मज़दूर मोर्चा ब्यूरो गत सप्ताह एक बड़े राष्ट्रीय दैनिक अखबार द्वारा बताया गया था कि ईएसआईसी के सनथनगर हैदराबाद स्थित मेडिकल कॉलेज अस्पताल में आने वाले सभी प्रकार के मरीजों का इलाज उसी अस्पताल में हो जाता है। किसी भी मरीज़ को किसी भी प्रकार के इलाज के लिए अन्य अस्पतालोंं को रेफर नहीं किया जाता। बेशक यह पूरा सच नहीं है, फिर भी इसे सच मानने में कोई हर्ज नहीं है। समझने वाली बात केवल इतनी है कि यह संस्थान इतने ऊंचे पायदान तक पहुंच कैसे पाया?
सन 2008 में तत्कालीन डीजी चतुर्वेदी ने यहां एक सुपर स्पेशलिटी अस्पताल स्थापित कराया था। इसमें डॉक्टरों को मुंहमांगा वेतन तक दिया गया था, लेकिन नॉन-टीचिंग अर्थात मेडिकल कॉलेज न होने की वजह से यह तजुर्बा सफल न हो सका। इसलिए यहां सन् 2016 में मेडिकल कॉलेज शुरू किया गया। लेकिन मुख्यालय में बैठे मेडिकल शिक्षा विरोधी गिरोह ने इसे भी सफल नहीं होने दिया। इत्ते फाक से सन् 2015 में सनथ नगर क्षेत्र के सांसद बंडारू दत्तात्रेय केन्द्रीय श्रममंत्री बन गए तो उन्होंने इसे कामयाब बनाने का बीड़ा उठा लिया। इसके लिए उन्होंने एम्स दिल्ली के डॉक्टर एम श्रीनिवास से बातचीत करके जनवरी 2016 में उन्हें इस मेडिकल कॉलेज का डीन बनने के लिए राजी कर लिया। मंत्री दत्तात्रेय ने डॉ. श्रीनिवास को प्रति नियुक्ति पर जाने की छूट भी उनके संस्थान से दिलवा दी। डॉक्टर श्रीनिवास की नौकरी तो एम्स में पक्की थी ही और ऊपर से मंत्री जी का हाथ सिर पर होने के चलते, उन्होंने न तो कभी मुख्यालय में बैठे गिरोह की कोई परवाह की और न ही सनथ नगर में तैनात उनके प्यादों की।
सनथ नगर में तमाशा यह था कि जिस परिसर में मेडिकल कॉलेज था उसी परिसर में राज्य द्वारा संचालित ईएसआई अस्पताल भी था, जबकि कॉर्पोरेशन का अपना मॉडल अस्पताल एक अन्य परिसर में चल रहा था। डॉ. श्रीनिवास ने सबसे पहले इनकी अदला-बदली करके कॉर्पोरेशन द्वारा संचालित अस्पताल को अपने परिसर में ले लिया। उस वक्त वहां पर एक एसएमसी (स्टेट मेडिकल कमिश्नर) डॉ. पी.के. जैन तथा दो एमएस (चिकित्सा अधीक्षक) तैनात थे। ये तीनों ही डॉ. श्रीनिवास को कुछ नहीं समझते थे। समझते भी क्यों, क्योंकि सारी वित्तीय शक्तियां तो इन्हीं के हाथों में थी। इसके चलते ये डीन के हर काम में रोड़ा अटकाने में सक्षम थे। इतना ही नहीं तमाम दफ्तरी स्टाफ यानी कि फाइल दबा कर बैठने वाले बाबू भी डीन की कोई परवाह नहीं करते थे। ऐसे भयंकर हालात में डॉ. श्रीनिवास ने मंत्रीजी का संरक्षण पाते हुए सबसे पहले तो एसएमसी व दोनों एमएस को वहां से खदेड़ा, फिर बाबूओं से निपटने के लिए कड़े कदम उठाए तो वे हड़ताल पर चले गए। डीन ने इसकी परवाह नहीं करते हुए संस्थान को इनके बगैर ही पूरी दक्षता के साथ चलाए रखा तो बाबूओं के तेवर ढीले पड़ गए और वे हाथ-पैर जोड़कर काम पर लौट आए। दरअसल, इन सब लोगों को मुख्यालय में बैठे अपने आकाओं से संरक्षण की उम्मीद थी जो मंत्रीजी के होते उन्हें उपलब्ध नहीं हो पाया।
इस कठिन दौर से गुजरने के बाद डीन को वे सभी अधिकार विशेषकर वित्तीय शक्तियां प्राप्त हो गई जिनके बल पर इन्होंने मेडिकल कॉलेज तथा अस्पताल को चलाने के लिए हर वह काम किया जिसकी उन्हें आवश्यकता थी। जिन-जिन उपकरणों, मशीनों एवं किसी भी प्रकार के साजो-सामान की आवश्यकता थी इन्होंने खुल कर खरीदा। उन्हें जितने फैकल्टी एवं स्टाफ की आवश्यकता थी खुल कर भर्ती किया व कराया। डीन का मंत्रीजी से सीधा सम्पर्क होने चलते मुख्यालय में बैठे हरामखोर कमिश्नरों की हिम्मत नहीं होती थी कि वे डॉ. श्रीनिवास के किसी भी काम में रुकावट डाल सकें। शुरू-शुरू में इन कमिश्नरों ने डीन के ईमेल को दबा कर ही रखा था लेकिन जब मामला मंत्री के नोटिस में आया तो उन्हें अच्छी-खासी डांट फटकार से दो-चार होना पड़ा था।
डॉ. एम श्रीनिवास की कार्यशैली तथा उनके द्वारा की गई प्रगति का का$फी लाभ फरीदाबाद मेडिकल कॉलेज के तत्कालीन डीन डॉ. असीम दास ने भी उठाया। जो-जो रियायतें डॉ. श्रीनिवास को मिलती थीं अथवा उनकी ईमेल दबाने पर मुख्यालय में बैठे कमिश्नरों की जो फजीहत होती थी, उसका लाभ उठाते हुए डॉ. असीम दास ने भी अपने संस्थान के लिए बहुत कुछ हासिल करने में सफलता पाई। उसी का परिणाम है कि आज फरीदाबाद का मेडिकल कॉलेज अस्पताल किसी भी तरह से सनथ नगर वाले से पीछे नहीं है बल्कि यहां तो न केवल मानेसर, गुडग़ाव, नोएडा, दिल्ली और तो और बसई दारापुर वाले मेडिकल कॉलेज से मरीज रेफर होकर बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। सनथ नगर में कम से कम इस तरह की फटीक तो नहीं है।
ईएसआई कॉर्पोरेशन के जीरो रेफरल होने में रुकावटें बेशक सनथ नगर में अभी भी कैंसर मरीज़ों के लिए पैट स्कैन और रेडियोथरेपी तथा कुछ अन्य सुपर स्पेशलिटी ट्रीटमेंट को लेेकर कुछ कमियां हैं और यही कमियां फरीदाबाद के साथ-साथ अन्य संस्थानों में भी हैं। अब देखने वाली बात यह है कि ये कमियां क्यों हैं और इन्हें दूर करने में कोताही क्यों बरती जा रही है? कॉर्पोरेशन का थोड़ा सा इतिहास खंगालने से पता चलता है कि प्रत्येक श्रममंत्री ने अपने-अपने गृह क्षेत्र पर ही ध्यान देने का प्रयास किया। दत्तात्रेय जी को केवल सनथ नगर ही दिख रहा था तो मलिकाजुर्ऩ खडग़े को गुलबर्गा और शीशराम ओला को अलवर। श्रममंत्री न होते हुए भी एक कांग्रेसी नेता को अपना गृह क्षेत्र मंडी (हिमाचल) दिख रहा था जहां आईपी न होते हुए भी मेडिकल कॉलेज खुलवा दिया गया। इसके विपरीत भूपेन्द्र सिंह यादव को श्रममंत्री होते हुए अपना गृह क्षेत्र गुडग़ांव नजर नहीं आया।
इस मामले में मौजूदा श्रममंत्री डॉ. मनसुख मांडविया बधाई के पात्र हैं जिन्हें पूरा भारत वर्ष दिखाई दे रहा है। इसके लिए दस मेडिकल कॉलेजों में तो इसी वर्ष दाखिला हो चुका है तथा अन्य में अगले वर्ष शुरू हो जाएगा। यानी उनके छोटे से कार्यकाल में 20 मेडिकल कॉलेज शुरू होने जा रहे हैं। जबकि इससे पहले कुल 10 मेडिकल कॉलेज ही खुल पाए थे। ‘मज़दूर मोर्चा’ पहले भी कई बार लिख चुका है कि पढऩे-पढ़ाने वालों डॉक्टरों के द्वारा बेहतरीन सुपर स्पेशलिटी ट्रीटमेंट संभव है जो अन्यथा नहीं है। लेकिन मुख्यालय में बैठे जनविरोधी एवं निकम्मे कमिश्नरों की $फौज इस बात को समझने के लिए कतई तैयार नहीं है। वे अपनी ओर से इन संस्थानों के काम में रोड़े अटकाने में कोई कोर-कसर छोडऩा नहीं चाहते। एक ओर तो ये लोग ज़ीरो रेफरल की बात करते हैं और दूसरी ओर स्टा$फ व अन्य आवश्यकताओं की आपूर्ति में बाधाएं खड़ी करते हैं। यदि ये तमाम बाधाएं हट जाएं, स्टा$फ एवं अन्य आवश्यक साजो-सामान की निर्बाध आपूर्ति होती रहे तो हजारों करोड़ का रेफरल बिल जीरो हो सकता है। यदि ये ज़ीरो हो जाए तो कमीशनखोरों को कमीशन कहां से मिलेगा?
दुर्भाग्य की बात तो यह है कि डॉ. एम श्रीनिवास तथा डॉ. असीम दास अपने-अपने संस्थानों को अंतिम ऊंचाइयों पर ले जा पाते इससे पहले ही दत्तात्रेयजी श्रममंत्री पद से हट गए। इसके परिणामस्वरूप मुख्यालय में बैठे कमिश्नरों का गिरोह फिर से हावी होने लगा। किसी भी मेडिकल कॉलेज को ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए एमबीबीएस के बाद पीजी और उसके बाद पोस्ट पीजी जैसे पाठ्यक्रम चलाने जरूरी होते हैं। पोस्ट पीजी पाठ्यक्रम पूरा करने वालों को डीएम तथा एमसीएच की डिग्रियां मिलती हैं। ये पाठ्यक्रम सुपरस्पेशलिटी ट्रीटमेंट के लिए आवश्यक होते हैं और जब तक ये पाठ्यक्रम नहीं होंगे तो सुपर स्पेशलिटी ट्रीटमेंट के लिए मरीज़ों को रेफर करना ही पड़ेगा। बतौर डीन डॉ. असीम दास ने इन पाठ्यक्रमों की स्वीकृति नेशनल मेडिकल कमीशन से तो प्राप्त कर ली थी लेकिन मुख्यालय ने आज तक भी इसके लिए आवश्यक फैकल्टी स्वीकृत नहीं की है। इसके बदले में नॉन-टीचिंग स्पेशलिस्ट यहां पर थोप दिए गए हैं।
करीब दो वर्ष पूर्व हालात बदलने के साथ साथ डॉ. श्रीनिवास को एम्स का डायरेक्टर बनने का ऑफर आ गया तो उन्होंने वो जि़म्मेदारी संभाल ली और डॉ. असीम दास को अलवर भेज कर मुख्यालय ने का$फी हद तक राहत की सांस पा ली है। लेकिन एक समस्या जिसे मुख्यालय के कमिश्नर नहीं समझ पा रहे हैं कि जिस दिन एनएमसी ने ये नॉन टीचिंग वाली बात पकड़ ली तो ईएसआई कॉर्पोरेशन की फजीहत के साथ-साथ भारी-भरकम जुर्माना भी होना तय है। जहां तक सवाल फज़ीहत का है जिन बेशर्मों ने गत वर्ष अपने डीजी को ही कोर्ट खड़ा करा दिया हो उन्हें फज़ीहत की क्या परवाह हो सकती है। रही बात जुर्माने की, इन कमिश्नरों के घर से क्या जाता है, जाएगा तो मज़दूरों का ही पैसा। मंत्री जी को चाहिए यदि जुर्माना लगे तो इनके वेतन से वसूला जाए।