डॉ. रामजीलाल वर्तमान शैक्षणिक सत्र वर्ष 2025-26 में 6 मार्च 2025 को प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार हरियाणा के सरकारी 487 प्राथमिक स्कूलों में एक भी शिक्षक नहीं है . उदाहरण के लिए, शिक्षकों के बिना स्कूलों की संख्या क्रमश:यमुनानगर 79, भिवानी 46, पंचकूला 45 ,अंबाला 41, और सिरसा 38 हैं. वर्तमान शैक्षणिक सत्र वर्ष 2025-26 में 294 जीरो एडमिशन स्कूल हैं . अर्थात एक भी एक भी विद्यार्थी ने दाखिला नहीं लिया. उदाहरण के लिए, छात्रविहीन स्कूलों की संख्या क्रमश:, यमुनानगर 32, सिरसा 23, भिवानी,22, अंबाला ,22 और पंचकूला 9 हैं.वर्ष 2022 में, हरियाणा सरकार ने 25 से कम बच्चों की संख्या वाले 292 सरकारी स्कूलों को बंद कर दिया. हमारा मानना है कि स्कूलों को बंद करने के बजाय, बच्चों के शिक्षा के संवैधानिक अधिकार की रक्षा करते हुए जनहित में सुधार आवश्यक हैं. औसत शिक्षक-छात्र अनुपात में अंतर: हरियाणा का समग्र औसत शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम के अनुसार प्राथमिक स्कूलों में शिक्षक-छात्र अनुपात 1:30 और उच्च प्राथमिक स्कूलों 1:35 होना चाहिए. कुल मिलाकर शिक्षक -छात्र अनुपात ढ्ढ: 28 है. प्राइमरी क्लास से लेकर12वीं क्लास शिक्षक- छात्र अनुपात -प्राथमिक स्तर 1:26 उच्च प्राथमिक (छठी-आठवीं) 1:19,माध्यमिक (नौवीं-दसवीं) 1:17 ,उच्च माध्यमिक (ग्यारहवीं-बारहवीं) 1:27 है .प्राइमरी क्लास से लेकर12वीं क्लास तक भी शिक्षक- छात्र अनुपात में अंतर है परंतु ग्रामीण क्षेत्रों तथा एकल शिक्षा स्कूलों में शिक्षक छात्र अनुपात बहुत अधिक है.
हरियाणा में स्कूली शिक्षा में सुधार हेतु सुझाव: हरियाणा में स्कूली शिक्षा में सुधार हेतु निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं.
प्रथम, समान शिक्षा मानक लागू करें : सभी सरकारी और गैर-सरकारी स्कूलों में एक जैसी शिक्षा, एक ही शिक्षण माध्यम, एक जैसी परीक्षाएँ, एक जैसा पाठ्यक्रम होना चाहिए और सभी स्कूल हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड [भिवानी] से संबद्ध होने चाहिए.
दूसरा, शिक्षा के व्यावसायीकरण पर नियंत्रण :शिक्षा के व्यावसायीकरण को नियंत्रित करने के लिए, निजी स्कूलों को छात्रों से ली जाने वाली फीस और अन्य धनराशि पर विवेकपूर्ण नियंत्रण रखना चाहिए. कई निजी स्कूल संचालक कोचिंग सेंटर भी चलाते हैं या उनसे संबद्ध हैं. शिक्षा अधिकारियों की नाक के नीचे छात्रों का स्कूलों में नामांकन होता है. कक्षा 11 और 12 के छात्र अक्सर स्कूल से अनुपस्थित रहते हैं और परीक्षाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग सेंटर जाते हैं. इन छात्रों को ‘डमी छात्रÓ कहा जाता है। इससे बोझ दोगुना हो जाता है. एक ओर, वे स्कूल फीस देते हैं और दूसरी ओर, कोचिंग सेंटर की फीस भी देते हैं. ये ‘डमी छात्रÓ चंडीगढ़, दिल्ली, कोटा और स्थानीय स्तर पर स्थापित कोचिंग सेंटरों में परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, जबकि स्कूलों में उनका नामांकन केवल परीक्षा देने तक ही सीमित है. कोचिंग सेंटरों में पढ़ाई के दौरान मिलने वाला हतोत्साहन इतना गंभीर अवसाद पैदा कर सकता है कि बच्चे आत्महत्या तक कर लेते हैं और आत्महत्या करने की घटनाएं अखबारों की सुर्खियाँ बन जाती है. ‘डमी छात्रोंÓ के नामांकन पर रोक लगाई जानी चाहिए.
तीसरा, प्राइवेट स्कूल के टीचरों के लिए समान वेतन व सुविधाएं सुनिश्चित करें:निजी स्कूलों के शिक्षकों को सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के समान वेतन और अन्य सुविधाएँ मिलनी चाहिए क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39(डी) के अनुसार, सभी पुरुषों और महिलाओं को समान कार्य के लिए समान वेतन मिलना चाहिए. यह अनुच्छेद 14 के तहत समानता के संवैधानिक अधिकार से जुड़ा है.
चौथा, सरकारी स्कूलों का आधुनिकीकरण : भी सरकारी स्कूलों में शिक्षा प्रदान करने के लिए आधुनिक शिक्षण पद्धतियाँ, बुनियादी ढाँचा, स्मार्ट स्कूल आदि होने चाहिए. वर्तमान में, कुछ सरकारी स्कूलों में आधुनिक सुविधाएँ हैं जबकि अधिकांश में नहीं हैं . यही कारण है कि निजी और सरकारी स्कूलों के बीच डिजिटल खाई बढ़ती जा रही है, जिसका असर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में रहने वाले गरीब और हाशिए पर रहने वाले परिवारों के बच्चों पर पड़ रहा है. अत:स्कूलों में स्मार्ट क्लासरूम, डिजिटल लैब, आईसीटी अवसंरचना, लाइब्रेरी ,साइंस लैब, मूल्य आधारित शिक्षा आदि जैसी सुविधाएं देना सरकार का प्रमुख दायित्व है. ग्रामीण और वंचित वर्ग के बच्चों को तकनीकी शिक्षा का लाभ लेकर डिजिटल समानता स्थापित करके शिक्षा की नीव को सुदृढ़ बनाया जा सकता है.
पंचम, शिक्षक रिक्तियों पर शीघ्र नियुक्ति: शिक्षक- छात्र अनुपात में संतुलन बनाने के लिएअध्यापकों की लगभग 15,659 रिक्तियों को शीघ्र भर्ती की जाए ताकि शिक्षा के अधिकार को उचित और संतुलित तरीके से लागू करके सरकारी स्कूलोंकी विश्वसनीयता को बढ़ावा देकर गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा प्रदान की सके और सरकारी स्कूलों से निज़ी स्कूलों नामांकित होने के पलायन को रोका जा सके.
छठा, परीक्षाओं को नकल -मुक्त करें:गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में सुधार के लिए, परीक्षाओं में नकल पर पूरी तरह से रोक लगाई जानी चाहिए, जिससे वे अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बन सकें.
सातवां, शिक्षकों के प्रोफेशनल डेवलपमेंट में मदद करें: निजी और सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को अपनी योग्यता बढ़ाने व उच्च डिग्री हासिल करने के लिए सवेतन अवकाश दिया जाना चाहिए. शैक्षणिक प्रक्रिया में शिक्षक -केंद्रित दृष्टिकोण अपनाकर शिक्षा में गुणवत्ता बढ़ानी चाहिए.
आठवां, शिक्षा में भ्रष्टाचार रोकें: शिक्षा विभाग में, स्कूलों से लेकर शिक्षा मंत्रालय तक, भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहते हैं. इसलिए, इस प्रचार को रोकने और विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए, भ्रष्टाचार में संलिप्त कर्मचारियों को कानून के अनुसार दंडित किया जाना चाहिए.
नौवाँ, शिक्षा के राजनीतिकरण को रोकें: वर्तमान में यह देखा जा रहा है कि सत्ताधारी दल से जुड़े व्यक्तियों को शिक्षा निदेशालय और विभाग से समारोहों के लिए आवेदन प्राप्त होते हैं. हैरानी की बात है कि शिक्षा निदेशालय, पंचकूला ऐसे आवेदनों को स्कूलों और कॉलेजों में कार्यक्रमों की तैयारी के आदेशों के साथ अग्रेषित करता है. जिला शिक्षा अधिकारी प्रधानाचार्यों को निर्देश जारी करते हैं कि वे छात्रों को जिला स्तरीय पदयात्राओं में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें. शिक्षाविदों का मानना है कि इससे शिक्षा का राजनीतिकरण होता है, जिससे शिक्षक और छात्र अपने मूल कार्यों से विचलित होते हैं. यह प्रचलन बंद होना चाहिए.
दसवाँ, वैज्ञानिक सोच और संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा : बच्चों को पाठ्यक्रम और व्याख्यानों के माध्यम से भारतीय संविधान के तहत दी गई वैज्ञानिक सोच और मूल्यों से अवगत कराया जाना चाहिए. संविधान के अनुच्छेद 51्र(॥) में कहा गया है कि वैज्ञानिक सोच, मानवतावाद और अन्वेषण एवं सुधार की भावना विकसित करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य है. संविधान की प्रस्तावना में निहित समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व, सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्रीय एकता के सिद्धांतों को अपनाने का प्रयास किया जाना चाहिए.
ग्यारहवां, जापानी स्कूली शिक्षा प्रणाली से सीखें : प्राथमिक स्तर पर हमें जापानी स्कूली शिक्षा प्रणाली से भी सीखना चाहिए. जापानी स्कूलों में बच्चों को परीक्षाओं की कड़ी प्रतिस्पर्धा का प्रशिक्षण देने के बजाय, उन्हें भविष्य का इंसान और नागरिक बनाने पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता है. जापान में स्कूली स्तर पर, छात्रों को भावनात्मक जागरूकता, स्कूल की साफ़-सफ़ाई, टीम वर्क, प्यार से जीना , सहानुभूति, सहयोग, दया, अनुशासन, कड़ी मेहनत, ईमानदारी, सच्चाई, सामाजिकता, मिल-जुलकर रहने और अन्य मूल्यों की शिक्षा देते हैं. द्वितीय विश्व युद्ध में भयंकर तबाही के बावजूद, इसी शिक्षा प्रणाली के कारण, जापान आज औद्योगिक, तकनीकी और आर्थिक क्षेत्रों में विश्व के अग्रणी देशों में से एक है.
बारहवाँ, शिक्षा के केरल मॉडल का विश्लेषण :हरियाणा सरकार के द्वारा शिक्षा के केरल मॉडल का विश्लेषण करके हरियाणा की परिस्थितियों के अनुकूल लागू करने का प्रयास करना चाहिए.
तेरहवां,शिक्षक-छात्र अनुपात पर ध्यान दें: यह समझना ज़रूरी है कि ग्रामीण इलाकों और सिंगल-टीचर स्कूलों में शिक्षक-छात्र अनुपात बहुत ज़्यादा है, जिससे बराबरी का एक बड़ा मुद्दा बनता है जिस पर तुरंत कार्रवाई की ज़रूरत है.
चौदहवां, पढ़ाई सुरक्षित माहौल में हो:छात्रों में नशीली दवाओं के सेवन में वृद्धि, अनुशासनहीनता ,लड़ाई -झगड़े और छात्राओं के साथ अभद्र व्यवहार के मामले अखबारों की सुर्खियों में बढ़ रहे हैं. शिक्षण संस्थानों को ‘इंस्टीट्यूशन ऑफ स्कैंडल’ बनने से रोकना चाहिए ताकि छात्राएँ सुरक्षित वातावरण में शिक्षा प्राप्त कर सकें और उनके अभिभावक उन्हें स्कूल भेजने में संकोच न करें. दूसरे शब्दों में, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा सार्थक होना चाहिए.
संक्षेप में, शिक्षा के व्यावसायीकरण पर आधारित नीतियों में बदलाव होना चाहिए और सभी बच्चों के लिए समान, और सार्वभौमिक शिक्षा होनी चाहिए. सभी स्कूलों में आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है. हमारा उद्दघोष होना चाहिए ‘सबको शिक्षा एक समान, तभी विश्व गुरु बनेगा हिंदुस्तान’. इस उद्घोष को अभिभावकों, समाजसेवी संगठनों और पंचायती राज संस्थाओं के सहयोग से ही सार्थक बनाया जा सकता है. (समाज विज्ञानी, पूर्व प्राचार्य दयाल सिंह कॉलेज)