूसरी ओर गुटबाज़ी के कारण कांग्रेस कई दशकों से अपना संगठन तक नहीं बना सकी। पिछले कई वर्षो से हरियाणा में कांग्रेस का मतलब है भूपेंद्र सिंह हुड़्डा, जो कि जाट जाति से हैं। कांग्रेस की टिकट वितरण में हुड़्डा की मनमानी चली और उसने सीट जीतने की योग्यता के बजाए अपने चहेतों, वफादारों को टिकट यह सोच कर दिलवाई कि सरकार के खिलाफ भारी जऩाक्रोश के कारण सभी जीत जाएंगे और वही सीएम बनेगा। कुछ कांग्रेस उम्मीदवारों के सरकारी नौकरियों बारे मेें उलटे सीधे बयान भी घातक साबित हुए, युवाओं में नौकरियों की बंदरबांट बारे शक उपजा। पिछले दस वर्षो तक कांग्रेस पार्टी ने विपक्ष में रहने के दौरान जनता के सवालों पर कोई जन आंदोलन नहीं किये न ही सक्रिय दिखी। दूसरी ओर भाजपा ने गैर जाट जातियों को खुले तौर पर और जाटों के कुछ हिस्से को भी अपनी पार्टी में जोड़ कर रखा।
बीजेपी ने पिछले दस वर्षो में लगातार जाट बनाम गैर जाट, हिंदू खतरे में है, हिन्दू मुसलमान, राष्ट्रवाद के उन्माद के नेरेटिव बना कर नफऱत और विभाजनकारी नीति को दिन रात गर्म रखा, जोकि बीजेपी की राजनीति का मुख्य आधार है। भाजपा, कांग्रेस में भूपेंद्र सिंह हुड़्डा व दलित चेहरे कुमारी सैलजा की खुली गुटबाज़ी के चलते कांग्रेस के खिलाफ दलित विरोधी होने का नैरेटिव खड़ा करके भी दलित वोटों में सेंध लगाने में सफल रही।

कांग्रेस को ये करना होगा?
अगर कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व भविष्य में हरियाणा में अपनी सरकार बनाना चाहता है तो उसे सबसे पहले तो पार्टी में भारी प्रभुत्व वाले जाट चेहरे भूपेंद्र सिंह हुड़्डा की नकेल कसनी होगी, कांग्रेस को धरातल पर जिंदा खड़ा करना होगा, तत्काल सांगठनिक चुनाव सही ढंग से कराने होंगे, भूपेंद्र सिंह हुड़्डा के प्रभुत्व को कम करके समाज के पिछड़े तबके, दलितों, जाटों,अन्य जातियों व युवाओं को उचित महत्व व सम्मान संगठन में देना होगा। चुनाव में टिकट वितरण करते वक्त केंडिडेट्स के जीतने की क्षमता को किसी नेता या गुट विशेष की वफादारी पर सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। जिम्मेवार विपक्ष की भूमिका निभाते हुए विधानसभा के अंदर और बाहर जनता के मुद्दों पर संघर्ष करना होगा, जनता में निरंतर सक्रिय रहना होगा।

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