फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) घोषणावीर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके चेले खट्टर ने कचरे से बिजली बनाने का ढिंढोरा पीट चीन की कंपनी ईकोग्रीन के नाम पर अपने संघी मित्रों को अरबों रुपये का लाभ पहुंचाया। अब कंपनी द्वारा छोड़ी गई गंदगी का बोझ मासूम जनता पर डाला जा रहा है। देश के टॉप दस प्रदूषित शहरों की सूची में लगभग पूरे साल शामिल रहने वाले फरीदाबाद और गुडग़ांव में वेस्ट टू चारकोल प्लांट लगाने की तैयारी की जा रही है। ईकोग्रीन को लूट की खुली छूट देने वाले खट्टर ने ही उसके द्वारा बंधवाड़ी में खड़े किए गए करीब 21 लाख मीट्रिक टन कचरे के पहाड़ से चारकोल बनाने के लिए एनटीपीसी विद्युत व्यापार निगम लिमिटेड (एनवीवीएनएल) के साथ समझौता किया है।
इसके तहत बंधवाड़ी और जिले के मोठुका गांव में वेस्ट टू चारकोल प्लांट लगाया जाना है। एनवीवीएनएल के सीईओ रेनू नारंग के अनुसार यह देश के सबसे बड़े वेस्ट टू चारकोल प्लांट होंगे जिनमें प्रतिदिन 1500-1500 टन कचरे को चारकोल में बदला जाएगा। पर्यावरणविदों के अनुसार कचरे से चारकोल बनाने की प्रक्रिया को पायरोलिसिस या गैसीफिकेशन कहा जाता है। इस प्रक्रिया में प्रमुख रूप से कार्बन मोनो ऑक्साइड पैदा होती है यह बहुत ही जहरीली होने के कारण नवर्स सिस्टम को बुरी तरह डैमेज कर सकती है। प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर कार्बन डाई ऑक्साइड भी उत्पन्न होती है जो ग्रीन हाउस गैस है यानी क्षेत्र का तापमान बढ़ जाएगा जिसका दुष्परिणाम जीव-जंतु-वनस्पतियों पर पड़ता है। इनके अलावा कचरा जलने से वोलाटाइल आर्गेनिक कंपाउंड भी उत्पन्न होते हैं ये भी स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह साबित हो सकते हैं। इनके अलावा हवा में पर्टिकुलेट मैटर पीएम 2.5 की मात्रा बढ़ती है। पीएम 2.5 किसी भी तरह के ईंधन के दहन से उत्पन्न होता है, मोटे तौर पर ईंधन जलने से निकलने वाला धुआं पीएम 2.5 का प्रमुख स्रोत है।
समझने वाली बात है कि फरीदाबाद देश के उन शहरों में प्रमुखता से शामिल है जहां की वायु गुणवत्ता लगभग साल भर खराब और बेहद खराब की श्रेणी में बनी रहती है। ऐसे में मोठुका गांव में वेस्ट टू चारकोल प्लांट लगाया जाना सरकार की नासमझी को ही दर्शाता है। खराब वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए एनजीटी जिला प्रशासन से लेकर नगर निगम तक को डांट लगा चुका है, नगर निगम पर तो करीब सवा दो करोड़ रुपया जुर्माना भी लगाने का ड्रामा भी किया गया है। क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को आए दिन दिशा निर्देश जारी करता रहता है, इसके बावजूद यहां चारकोल प्लांट लगाए जाने का सरकार का फैसला आश्चर्य नही पैदा करता है। कारण अपनी चहेती चीन की कंपनी ईकोग्रीन पर अरबों रुपये लुटाने वाले मोदी-खट्टर उसकी हर गलती और कमियों का मूल्य जनता की कीमत पर चुकाने को तैयार नजर आ रहे हैं।
हालांकि मोठुका में प्लांट आसानी से लग जाएगा ऐसा नजर नहीं आता लेकिन जिस तरह सरकार हठधर्मी करती है उससे लगता है कि ग्रामीण यदि कमजोर पड़े तो प्लांट लग जाएगा। इससे पहले भी सरकार ईकोग्रीन कंपनी की गलतियां ढांपने के लिए वजीरपुर, पाली, प्रतापगढ़ सहित चार गांवों में डंपिंग यार्ड बनाने पर अड़ी हुई थी। केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर ने तो विरोध करने वालों को खुला चैलेंज कर दिया था कि वजीरपुर में डंपिंग यार्ड बनकर ही रहेगा। वो तो विधायक राजेश नागर ने किसी तरह कह सुन कर यहां का प्रोजेक्ट बंद करवाया था वरना गूजर-खट्टर तो डंपिंग यार्ड वही बनवाने पर पूरी तरह उतारू थे।
वैसी ही एकता और विरोध मोठुका और आसपास के गांव वालों को तब तक दिखानी होगी जब तक सरकार प्लांट यहां से हटाए जाने की घोषणा नहीं कर देती। बताते चलें कि वेस्ट टू चारकोल बनाने का समझौता सरकार ने 20 जुलाई 2024 को किया था। तब मोठुका और बंधवाड़ी में प्लांट बनाया जाना भी तय हो गया था। विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सरकार ने इस प्रोजेक्ट पर चुप्पी साध ली और संघी-भाजपाइयों ने भरपूर प्रयास किए कि चुनाव में यह मुद्दा न बन सके, इसके लिए लोगों से झूठे वादे भी किए गए कि चुनाव बाद प्रोजेक्ट कहीं दूसरी जगह शिफ़्ट करवा दिया जाएगा, वो कामयाब भी हुए छोटे-मोटे विरोध के अलावा कुछ नहीं हुआ। चुनाव जीतते ही सरकार ने प्रोजेक्ट पर काम चालू कर दिया। संघी-भाजपाइयों के छल में फंस कर भाजपा को वोट देने वाले ग्रामीण अब खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं।
जैसे ही प्रशासन ने प्रोजेक्ट की तैयारी शुरू की वैसे ही ग्रामीण विरोध पर उतर आए। लोगों का कहना है कि अगर यहां प्लांट लगा तो यह उनके लिए और आने वाली पीढिय़ों के लिए खतरनाक साबित होगा। क्षेत्र की हवा तो दूषित होगी ही मृदा और जल भी प्रदूषित होंगे। सांस के रोग तेजी से बढ़ेंगे। ग्रामीणों को चिंता है कि जिस प्रकार बंधवाड़ी में लीचेट की सीपेज से भूजल जबरदस्त दूषित हुआ है और आसपास के इलाके में कैंसर के मरीजों में वृद्धि हुई है प्लांट लगने से वैसे ही परिणाम इस इलाके में भी शुरू हो सकते हैं। यह भी चिंता जताई कि प्लांट लगने से इलाके निवेश कम होगा जिससे विकास कार्यों की गति थम जाएगी।
प्लांट के विरोध में अरूआ, छांयसा, मौजपुर, अटाली, फैजपुर खादर, खादर, साहूपुरा खादर, शाहजहांपुर खादर, चांदपुर, कौराली, बहादरपुर आदि 20 गांवों के लोग उतर आए हैं। रविवार को फज्जूपुर के पूर्व सरपंच रघुराज की अध्यक्षता में हुई बैठक में 51 सदस्यीय वेस्ट- टु-चारकोल विरोध संघर्ष समिति का गठन हुआ। तय हुआ कि किसी भी सूरत में यहां पर वेस्ट-टु- चारकोल प्लांट स्थापित नहीं होने दिया जाएगा समिति शासन-प्रशासन से वार्ता कर इस प्लांट को रुकवाएगी।
सुधी पाठकों को बताते चलें कि यह वही मोठुका गांव है जहां खट्टर ने बड़े जोर शोर से अटल बिहारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल को लेने की घोषणा की थी। दस साल होने वाले हैं लेकिन मेडिकल कॉलेज तो दूर अस्पताल भी ठीक से नहीं चला पाए। कहने को तो मेडिकल कॉलेज है लेकिन ओपीडी बमुश्किल साठ- सत्तर होती है,आईपीडी तो चल ही नहीं रही, प्रसव पीडि़ताओं को रेफर किया जाता है। सरकार वहां स्वास्थ्य सेवाएं तो मुहैया करवा नहीं पाई लेकिन प्रदूषण से लोगों की जान आफत में डालने की पूरी तैयारी में जुटीहै।