फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) हरियाणा राज्य के इस सबसे बड़े औद्योगिक क्षेत्र में सरकार ने एक डिप्टी लेबर कमिश्नर, चार असिस्टेंट लेबर कमिश्नर दर्जन भर से अधिक इंस्पेक्टर तथा तीन श्रम न्यायालय स्थापित कर रखे हैं। इनके बैठने के लिए सेक्टर 12 में अति आधुनिक बहुमंजिला इमारत का निर्माण पीडब्ल्यूडी द्वारा किया गया था। बीते लगभग पांच साल से ये तमाम कार्यालय इस इमारत में घुसे हुए हैं जबकि न तो पीडब्ल्यूडी (लोक निर्माण विभाग) ने इसे पूरा करके श्रम विभाग को हस्तांतरित किया है और न ही श्रम विभाग ने इसका विधिवत कब्जा लिया है। यानी कि सब कुछ जबरा-जबरी में चल रहा है। इसी के चलते न तो यहां लिफ्ट काम कर रही है और न ही बिजली की वायरिंग सही ढंग से की गई है। जगह-जगह लटकी बिजली की नंगी तारें हादसों को न्योता दे रही हैं।
बड़ी-बड़ी फैक्टरियों व लाखों मजदूरों वाले इस शहर में, विभिन्न मसलों के लिए हजारों मज़दूरों व कम्पनी मालिकान के साथ-साथ वकीलों का भी आना-जाना लगा रहता है। जाहिर है जहां इतनी बड़ी संख्या में लोगों का आवागमन होगा तो इससे पैदा होने वाली गंदगी की सफाई के लिए पर्याप्त मात्रा में सफाई कर्मचारी भी होने चाहिए। लेकिन इनके अभाव में पूरे परिसर में तो गंदगी फैली ही रहती है, शौचालयों की हालत तो इस कदर बिगड़ी हुई है कि उनके भीतर घुसना तो दूर निकट से गुजरना भी दूभर होता है। इनसे उठती दुर्गंध बरामदे तथा आसपास के दफ्तरों तक को दुर्गंधित करती हैं। शौचालयों के पाइप टूटे पड़े हैं, बहते पानी से कीचड़ मचा रहता है। लगाने को तो देसी सीटों की जगह अंग्रेजी कमोड लगा दिए गए हैं लेकिन वे या तो टूट चुके हैं अथवा इस्तेमाल के काबिल नहीं रहे। ऐसे में सबसे बड़ी समस्या यहां आने वाली महिलाओं को होती है क्योंकि उनके लिए भी कोई अलग से व्यवस्था नहीं की गई है।
यद्यपि कोई अधिकारी मुंह खोलने को तैयार नहीं, फिर भी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार यहां प्रति लेबर कोर्ट एक सफाईकर्मी तथा लेबर कार्यालयों के नाम पर छ: सफाईकर्मियों के पद स्वीकृत हैं। इस हिसाब से यहां कुल 9 सफाईकर्मी होने चाहिए लेकिन इनमें से आठ पद रिक्त पड़े हैं और केवल एक ही सफाईकर्मी कार्यरत है और वह भी वहां काम न करके अफसरों के घरों में ही काम करता है। ऐसे में करोड़ों रुपये की बिल्डिंग में गंदगी व बदबू का साम्राज्य होना तो स्वाभाविक ही है। संदर्भवश यह जानना भी जरूरी है कि यहां श्रम न्यायालयों में अतिरिक्त सेशन जज स्तर के अधिकारी तैनात हैं। जाहिर है कि उनके साथ अच्छा-खासा अदालती अमला भी तैनात रहता है। अपेक्षा की जाती है कि इतनी उच्च स्तरीय अदालतों एवं श्रम अधिकारियोंं के दफ्तरों के लिए सफाई-कर्मी तो तैनात होने ही चाहिए, जो नियमित रूप से यहीं पर काम करें न कि किसी के घर पर।
इस बिल्डिंग में चार लिफ्ट लगाने पर करोड़ों रुपये तो खर्च कर दिए गए परन्तु आज तक किसी ने भी इनमें से एक लिफ्ट को भी चलते नहीं देखा। हो सकता है कि ये लिफ्टें केवल दिखावटी ही हों, इनके भीतर आवश्यक मोटरें व अन्य मशीन आदि हों ही न। वैसे भी पांच साल पहले लगी इन लिफ्टों का गारंटी अथवा वारंटी पीरियड भी समाप्त हो चुका है। इसलिए करोड़ों का यह माल कबाड़े में ही बेचा जा सकता है।इमारत की जो हालत है सो तो है ही, रख-रखाव की स्थिति यह है कि बिजली का बिल भरने की कोई समुचित व्यवस्था नहीं की गई है। लगता है कि श्रम विभाग ने समझ लिया होगा कि बिजली विभाग भी तो उसी हरियाणा सरकार का है जिसका श्रम विभाग है, इसलिए बिल भरने की क्या जरूरत है। लेकिन बिजली विभाग ऐसा नहीं मानता, लिहाजा उन्होंने पिछले दिनों बिजली का कनेक्शन काट दिया। इस पर हड़कंप मचना तो स्वाभाविक था। श्रम न्यायालयों के न्यायाधीशों ने चीख पुकार मचाई, बिजली विभाग वालों से कहा-सुनी की, झूठा सच्चा आश्वासन देकर बिजली चालू कराई। लेकिन अभी तक यह पता नहीं चल पाया कि बिजली का बिल नियमित तौर पर भरने की क्या व्यवस्था की गई है? नियमानुसार तो श्रम विभाग मुख्यालय चंडीगढ़ द्वारा इसकी नियमित व्यवस्था की जानी चाहिए जो नहीं की जा रही।
श्रम कार्यालयों में स्टेशनरी तक नहीं है श्रम कार्यालयों में लिखने के लिए न तो कलम हैं और न ही कागज। जिस भी श्रमिक नेता अथवा वकील को कुछ लिखवाना हो तो का$गज-$कलम पल्ले से इन कार्यालयों में देना पड़ता है। इतना ही नहीं यदि कोई पंजीकृत पत्र अथवा नोटिस कहीं भिजवाना हो तो टिकट लगा लिफाफा भी इन्हीं लोगों को अपनी जेब से देना पड़ता है। हरियाणा सरकार के कार्यालयों की यह दुर्दशा तो वहां है, जहां मज़दूरों के लिए काम करने का दावा किया जाता है। दुर्भाग्य की बात तो यह है कि कोई मज़दूर नेता अथवा यूनियन इसके विरुद्ध मुंह खोलने की हिम्मत न करके चुपचाप सहन किए जा रहे हैं। जाहिर है कि अब मज़दूर नेता ट्रेड यूनियनिस्ट न रह कर पेशेवर वकील हो गए हैं।