हाड़-कंपाऊ ठण्ड में लाखों लोग राशन कार्ड की लाइन में लगने को मज़बूर

हाड़-कंपाऊ ठण्ड में लाखों लोग राशन  कार्ड की लाइन में लगने को मज़बूर
January 16 02:03 2023

झूठ बोलने में माहिर संघ प्रशिक्षित खट्टर ने राशन से वंचित करने के लिए झूठे दस्तावेज भी तैयार करा दिए

सत्यवीर सिंह
5 जनवरी, सुबह 11 बजे, कंपा देने वाली तीखी शीत लहर के बीच, डबुआ कॉलोनी निवासी, सरोज, शाल लपेटे, लघु सचिवालय, सेक्टर 12 फऱीदाबाद के ग्राउंड फ्लोर पर, समाज कल्याण विभाग के कंप्यूटर सेक्शन के बाहर लगी लम्बी लाइन में, उस स्थान पर खड़ी थीं कि शाम 6 बजे तक भी उनका नंबर नहीं आने वाला. ‘आपका नंबर तो आज नहीं आने वाला?’, सवाल का ये जवाब मिला, ‘कोई बात नहीं, मैं घर जाऊँगी, इनसे बात करके ही. मैं राशन कार्ड ठीक नहीं कराने वाली. मैं तो ये कहने वाली हूँ कि आप तो मुझे साल के 2,85,000 रुपये दे दो, और अपना राशन कार्ड तुम्हीं रख लो. मुझे तुम्हारा ये सड़ा हुआ राशन चाहिए ही नहीं. मैं, बाज़ार में लाला की दुकान से ले लूंगी!! मेरा आदमी सेक्टर 24 की फैक्ट्री में काम करता है. महीने में 10,000 से ज्यादा कभी नहीं मिले. कमबख्तों ने मेरे नाम पर 70,000/ , बेटे के नाम पर जो दसवीं में पढ़ रहा है, बेटी के नाम पर, बुड्ढों के नाम पर पता नहीं क्या-क्या लिख रक्खा है!! कहते हैं, तुम्हारी इनकम 2,85,000 हो गई, अब तुम्हारा राशन कार्ड रद्द होगा!!’

परेशान होने वाली, सरोज अकेली नहीं हैं. हरियाणा सरकार ने इस साल, अपने राज्य के गऱीब लोगों को ‘नए साल की मुबारकबाद’ कुछ अलग ही अंदाज़ में दी है. ‘आपकी आय गऱीबी रेखा की निर्धारित सीमा 1,80,000 रु की सीमा लाँघ चुकी है. 1 जनवरी 2023 के बाद आपको राशन नहीं मिलेगा’, ऐसे क्रूर सन्देश, लाखों लोगों के मोबाइल पर आने शुरू हो गए. ठण्ड से कांपते, गुस्से में तिलमिलाए लोगों के सामने, डी सी ऑफिस पर, लाइन लगाने के आलावा चारा नहीं बचा. जहाँ सामान्य दिनों में भी काम करने को पर्याप्त स्टाफ नहीं रहता, अक्सर सर्वर डाउन रहता है या कनेक्टिविटी नहीं रहती, ठीक वैसी ही लाइनें लग गई हैं जैसी नोटबंदी के दिनों में बैंकों के सामने लगी थीं. इस संवेदनहीन, अमानवीय शॉक ट्रीटमेंट के लिए इससे मुश्किल वक़्त नहीं चुना जा सकता था.

गऱीबों की गऱीबी का मखौल उड़ाने वाले, हरियाणा प्रशासन के इस अमानवीय क़दम की एक बानगी और देखिए. बाबूलाल, मज़दूर बस्ती आज़ाद नगर में एक छोटी सी दुकान चलाकर, किसी तरह अपने परिवार का पेट पालते हैं. पिछले 15 साल से भी अधिक समय से उनके पास बीपीएल कार्ड है. 1 जनवरी को, नए साल के सरकारी ‘तोहफ़े’ के रूप में, उन्हें मोबाइल पर ये संदेश प्राप्त हुआ:

“प्रिय लाभार्थी, परिवार पहचान पत्र संख्या ITPH1261 के आधार पर आप गरीब परिवार (पीला) श्रेणी के लिए अपात्र पाये गये है। आपका राशन कार्ड रद्द कर दिया गया है। इस सम्बन्ध में किसी समस्या/शिकायत के निवारण हेतू आप http://grievance.edisha.gov.in व हैल्पलाईन नं 0172-3968400 पर जाकर अपनी शिकायत दर्ज कर सकते है। हरियाणा सरकार”. पढक़र ‘प्रिय लाभार्थी हिल गए!! दुकान वही, ग्राहक वही, जगह वही, मैं वही; अचानक कागज़ों में धन-वर्षा कैसे हुई!! जबकि, इस बीच 1 जनवरी, 2013 से, गऱीबी रेखा निर्धारित करने वाली आय की सीमा रु 1,20,000 से बढाकर 1,80,000 प्रति वर्ष हो गई है. दो साल पहले हरियाणा सरकार ने फैमिली कार्ड बनाए थे, उसके अनुसार भी, उनकी वार्षिक आय रु 96,000 ही थी. ‘हरियाणा परिवार पहचान पत्र’ (Citizen Resource Information Department, CRID) ने दिनांक 31.12.2022 को बाबूलाल जी को उनकी परिवार आई डी ITPH1261 का सन्दर्भ देते हुए, उनके परिवार की वार्षिक आय का ब्यौरा इस तरह बताया: अमित पुत्र बाबूलाल, व्यवसाय-विद्यार्थी, आयु 19 वर्ष, आय- 25,000 से 50,000; रीमा पुत्री बाबूलाल, व्यवसाय-विद्यार्थी, आयु 22 वर्ष, आय -10,000 से 25,000; बाबूलाल पुत्र स्व धुक्कू राम, व्यवसाय- दुकानदार, आयु-45 वर्ष, आय-1,50,000 से 2,50,000 तथा उर्मिला पत्नी बाबूलाल, व्यवसाय- गृहणी, आयु- 41 वर्ष, आय 25,000 से 50,000.

विद्यार्थियों अथवा गृहणियों की आय गणना किस आधार पर हुई? अगर ये ‘सरकारी’ लोग कभी किसी स्कूल- कॉलेज में कभी पढऩे गए हैं, तो बताएं कि पढ़ते वक़्त, उन्होंने कितने पैसे कमाए और किस विधि से कमाए? उनके घरों में भी गृहणीयां होंगी. उनकी आय कितनी है? आय की रेंज इतनी विशाल है जैसे 25,000 से 50,000 या 1,50,000 से 2,50,000!! जहाँ आय, निश्चित रेखा 1,80,000 से ऊपर जाते ही, अचानक, व्यक्ति के गऱीब से अमीर बन जाने का ख़तरा हो, और अमीर घोषित होते ही उसका राशन बंद हो जाने का ज़ोखिम हो, वहां आय की इतनी रेंज का क्या मतलब है? प्रशासन के इन मठाधीशों ने कौन सी आय पकड़ी, जिसके आधार पर राशन कार्ड रद्द हुए? आय के इस निर्धारण का आधार क्या है? इन प्रशासनिक शेखचिल्लियों को ये जानने या समझाने की ज़रूरत क्यों महसूस नहीं हुई? न्याय के नैसर्गिक नियम (Law of natural justice) के अनुसार, क़ातिलों, बलात्कारियों को भी, अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाता है. देश के गऱीब-मज़लूमों को इस लायक भी क्यों नहीं समझा गया कि उनकी आय के अचानक कई गुना बढ़ जाने पर, उन्हें भी अपना पक्ष रखने का अवसर मिले? भरी तोंदों वाले इन ‘साहबों’ को ऐसी शीत लहर में, अगर बाहर खुले में, दिन भर खड़ा रखा जाए तब शायद इनकी संवेदना जागे, अगर बची हो तो!!

हरियाणा के खाद्य एवं आपूर्ति विभाग के, आय सत्यापित करने वाले अधिकारीयों ने, गुर्बत में सरकारी राशन के भरोसे, किसी तरह अपनी जि़न्दगी की गाड़ी धकेल रहे, 28.93 लाख लोगों को, हाड़-कंपाऊ ठण्ड में, लाइन में लगा दिया है. कोई जिए या मरे, उन्हें क्या? बर्फीली  ठण्ड से बचने के लिए अपने घरों में दुबके बैठे, मनरेगा मज़दूरों, दिहाड़ी मज़दुरों, रेहड़ी-पटरी पर दो जून रोटी का जुगाड़ करने वाले लोगों के मोबाइल पर अचानक दिल दहलाने वाले संदेशे आने शुरू हो गए, ‘आपकी वार्षिक आय 1,80,000/ से आगे निकल गई, आप गऱीबी रेखा से ऊपर उठ गए, आपका राशन कार्ड रद्द हो चुका है’. रजाई में बैठे-बठे, अचानक गऱीबी से उठकर अमीरी में पहुंचे लोग, चकरा गए. ये हादसा कैसे हुआ!! इनकम जांचने वाले शेखचिल्लियों ने, इन संदेशों को पढऩे की भी ज़हमत नहीं उठाई. ‘पंकज, पेशा-छात्र, आय 70,000 प्रति वर्ष!’; ‘कुसुम, पेशा-गृहणी, आय-80,000/ प्रति वर्ष!!’ कोई पढक़र भले हार्ट अटैक से मर जाए, उन्हें क्या फर्क़ पड़ता है?? उनके और उनके आक़ाओं के तो पेट भरे हैं और दफ़्तर में हीटर चालू हैं.

हरियाणा सरकार का खाद्य एवं आपूर्ति विभाग, नागरिकों को 3 तरह के राशन कार्ड ज़ारी करता है. गऱीबी रेखा (1,80,000/ रु) से ऊपर के नागरिकों के लिए, APL इस कार्ड का रंग पिंक है और दूसरे राज्यों से विस्थापित होकर हरियाणा आए व्यक्ति भी इस कार्ड के हक़दार हैं. उनके पैत्रिक राज्य में यदि उन्हें गऱीबी रेखा से नीचे वाला कार्ड जारी हुआ है, और उन्हें वहां राशन कार्ड मिल रहा है तो ‘एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड’ योजना के तहत, उनकी पात्रता के अनुसार सस्ता राशन मिलेगा. अगर ऐसा नहीं है तो इस समूह के लोगों को सस्ता राशन कार्ड नहीं मिलेगा.

गऱीबी रेखा से नीचे वाले नागरिकों के लिए, BPL- वह परिवार जिसकी वार्षिक आय 1,80,000/ से कम है, उसे पीले रंग का ये बीपीएल कार्ड ज़ारी होता है और साल में 1 लाख से भी कम कमाने वाले, समाज के अत्यंत निर्धन समूह के लिए, लाल रंग का ‘अन्त्योदय कार्ड’ ज़ारी होता है. इन कार्ड धारकों को, सस्ते गल्ले की आधिकारिक मासिक पात्रता इस तरह है- 2 रु प्रति किलो की दर से 5 किलो गेहूँ, 13.5 रु प्रति किलो की दर से 2 किलो चीनी, 13.63 प्रति लीटर की दर से 7 लीटर मिट्टी का तेल, 20 रु प्रति किलो की दर से 2.5 किलो दाल. सरसों का तेल भी मिला करता था लेकिन जैसे ही उसका रेट 200/ प्रति किलो के पार पहुंचा, उसकी आपूर्ति बंद हो गई. इतने मंहगे तेल की गऱीबों को क्या ज़रूरत!! ज़मीनी हक़ीक़त ये है कि गेहूं या चावल के आलावा कुछ भी नहीं मिलता.

राशन कार्ड महज़ एक कागज़ का टुकड़ा नहीं है. हमारे देश में ये, करोड़ों लोगों की श्वास नली है. इसके रद्द होने का मतलब है, छत्तीसगढ़ की वो बच्ची, जो भात-भात बुदबुदाते हुए मर गई, क्योंकि उनका राशन कार्ड आधार कार्ड से लिंक नहीं होने के कारण, उस परिवार को राशन देने से मना कर दिया गया था. सारा देश वो हकीक़त इसलिए जान पाया, क्योंकि एक साहसी पत्रकार उस तथ्य को देश के सामने लाया. ‘विश्व गुरु’ भारत में, जाने कितने मासूम, मज़लूम, बाज़ार भाव से, अपने जीने लायक़ अन्न ना खऱीद पाने की वज़ह से धीमी मौत मरते जा रहे हैं. केन्द्रीय खाद्य एवं आपूर्ति राज्य मंत्री, संसद में ये स्वीकार कर ही चुकी हैं कि 2018 से 2020 के बीच, 3 सालों में, देश में करोड़ों फर्जी राशन कार्ड रद्द हुए. उस दौरान, हरियाणा में कुल 3.91 लाख राशन कार्ड रद्द हुए.

मूल प्रश्न ये है कि देश में, अगर इतनी बड़ी तादाद में फर्जी  राशन कार्ड बने, तो ये एक अत्यंत गंभीर घोटाला है. इसकी जि़म्मेदारी तय होनी चाहिए थी. सबसे पहले तो ‘माननीय’ मंत्री जी को ही बर्खास्त किया जाना चाहिए था. हज़ारों की संख्या में उन अधिकारियों और उनके लगुए-भगुओं को जेलों में डाला जाना चाहिए था जिन्होंने फर्जी राशन कार्ड बनाने का गोरखधंधा चलाया. जब मर्जी  राशन कार्ड बना दिए, जब मर्जी  रद्द कर दिए; ये बहुत अमानवीय, कू्रर मज़ाक़ है जिसकी जि़म्मेदारी तय होनी चाहिए. सरकार सब जानती है, अगर नहीं जानती तो जान ले, कि फज़ऱ्ी राशन कार्ड बनाने का काम रसूखदार लोग करते हैं. उनके बनाए कार्ड रद्द भी नहीं होते. रद्द तो गऱीबों के ही कार्डों को होना पड़ता है. पिछले तीन सालों में भी यही हुआ और आज भी वही होगा.

मोदी सरकार की कुछ चारित्रिक विशिष्टताएं हैं, जिसे अब लोग समझते जा रहे हैं. ये सरकार, आज तक आई सरकारों में सबसे ज्यादा मज़दूर-विरोधी और मज़लूम-विरोधी है. दूसरी ख़ासियत ये है कि इसके काम करने का तरीका ‘झांसेबाज़ी’ वाला है. सारे मंत्री-संत्री घोषणावीर हैं. राज्य सरकारें, स्वाभाविक रूप से केंद्र सरकार का अनुकरण करती हैं. ‘डबल इंजन’ वाली तो हू-ब-हू करती हैं. ढोल-ढमाकों के साथ ऊँची-ऊँची घोषणाएँ करो, मीडिया द्वारा उसे एक ‘ऐतिहासिक इवेंट’ बनाओ और भूल जाओ!! बिना तथ्यों को जांचे-परखे, एकदम लहरीपने से, गऱीबों की आय, कागजों में बढाओ. इससे, एक तो गऱीब, गऱीबी रेखा से ऊपर उठ जाएँगे और दूसरे उनके राशन कार्ड रद्द हो जाएँगे. इस वक़्त की सबसे रसीली घोषणा, मोदी जी द्वारा, ये की गई है कि 81.6 करोड़ लोगों को सरकार मुफ़्त अनाज देगी. सब जानते हैं कि ये झांकी अगले लोकसभा चुनावों तक जमाई जाएगी. सरकार की असल मंशा जानना कोई राकेट साइंस नहीं. उसकी नीयत है कि दुनियाभर में मोदी सरकार की गऱीबपरस्ती का डंका बजे, देश के लोग 2024 के चुनावों में मुफ्त राशन की ख़ुमारी में अपने सब दु:ख दर्द भूलकर झूम जाएँ और फिर से उसी सरकार को चुनें, जो चंद कॉर्पोरेट के मुनाफ़े के लिए गऱीब-गुरबा को बेरहमी से निचोड़ रही है और पल्ले से कुछ जाए भी ना. राशन कार्ड रद्द कर अनाज बचाओ और उसे खैरात के रूप में बांटो और तालियाँ समेटो!!

कोरोना महामारी में जब लोगों के सामने महामारी से भी ज्यादा भुखमरी से मरने की नौबत आ गई थी, तब अप्रैल 2020 में मोदी सरकार ने 80 करोड़ लोगों को हर महीने 5 किलो मुफ़्त अनाज देने की घोषणा की थी. ये बात सब जानते हैं. वह योजना बंद हो गई, ये कितने लोगों को मालूम पड़ा? अब फिर, 81.6 करोड़ लोगों को मुफ़्त अनाज देने की घोषणा हुई और पालतू मीडिया के गले का पट्टा खोल दिया गया. देशभर में कानफाडू शोर मच गया और अखबारों में दरबारी पत्रकारों के, मोदी सरकार की दरियादिली के लम्बे-लम्बे लेख छप गए. दूसरी ओर, करोड़ों लोगों की आय अधिक बताकर,1 जनवरी से उनका राशन बंद करने की चेतावनी ज़ारी हुई. पालतू मीडिया में कहीं कोई आवाज़ सुनाई पड़ी? हिटलर के प्रोपेगंडा मंत्री, गोएबेल ने ऐसे ही नहीं कहा था, “मुझे कुछ दिन के लिए मीडिया सौंप दो और मैं पूरे देश को सूअरों के झुण्ड में बदल डालूँगा’!! आज के गोएबेल और आज का मीडिया उस वक़्त से कहीं अधिक काइयां हैं.

जिन्हें कार्ड रद्द होने के नोटिस मिले हैं, उनमें से कितने लोग, अपनी दिहाड़ी गंवाकर, राशन कार्ड दुरुस्त कराने की अनंत लाइन में लगकर, अपने राशन कार्ड बचा पाएंगे और कितने हाय सी मारकर बैठ जाएँगे, किसे मालूम? हर जि़ले के लघु सचिवालयों पर हडक़ंप मचा हुआ है. भीषण ठण्ड में दिनभर खड़े रहकर, बेक़सूर गऱीब लोग बीमार पड़ रहे हैं. अफऱा-तफऱी मची हुई है. कई जगह, इन बेहाल लोगों के ‘पेशेवर मददगार’ प्रकट हो गए हैं, जो ‘काम तो हो जाएगा, कुछ खर्च करना पड़ेगा’, कहकर लोगों को ठग रहे हैं. राशन कार्ड में अनुचित आमदनी दर्ज कराने वाले अफ़सरान और उनके आक़ा असल क़सूरवार हैं. उन्हें दंडित किया जाना चाहिए. इस पूरे के पूरे फऱमान को तत्काल वापस लिया जाना चाहिए. कहीं किसी राशन कार्ड में वाक़ई ग़लती है तो उसे ज़रूर दुरुस्त किया जाना चाहिए.

गर राशन कार्ड वाक़ई फज़ऱ्ी है, तो उसे रद्द किया जाए लेकिन उसे बनाने वाले कर्मचारी- अधिकारी को भी बरखाश्त कर, गिरफ्तार किया जाए. गऱीबों-मेहनतक़शों को थोड़ी भी सम्मानपूर्ण जि़न्दगी जीने की ख्वाहिश है तो उन्हें संगठित हो संघर्ष करने के सिवा पर्याय नहीं.

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Mazdoor Morcha
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