मज़दूर मोर्चा ब्यूरो हरियाणा पुलिस के एडीजीपी वाई पूरन कुमार द्वारा आत्महत्या किए जाने को लेकर उनकी पत्नी अमनीत पी कुमार आईएएस ने चंडीगढ़ के थाना सेक्टर 11 में बीएनएस की धारा 108, (आईपीसी की धारा 306), और एससी-एसटी एक्ट के तहत डीजीपी शत्रुजीत कपूर व रोहतक के एसपी नरेंद्र बिजनारिया के विरुद्ध नौ अक्तूबर को दर्ज कराया है। संदर्भवश शिकायतकर्ता आईएएस अधिकारी होने के अलावा पूर्व केन्द्रीय गृह मंत्री बूटा सिंह की पुत्री भी हैं। मृतक की पत्नी द्वारा आरोप लगाया गया है कि डीजीपी द्वारा प्रताडि़त करने तथा रोहतक के एसपी द्वारा उनके पति के विरुद्ध साजिश रचने से परेशान वे आत्महत्या करने को मजबूर हो गए। पत्नी के मुताबिक वे निहायत ही ईमानदार, मेहनती व कर्मठ अधिकारी थे इसके बावजूद राज्य के अनेकों अधिकारी उन्हेें परेशान करते थे। मृतक द्वारा लिखे गए नौ पेज के सुसाईड नोट में करीब तीस आईएएस व आईपीएस अधिकारियों पर भी आरोप लगाया गया है कि वे समय-समय पर उन्हें प्रताडि़त करते रहे थे, जिनमें से कई तो रिटायर भी हो चुके हैं। इनमें प्रमुख रहे हैं हरियाणा के पूर्व डीजीपी मनोज यादव।
बिहार चुनाव सिर पर देखते हुए किसी भी राजनीतिक हानि से बचने के लिए बेशक यह मुकदमा तो दर्ज कर लिया गया है परंतु तफ्तीश के दौरान इसमेें कुछ भी बड़ा निकलने की कोई संभावना नजर नहीं आती। फिलहाल, पूरन कुमार की तैनाती भोंडसी स्थित हरियाणा पुलिस के एक सेंटर पर की गई थी, इससे कुछ दिन पहले वे बतौर एडीजीपी रेंज रोहतक तैनात थे। उस तैनाती के दौरान उनके पास सुशील कुमार नामक हवलदार बतौर गनमैन नियुक्त था, तबादला होने के बावजूद उन्होंने सुशील कुमार को रिलीव न करके अपने साथ ही रखा हुआ था। वैसे हरियाणा के बड़े पुलिस अफसरों की यह आदत है कि वे अपने निजी स्टाफ को अपनी हर तैनाती पर अपने साथ रखते हैं। कहा जाता है कि यह स्टाफ उनका विशेष राज़दार होता है और कोई भी अफसर नए राज़दार बनाना नहीं चाहता, उसी अनकहे नियम के अनुसार हवलदार सुशील कुमार भी पूरन कुमार के साथ ही जुड़ा हुआ था।
बीते दिनों रोहतक के एक शराब व्यापारी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि हवलदार सुशील कुमार उससे ढाई लाख रुपये की मांग कर रहा है। मुकदमा दर्ज होने पर सुशील कुमार को गिरफ्तार कर लिया गया, बयान में उसने कहा कि यह रकम वह अपने लिए नहीं अपने साहब यानी पूरन कुमार के लिए मांग रहा था, जो वह पहले भी लेता रहा है। इसकी सूचना मिलते ही पूरन कुमार भड़क उठे, उन्होंने एसपी बिजारिया को फोन लगाया तो उन्होंने फोन उठाया ही नहीं, इस पर वे और भी भड़के और डीजीपी कपूर को फोन लगाया तो उन्होंने भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया। मृतक की भाषा में कहें तो कपूर ने उन्हें फोन पर ही प्रताडि़त कर दिया। इन सब बातों से परेशान होकर उन्होंने उक्त सुसाईड नोट लिखा और अपने गनमैन की रिवॉल्वर से गोली मार कर छह अक्तूबर को आत्महत्या कर ली।
जानकार बताते हैं कि नोट लिखने से पहले उन्होंने अपने आप को कमरे में बंद करते हुए घरेलू सहायकों को हिदायत थी कि उन्हें डिस्टर्ब न किया जाए। जब बहुत देर तक वे नहीं निकले तो बेटी अंदर गई, उसने पिता को लहूलुहान पाया तो पुलिस और जापान के दौरे पर गई अपनी मां को फोन कर सूचना दी। एसपी रोहतक के मुताबिक उन्होंने हवलदार सुशील को गिरफ्तार करने के बाद न तो पूरन कुमार को कोई नोटिस भेजा न ही कोई उनसे पूछताछ की गई, न ही उन पर कोई आरोप लगाया गया। अभी वे हवलदार और शिकायतकर्ता की बातों की जांच एवं पुष्टि करने में ही लगे हुए थे कि यह कांड हो गया। दरअसल पूरन कुमार के लिए यह अपने आप में एक बहुत बड़ा आघात था कि उसके गनमैन को पुलिस ने गिरफ्तार करने की हिम्मत की। उस पर, कल तक उनके मातहत रहा एसपी उनका फोन तक न उठाए, यह उनके लिए नाकाबिले बर्दाश्त था। रही-सही कसर डीजीपी कपूर ने उनको अनसूना करके पूरी कर दी।
इस संदर्भ में सोचने व समझने वाला एक गम्भीर प्रश्न यह उठता है कि देश की सर्वश्रेष्ठ सेवा (आईपीएस) में एक ऊंचे पद पर तैनात व्यक्ति भी अपने आप को दलित संरक्षण कवर यानी एससीएसटी एक्ट से बाहर क्यों नहीं निकाल पाता? समाज का कोई दबा कुचला निरीह एवं वंचित दलित इस एक्ट से संरक्षण मांगे तो कोई बात समझ में आती है। लेकिन जो दलित उच्च पदों पर पहुंच कर सत्ता का अंग बन चुका हो, वह भी इस एक्ट से संरक्षण मांगे तो इससे बड़ा दुर्भाग्य इस देश के लिए हो नहीं सकता। इसके दुष्परिणाम के तौर पर सेवारत अन्य कर्मचारियों के बीच भेद-भाव दुश्मनी के स्तर तक बढ़ सकता है। मृतक पूरन की एक शिकायत यह भी लम्बे समय से रही है कि उसे फील्ड की पोस्टिंग इसलिए नहीं दी जाती कि वह दलित वर्ग से आता है। इसके विपरीत उन्हें जब भी फील्ड की पोस्टिंग मिली तो वे ऐसे गुल खिलाते कि उन्हें वापस दूसरी तैनातियों पर भेज दिया जाता। चालू भाषा में कहा जाय तो फील्ड पोस्टिंग का मतलब मलाईदार पोस्टिंग से होता है। आरक्षण नीति के अनुसार राज्य के लगभग सभी विभागों में 20-22 प्रतिशत तैनातियां अनुसूचित जाति वर्ग से ही भरी जाती हैं। इस वर्ग से आने वाले कलसन तथा चालीहा जैसे इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़ कर कभी भी किसी को कोई विशेष शिकायत नहीं रही। छोटी-मोटी शिकायतें तो हर वर्ग के लोगों को अपने अधिकारियों से रहती ही है। लेकिन थोक के भाव जितनी शिकायतें पूरन कुमार को रही हैं इसका अन्य कोई उदाहरण उपलब्ध नहीं हैं।
आमतौर पर देखा गया है कि आत्महत्या के ऐसे मामलों में आरोपियों को कभी सजा नहीं हो पाती। इनमें पुलिस जरूर गुंडागर्दी करके आरोपियों को रगड़ा लगाती है। 14 अगस्त 2019 को एनआईटी फरीदाबाद के डीसीपी विक्रम कपूर ने भी गोली मार कर आत्महत्या कर ली थी। इस मामले में पुलिस ने अपने ही एक इंस्पेक्टर अब्दुल शाहिद को गिरफ्तार करके इस कदर टॉर्चर किया था कि वह कई हफ्तों तक चलने लायक भी नहीं था। ‘मज़दूर मोर्चाÓ के सम्पादक सतीश कुमार को भी जबरदस्ती इस केस में लपेटकर पुलिस टॅार्चर करना चहती थी। लेकिन समय रहते हाईकोर्ट का संरक्षण मिलने के कारण वे बच गए। पांच साल के बाद उस मुकदमें की हालत यह है कि वह जहां का तहां खड़ा है, किसी को कोई सजा होने वाली नहीं है। परन्तु मौजूदा इस मामले में किसी की हिम्मत है क्या जो तथाकथित आरोपियों को टॉर्चर तो क्या गिरफ्तार भी करा सकेंगे? पता चला है कि भ्रष्टाचार के गम्भीर मामलों में जिस आईएएस अधिकारी सुरेश को डीजीपी कपूर गिरफ्तार करना चाहते थे वही सुरेश आज उछल-उछल कर आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग कर रहा है।