अरावली तोडफ़ोड़ अभियान में प्रशासनिक कार्यशैली फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जिला प्रशासन इधर तोडफ़ोड़ का पाखंड कर अपनी रिपोर्ट तैयार कर रहा है, उधर भूमाफिया ने फिर से अपना निर्माण शुरू कर दिया है। दोबारा अवैध निर्माण करने वालों में नगर निगम का पूर्व चीफ टाउन प्लानर सतीश पाराशर प्रमुख है। उसका अवैध निर्माण टूटे दो दिन भी नहीं हुए थे कि उसने फिर से चहारदीवारी खड़ी कर डाली। हालांकि एक बार फिर अवैध निर्माण तोडऩे का नाटक किया गया, और दीवार का थोड़ा सा ऊपरी हिस्सा गिरा कर कर्तव्य की इतिश्री कर ली गई।
भाजपा की ट्रिपल इंजन सरकारों के कार्यकाल में अरावली पीएलपीए संरक्षित वन क्षेत्र में अवैध निर्माणों की बाढ़ आ गई। नगर निगम रिकॉर्ड के अनुसार 2018 में पूर्व निगमायुक्त एम शाईन के कार्यकाल में कराए गए सर्वे के दौरान अरावली संरक्षित वन क्षेत्र में 148 अवैध फार्म हाउस, बैंकट हॉल आदि चिह्नित गए थे। वर्तमान में अरावली में अवैध निर्माणों की संख्या 6793 पहुंच चुकी है जिनमें साढ़े पांच सौ से ज्यादा फार्म हाउस, बैंकट हॉल, नौकरशाह, उद्योगपतियों के शानदार विला, मैरेज हॉल आदि शामिल हैं। जाहिर है कि सबसे ज्यादा अवैध निर्माण मोदी-खट्टर-सैनी की ‘भ्रष्टाचार मुक्त’ और पर्यावरण संरक्षण का पाखंड करने वाली भाजपा सरकारों में हुआ। खास बात यह कि सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में अरावली संरक्षित वन क्षेत्र में अवैध निर्माण गिराने का आदेश दिया और इधर सत्ता के संरक्षण में हरियाली उजाड़ कर फार्म हाउस, मैरेज लॉन, गोशालाएं आदि बनते रहे।
सुप्रीम कोर्ट में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का समय नजदीक आया तो वह हरामखोर प्रशासनिक अधिकारी अवैध निर्माण गिराने पहुंच गए जिन्होंने भूमाफिया से सांठ गांठ कर इन निर्माणें को बनने दिया था। गतांक में मज़दूर मोर्चा ने ‘अरावली तोडफ़ोड़ : सुप्रीम कोर्ट के पाखंड की अनुपालना में प्रशासन का भी पाखंड’ शीर्षक से प्रकाशित किए गए समाचार मेंं तोडफ़ोड़ के दौरान किए जा रहे पक्षपात की विस्तार से जानकारी दी थी। प्रशासन ने राजनीतिक विरोधियों, बिना रसूख वालों, उद्योगपतियों आदि के अवैध निर्माण तोड़े लेकिन मंत्री विपुल गोयल के अवैध निर्माण को हाथ नहीं लगाया था, बताया जा रहा है कि सवाल न उठें इसके मद्देनज़र विपुल गोयल ने भी अपने फार्म हाउस की बाउंड्री वाल इक्का दुक्का जगह पर उतरवा दी है ताकि लगे कि यहां भी बुलडोजर चला था। मंत्री राजेश नागर के निर्माण पर तोडफ़ोड़ की औपचारिकता निभाई गई।
गौशाला, अवैध धार्मिक स्थलों की ओर तो देखा ही नहीं गया। हां, नगर निगम के चीफ टाउन प्लानर सतीश पाराशर के अवैध निर्माण को तोड़ दिया गया था। प्रशासन ने तोडफ़ोड़ में एक और चालाकी की कि केवल ऊपर ऊपर तोडफ़ोड़ की गई किसी की न तो नींव उखाड़ी गई और न ही डीपीसी। मज़दूर मोर्चा ने गतांक में बताया था कि अवैध निर्माण तोड़ा तो जा रहा है लेकिन प्रशासन मलबा कब्जे में नहीं ले रहा है जिसका फायदा भू माफिया दोबारा निर्माण में करेगा। हुआ भी यही, इधर प्रशासन तोडफ़ोड़ कर हटा उधर भू माफिया ने दोबारा निर्माण का काम शुरू कर दिया। सीटीपी सतीश पाराशर को दोबारा निर्माण करवाने की इसलिए जल्दी थी कि 30 जून को वह रिटायर होने वाला था, सेवानिवृत्त होने के बाद सारे अधिकार-प्राधिकार उसके हाथ से छिनने वाले थे। तो कुर्सी के दम पर उसने टूटने के दूसरे दिन से ही निर्माण कार्य शुरू करवा दिया, नींव तो मज़बूत थी और मलबे से निर्माण सामग्री भी आसानी से उपलब्ध हो गई। आनन-फानन करीब बारह फीट ऊंची चहारदिवारी पुन: उठवा दी गई, लेकिन किसी पर्यावरण प्रेमी ने फिर से इसकी शिकायत कर दी।
शिकायत होने पर प्रशासन को मजबूरी में तोडफ़ोड़ का नाटक करना पड़ा। बताया जा रहा है कि सतीश पाराशर ने बडख़ल विधायक भ्रष्टाचारी धनेश अदलखा को उसके लिए किए गए अवैध कामों की याद दिलाते हुए मदद मांगी। अदलखा ने भी पाराशर द्वारा नियम कानून रख कर सत्तापक्ष के भूमाफिया को एलओआई जारी करने का अहसान चुकाते हुए, प्रशासन को इशारा किया। इस पर पूरी बाउंड्री नहीं गिराई गई बस ऊपर से थोड़ी-थोड़ी दीवार गिरा दी गई, स्पष्ट है कि पूरी दीवार नहीं गिरा कर सतीश पाराशर को भविष्य में निर्माण पूरा करने की छूट दी गई।
केवल सतीश पाराशर ही नहीं अन्य अवैध निर्माणकर्ता भी धूल झाड़ कर मलबे को आलीशान भवन बनाने में जुट गए हैं। इधर प्रशासन भी अवैध फार्म हाउसों की जगह रिहाशयी इलाकों में तोडफ़ोड़ अभियान चलाने में जुट गया है जबकि पांच सौ से अधिक फार्म हाउस आदि अभी मौजूद हैं। समझा जा सकता है कि प्रशासन भी अवैध निर्माण तोडऩा नहीं चाहता बल्कि जन आक्रोश आदि की आड़ लेकर अभियान समाप्त करना चाहता है। इसमें रिश्वतखोर अधिकारियों, अवैध निर्माणकर्ताओं और राजनेताओं सबका भला है, वन उजड़ जाएं, पर्यावरण दूषित हो उनकी बला से।