फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) एफएमडीए शहर को आज तक ढंग से आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा सका, लेकिन जनता की गाढ़ी कमाई की बंदरबांट करने के लिए शहर में ऑप्टिकल फाइबर और एक हज़ार सीसीटीवी कैमरों का जाल बिछाने की योजना तैयार कर रहा है। अस्सी करोड़ रुपये की इस परियोजना से जनता को कोई लाभ नहीं होने वाला।
यह परियोजना रुपयों की बंदरबांट नजर आ रही है, क्योंकि एक हजार कैमरे लगाने का बजट साठ करोड़ रुपये रखा गया है यानी एक कैमरा लगाने की कीमत छह लाख रुपये आएगी। सुधी पाठक जान लें कि वर्तमान में बाजार में एचडी रेजोल्यूशन वाला अत्याधुनिक पैन, टिल्ट, जूम (पीटीज़ेड) ब्रांडेड कैमरा 26 हजार से 40 हजार के बीच फुटकर कीमत में उपलब्ध है। 4के रेजोल्यूशन पीटीजेड कैमरा भी फुटकर में 75 हजार से 90 हज़ार रुपये में उपलब्ध है। यानी इन्हें यदि बड़ी मात्रा में खरीदा जाएगा तो इनकी कीमत चालीस से पचास प्रतिशत तक कम हो सकती है। यदि फुटकर रेट पर भी खरीद मानी जाए तो एचडी पीटीजेड का कुल खर्च तीस से पचास हज़ार रुपये और 4के पीटीज़ेड का खर्च 80 से 95 हज़ार रुपये से ज्यादा नहीं आएगा। इनका इंस्टालेशन खर्च भी एक हज़ार रुपये प्रति कैमरा जोड़ लिया जाए तब भी कीमत बमुश्किल 50 हजार से एक लाख रुपये प्रति कैमरा आएगी, जबकि एफएमडीए एक सीसीटीवी कैमरा छह लाख रुपये में लगाएगा।
पाठकों को लग सकता है कि इसमें सीसीटीवी कैमरों की नेटवर्किंग और कमांड सेंटर बनाने का खर्च भी जुड़ा होगा, तो बता दें कि एफएमडीए ने इसके लिए बीस करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट अलग से बनाया हुआ है। इस बीस करोड़ रुपये में पूरे शहर में ऑप्टिकल फाइबर का जाल बिछाया जाएगा। रही बात नेटवर्किंग एंड कमांड सेंटर की तो वह सेक्टर बीस में स्मार्ट सिटी के तहत पहले से ही बना हुआ है। एफएमडीए के चीफ इंजीनियर रमेश बागड़ी के अनुसार ऑप्टिकल फाइबर बिछ जाने से सड़कों पर लगे सीसीटीवी कैमरे बेहतर रूप से काम कर सकेंगे। उनके अनुसार शहर में स्मार्ट सिटी के तहत 1200 कैमरे लगे हुए हैं, इनकी नेटवर्किंग के लिए फिलहाल निजी कंपनियों का इंटरनेट इस्तेमाल किया जाता है जिसके लिए हर साल मोटा भुगतान किया जा रहा है।
पाठकों को बताते चलें कि एफएमडीए जो ऑप्टिकल केबल का जाल बिछाएगा उससे सभी विभाग तो आपस में जुड़ जाएंगे, इसे इंट्रानेट कहते हैं, यानी सभी सरकारी विभागों के बीच बिना इंटरनेट के ही सूचनाओं का आदान प्रदान हो जाएगा, लेकिन इंटरनेट के जरिए बाहरी दुनिया से जुडऩे के लिए किसी न किसी निजी ऑपरेटर की सेवाएं तब भी लेनी पड़ेंगी, जैसी कि आज भी ली जा रही हैं। उदाहरण के लिए ऑप्टिकल फाइबर के जरिए इंट्रानेट से जुडऩे के कारण फरीदाबाद पुलिस को बीके अस्पताल से कोई डेटा तुरंत हासिल हो जाएगा लेकिन चंडीगढ़ से आने वाली मेल या अन्य डेटा के लिए उसे इंटरनेट कनेक्शन की जरूरत पड़ेगी ही। यही व्यवस्था इंट्रानेट से जुड़े सभी विभागों पर लागू होगी, इसलिए एफएमडीए के अधिकारियों का दावा कि निजी इंटरनेट कंपनियों पर निर्भरता समाप्त हो जाएगी पूरी तरह गलत है।
एक हज़ार नए सीसीटीवी कैमरे लगाने से बेहतर होगा कि एफएमडीए शहर में पहले से लगाए गए सभी 1200 सीसीटीवी कैमरों का संचालन सुनिश्चित करे। शहर के प्रमुख चौक-चौराहों को छोड़ दिया जाए तो शायद अधिकारी भी नहीं बता पाएंगे कि ये 1200 कैमरे कहां-कहां लगे हैं और सभी काम कर भी रहे हैं या नहीं। कहने को तो इन कैमरों को अपराध पर अंकुश लगाने के लिए लगाया गया था लेकिन बीते आठ दस साल में पुलिस ने शायद ही कभी ये बताया हो कि स्मार्ट सिटी के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज के कारण अपराधी पकड़े गए हैं, इसके विपरीत निजी दुकान, घरों में लगे सीसीटीवी कैमरे पुलिस के ज्यादा मददगार साबित हुए हैं। हां, इन सीसीटीवी कैमरों का इस्तेमाल वाहनों का चालान काटने में भरपूर किया जा रहा है, यानी जनता के टैक्स से वसूली गई धनराशि को उससे और ज्यादा वसूली करने वाली तकनीकी लगाने पर खर्च किया गया।
वरिष्ठ समाजसेवी सुरेशचंद गोयल कहते हैं कि जिस शहर में जनता को साफ हवा, पीने का पर्याप्त पानी मुहैया नहीें हो, जहां सीवर ओवरफ्लो की समस्या हो, सड़क के गड्ढों में गिरने से मासूम नागरिकों की जान जा रही हो, वहां सीसीटीवी, ऑप्टिकल फाइबर जैसी आधुनिक तकनीकी तब तक लाना बेमानी है जब तक आम जनता को पूरी सहूलियत न उपलब्ध करा दी जाएं। इन सीसीटीवी कैमरों में वाहन जेब्रा क्रॉसिंग का उल्लंघन करते तो नजऱ आ जाएंगे लेकिन सड़क पर होने वाला जलभराव, गड्ढोंं के कारण होने वाली परेशानी, गलत स्थान पर लगाई गई ट्रैफिक लाइट आदि समस्याएं नहीं दिखेंगे।
राजनीतिक-सामाजिक जानकार कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल में लॉंच किया गया स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट विकास की जगह केवल करोड़ों रुपयों की बंदरबांट वाला प्रोजेक्ट बन कर रह गया। बुरी तरह से फ़्लॉप हुए इस प्रोजेक्ट पर डबल इंजन सरकारों ने अंधाधुंध पैसा खर्च किया लेकिन ये भ्रष्टाचार का प्रोजेक्ट ही साबित हुआ। खर्च किए गए धन के अनुरूप परिणाम मिले या नहीं, लगता है न तो सरकार ने इसका आकलन किया और भारत व राज्यों के नियंत्रक एवं लेखा परीक्षक (सीएजी, एजी) ने।
अब सरकार लाज बचाने के लिए इस प्रोजेक्ट को एफएमडीए या ऐसी ही संस्थाओं को सौंप रही हैं, यहां बैठे भ्रष्ट अधिकारी भी सरकार की तर्ज पर काम नहीं काम का ढिंढोरा पीट कर करोड़ों रुपये इधर उधर करने में ही लगे हुए हैं।