फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) घोषणावीर केन्द्रीय श्रममंत्री मनसुख मांडविया ने करीब एक वर्ष पूर्व 10 नए मेडिकल कॉलेज खोलने का दावा किया था। उनके अधीन ईएसआई कॉर्पोरेशन पहले से ही आठ मेडिकल कॉलेज तथा दो पोस्ट ग्रेजुएट (पीजी) संस्थान चला रहा है। मांडविया ने ढपोरशंख प्रधानमंत्री मोदी द्वारा मेडिकल कॉलेज में सीटें बढ़ाने को लेकर ये कॉलेज खोलने की घोषणा करते हुए कहा था कि 2025 में इन कॉलेजों में दाखिला शुरू हो जाएगा। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उक्त 10 में से मात्र पांच को ही चालू करने की स्वीकृति एनएमसी से (नेशनल मेडिकल कमीशन)से मिल पाई है। विदित है कि उक्त 10 चिह्नित स्थानों पर 300 बेड से अधिक के अस्पताल कार्पोरेशन बीते कई वर्षों से चलाता आ रहा है। इन्हें मेडिकल कॉलेज का स्वरूप प्रदान करने के लिए जो आवश्यक औपचारिकताएं निभाने के साथ-साथ इमारत का प्रबन्ध करना था, उसे कॉर्पोरेशन के निखट्टू एवं धूर्त अधिकारी नहीं कर पाए। ‘मज़दूर मोर्चा’ ने उसी वक्त लिख दिया था कि मुख्यालय में बैठे मौजूदा हरामखोर अधिकारी पूरा प्रयास करेंगे कि ये मेडिकल कॉलेज न बन पाएं। उसके बावजूद भी मंत्री मांडविया इस बात का कोई संज्ञान न लेते हुए इन हरामखोर अधिकारियों का कोई इलाज न कर पाए। इसका मतलब है कि मंत्री खुद भी इन कॉलेजों को चलाने में रुचि नहीं रखते थे, केवल घोषणा करके विदित है कि एसआर स्तर के डॉक्टर किसी भी मेडिकल कॉलेज अस्पताल की रीढ़ होते हैं। ये लोग ओपीडी, ओटी से लेकर वार्ड तक मरीजों से जुड़े होने के साथ-साथ एमबीबीएस व पीजी के छात्रों को पढ़ाने तक का काम भी करते हैं। किसी भी डॉक्टर को असिस्टेंट प्रोफेसर बनने के लिए तीन साल तक एसआरशिप अनिवार्य होती है। लेकिन मुख्यालय में बैठे मूर्ख एवं धूर्त अफसरों को इन सब बातों से क्या लेना-देना? उन्हें तो अपना खर्च घटाना है। जानकारों का कहना है कि तीन साल के लिए एसआर बनने वाली महिलाएं कम से कम एक बार तो जरूर छ: माह का मातृत्व अवकाश ले लेती हैं, बस इसी अवकाश का वेतन देना मुख्यालय को खल रहा है।
बीएमटी बंद है बीते करीब डेढ़ माह से बोन मैरो ट्रांसप्लांंटेशन (बीएमटी) पूर्णतया बंद है और इसके शुरू होने के कोई आसार भी नजर नहीं आते। इसके विशेषज्ञ डॉक्टर राहुल भार्गव जो गुडग़ांव के एक बड़े नामी अस्पताल में उच्च वेतन पर तैनात हैं, यहां आकर लगभग मुफ्त में अपनी सेवाएं देते आ रहे थे। डॉक्टर तो मुफ्त सेवा दे सकता है लेकिन दवाएं व अन्य स्टाफ का खर्च तो कॉर्पोरेशन को ही वहन करना पड़ता है। बताया जाता है कि एक बीएमटी केस वाहवाही लूटने में रुचि रखते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि एनएमसी ने निरीक्षण उपरांत इन सभी मेडिकल कॉलेजों को स्वीकृति प्रदान करने से मना कर दिया। विदित है कि यह स्वीकृति तभी दी जाती है जब मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के लिए सभी आवश्यक शर्तें पूरी की गईं हों। कॉर्पोरेशन द्वारा इन शर्तों को पूरा करना कोई कठिन काम नहीं था। यदि नीयत ठीक होती तो इस एक साल में न केवल सभी औपचारिकताएं पूरी की जा सकती थीं बल्कि नई इमारतें भी खड़ी की जा सकती थीं क्योंकि कॉर्पोरेशन के पास पैसे की कोई कमी नहीं है। नई इमारतों का निर्माण करना तो दूर किराए पर लेने तक कि जहमत इन अधिकारियों ने नहीं उठाई और मंत्री मांडविया जी सब कुछ टुकर-टुकर देखते रहे।
अपनी इज्जत बचाने के लिए श्रममंत्री मांडविया ने एनएमसी पर राजनीतिक दबाव डाल कर अपने पांच मेडिकल कॉलेजों के लिए 50-50 सीटों की स्वीकृति प्राप्त कर ली। इनमें सबसे गम्भीर बात तो यह है कि बसई दारापुर में करीब 14 वर्ष पूर्व मेडिकल कॉलेज की बिल्डिंग का निर्माण किया गया था जिसमें पूरा मेडिकल कॉलेज चलाने के बजाय केवल पीजी ही चलाया गया। उसके साथ 600 बेड का अस्पताल मौजूद है जिसमें पर्याप्त सुविधाएं न होने के चलते 300 से अधिक मरीज दाखिल नहीं रहते। इस संस्थान को भी एनएमसी ने केवल 50 सीटों की स्वीकृति प्रदान की है। यही स्थिति अंधेरी (मुंबई) स्थित पीजी मेडिकल कॉलेज की भी है। यानी कि वर्षों पुराने मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस कोर्स चालू करने के लिए आवश्यक शर्तों को कॉपोरेशन के हरामखोर अफसरान पूरा न कर सके। यदि ये सभी मेडिकल कॉलेज तमाम औपचारिकताएं एवं आवश्यक शर्तें पूरी करके चलाए जाते तो इस वर्ष 1000 अतिरिक्त युवाओं को डॉक्टर बनने का अवसर प्राप्त हो सकता था। लेकिन जनविरोधी सरकार की हरामखोरियों के चलते मात्र 250 युवाओं को ही यह अवसर प्राप्त हो पाएगा। इसके अतिरिक्त समझने वाली बात यह भी है कि एनएमसी पर दबाव डालकर जो स्वीकृति प्राप्त की गई है वहां छात्रों की पढ़ाई का स्तर एवं गुणवत्ता कभी भी संतोषजनक नहीं हो सकते। ऐसे में पढ़ाई करके जो डॉक्टर निकलेंगे वे जनता को कैसा इलाज दे पाएंगे, समय ही बताएगा।
इतना ही नहीं इन दस मेडिकल कॉलेजों के अलावा मांडविया ने 2026 में दस और मेडिकल कॉलेज चालू का भी दावा कर रखा है, दावा करने एवं घोषणा करने में तो कोई खर्चा लगता नहीं है, इसलिए बेखटके ये लोग ऐसा करते रहते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार 2026 में खुलने वाले तथाकथित मेडिकल कॉलेजों की दशा भी मौजूदा दस कॉलेजों से बेहतर नहीं हो सकती क्योंकि उन पर भी अभी तक कोई काम शुरू नहीं किया गया है।
फरीदाबाद में 25 सीटें बढ़ाने की मांग रद्द ईएसआई कॉर्पोरेशन के फरीदाबाद स्थित मेडिकल कॉलेज को शुरू में 100 सीटें मिली थीं। बाद में 150 तक करने की छूट भी तत्कालीन एनएमसी ने दे दी थी। लेकिन मुख्यालय में बैठे एक हरामखोर अफसर की वजह से इसे केवल 125 सीट का ही किया गया। इस वर्ष 25 सीटें और बढ़ा कर इसे 150 सीट का करने की अनुमति एनएमसी से मांगी गई थी। इसके लिए एनएमसी ने कॉलेज में मौजूद कुछ कमियों के बारे में पूछताछ की थी लेकिन कॉर्पोरेशन में बैठे उच्चाधिकारियों ने एनएमसी के पत्र का कोई जवाब देने की आवश्यकता ही नहीं समझी। इसके परिणामस्वरूप $फरीदाबाद को ये 25 सीटें नहीं मिल सकीं। नहीं मिल सकीं तो नहीं, इसके लिए जिम्मेवार अफसरों का क्या जाता है?
चौड़े में पकड़ा गया डीन का झूठ, पिटते-पिटते बचे तीन साल के लिए नियुक्त एक महिला एसआर की प्रेग्रेंसी के बारे में पता चलने पर मुख्यालय के वफादार डीन ने उन्हें बुलाकर डरा धमका कर नए सिरे से 39 दिन का फार्म भरवा लिया था। पहले से ही इस मुद्दे पर चल रही गहमा गहमी के दौरान इस मामले ने एसआर डॉक्टरों को इतना भड़का दिया कि उन्होंने पहले से लंबित अपनी तमाम मांगों को लेकर हड़ताल पर जाने संबंधी नोटिस 10 सितंंबर को प्रबंधन को दे दिया। 11 तारीख को ठीक नौ बजे सारे एसआर ने अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू कर दी, पूरे अस्पताल में हंगामा मच गया। मुख्यालय के दिशानिर्देशन में चलने वाले डीन ने बातचीत के लिए हड़ताली डॉक्टरों में से चार को अपने दफ्तर आने को कहा। एकजुट डॉक्टरों ने उनकी मांग ठुकराते हुए खुले में आकर सबके बीच बात करने को कहा। स्थिति को देखकर ढीले हो चुके डीन डॉ. दत्ताराय हड़तालियों के बीच पहुुंचे और उन्हेें बहलाने के लिए एक कमेटी के गठन की बात कहते हुए पत्र भी जारी कर दिया। हड़तालियों ने इसे सिरे से नकार दिया। उक्त गर्भवती डॉक्टर को डरा धमका कर 39 दिन के लिए नियुक्त करने को मुद्दा बनाते हुए हड़तालियों ने डीन बहादुर की अच्छी खासी खिंचाई करते हुए उन्हें महिला विरोधी तक घोषित कर दिया। स्थिति इतनी बिगड़ चुकी थी कि अगर कुछ वरिष्ठ डॉक्टर बीच बचाव न करते तो डीन के पिटने की नौबत आ गई थी।
बचाव की मुद्रा में आते हुए डीन ने चौड़े में झूठ बोला कि वह महिला तो उनसे कभी मिली ही नहीं। वहीं मौके पर खड़ी उस महिला डॉक्टर ने कहा कि वह एक बार नहीं दो बार मिली और आप झूठ बोल रहे हैं। चौड़े में हुई अपनी इस बेइज्जती से तो डीन के तोते ही उड़ गए। हड़तालियों ने उनकी जुबानी बात मानने से इनकार करते हुए कहा कि वे लिखित में आदेश जारी करें जो उन्होंने नहीं किया तो हड़ताल जारी है।
दरअसल, मुख्यालय के हरामखोर अफसरों ने डीन की वह स्थिति बना दी है कि सांप के बिल में हाथ वे देवें और मंत्र हेडक्वार्टर वाले पढ़ेंगे, स्पष्ट है कि संस्थान में जो कुछ भी डीन करेंगे उसकी प्रतिक्रिया सीधे तौर पर उन्हें ही भुगतनी होगी, न कि मुख्यालय में बैठे कामचोरों को। मुख्यालय के इशारे पर तमाम पीजी डॉक्टरों की आधी तनख्वाह काट ली गई है जो कि पूर्णतया गैर कानूनी है। इतना ही नहीं ठेके के तमाम डॉक्टरों व अन्य स्टाफ को खबर लिखे जाने तक वेतन नहीं दिया गया है जिनकी संख्या कुल स्टाफ के साठ प्रतिशत से अधिक है।