आदेश को नॉन-स्पीकिंग, समय पूर्व और असंवैधानिक बताया मज़दूर मोर्चा ब्यूरो चंडीगढ़ डेट रिकवरी ट्रिब्युनल-ढ्ढढ्ढ (डीआरटी-2) के अध्यक्ष एमएम ढोंचक ने अपनी बर्खास्तगी को पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी है। याचिका में उन्होंने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार ने बिना ठोस कारण बताए (नॉन-स्पीकिंग), समय से पहले (एंटी-टाइम्ड) और असंवैधानिक आदेश जारी किया।
याचिका में कहा गया है कि यह आदेश बिना जांच रिपोर्ट सौंपे और सुनवाई का कोई अवसर दिए ही पारित किया गया, जो संविधान के अनुच्छेद 311(2) और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। डॉ. ढोंचक को 20 फरवरी 2022 को डीआरटी-2 का पीठासीन अधिकारी नियुक्त किया गया था। उन्होंने 18 नवंबर 2025 के बर्खास्तगी आदेश को रद्द करने, उन्हें पद पर बने रहने की अनुमति देने और आदेश पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की है।याचिकाकर्ता ने अपनी 35 वर्ष से अधिक की न्यायिक सेवा का जिक्र करते हुए उल्लेख किया कि वह सिविल जज, अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, हरियाणा में जिला एवं सत्र न्यायाधीश, हाईकोर्ट रजिस्ट्री में ईमानदारी पूर्वक सेवाएं दे चुके हैं। गुडग़ांव के जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में 31 मार्च 2021 को सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें चार साल के लिए डीआरटी-2 का प्रमुख बनाया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि 24 अगस्त 2023 को जांच की मंजूरी दी गई, जबकि उन्हें कभी इसकी सूचना नहीं दी गई। उन्हें केवल 13 फरवरी 2024 को, जब उन्हें सस्पेंड किया गया तब जांच का पता चला। चार्जशीट 26 फरवरी 2024 को जारी हुई, यानी जांच आदेश के छह महीने बाद।
उनके निलंबन को भी कई बार अनुचित तरीके से बढ़ाया गया। 13 मई 2024 को फिर 5 नवंबर 2024 को, 6 मई 2025 और 3 नवंबर 2025 को जो 24 फरवरी 2026 तक चला। उन्होंने कहा कि इतनी लंबी सस्पेंशन के बावजूद सब्सिस्टेंस अलाउंस सिर्फ 50त्न ही रखा गया, जबकि नियमों के अनुसार इसे 75त्न करना चाहिए था, लेकिन कोई कारण नहीं बताया गया।
डॉ. ढोंचक ने दावा किया कि बर्खास्तगी आदेश को एंटी-टाइम्ड (पीछे की तारीख से) किया गया, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रिब्यूनल रिफॉम्र्स एक्ट, 2021 की कुछ धाराओं को रद्द करने के एक दिन बाद पारित हुआ। दिल्ली हाईकोर्ट में 19 नवंबर 2025 को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के वकील ने उनकी बर्खास्तगी आदेश का जिक्र तक नहीं किया। अगर आदेश उस समय अस्तित्व में होता, तो वकील इसे जरूर बताते। लगता है कि आदेश को सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नाकाम करने के इरादे से पीछे की तारीख से जारी किया गया, जो कानूनन अमान्य है। याचिका में उन्होंने बताया कि बर्खास्तगी एक एक्स-पार्टे जांच रिपोर्ट पर आधारित है, जो उन्हें कभी नहीं सौंपी गई। न कोई शो-कॉज नोटिस दिया गया और न ही व्यक्तिगत सुनवाई का मौका। संवैधानिक बेंच के एक फैसले का हवाला देते हुए बताया कि जांच रिपोर्ट की कॉपी न देना गंभीर अन्याय है। मेरिट पर याचिका में कहा गया कि चार्जशीट में मुख्यत: दो आरोप थे — वकीलों के प्रति असभ्य व्यवहार और लंबे स्थगन देना। उन्होंने कहा कि कोई विशिष्ट घटना, तारीख या दुव्र्यवहार का रिकॉर्ड नहीं दिया गया, जबकि जून 2023 से फरवरी 2024 तक हाइब्रिड सुनवाई चल रही थी।
स्थगन के बारे में उन्होंने दावा किया कि वे 39 डीआरटी में सबसे ज्यादा डिस्पोजल करने वाले प्रिसाइडिंग ऑफिसर थे, उनका डिस्पोजल 10 ट्रिब्यूनलों के कुल से ज्यादा था। उनके ट्रिब्यूनल में लगभग 12,000 मामले थे, जबकि दिल्ली हाईकोर्ट की एक डिवीजन बेंच ने 700-800 मामलों को प्रबंधन योग्य माना था। उन्होंने कहा कि बार के दबाव में स्थगन न देना, वकीलों की अवैध हड़ताल या काम से दूर रहने को मान्यता न देना मिसकंडक्ट यानी कदाचार नहीं हो सकती। अगर मनमाने काम रोकने को नहीं कहना और ट्रिब्यूनल को तारीख पर तारीख वाला न बनाना गंभीर आरोप है, तो वे इस अपराध के लिए गर्व से दोषी मानने को तैयार हैं।