भाषणवीर जजों और नेताओं का मुकाबला है पंचायती व्यवस्था के प्रधानपति से

भाषणवीर जजों और नेताओं का मुकाबला है पंचायती व्यवस्था के प्रधानपति से
December 09 11:38 2024

गोरखपुर जिले के एक ग्राम प्रधान भास्कर ने पेश किया त्वरित न्याय का नमूना

विवेक कुमार
मूसया (असल नाम का पता नहीं) और महानंद की आपसी मारपीट में दोनों का लगभग सारा परिवार बांसगाव के थाने में बैठा लिया गया। नाई जाति के दोनों परिवार एक ही खानदान के हैं और उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री के समर्थक और उनके सूबे, पाली ग्रामसभा के निवासी हैं। ठीक, बिल्लियों की लड़ाई में बंदर की कहानी को चरितार्थ करते हुए दोनों परिवारों ने आपसी विवाद का फौरी निबटारा थाने में 6-6 हजार रुपये पुलिस को बतौर घूस देकर किया। हालांकि न्याय के नाम पर यह निबटारा सस्ता है कि महंगा, इसी खानदान के संदीप से जानना उचित होगा।

घर वालों की मर्जी के खिलाफ 27 वर्षीय संदीप ने 2016 में शादी की। शादी के सातवें वर्ष में पत्नी ने आत्महत्या कर ली और परिणामस्वरूप संदीप को जेल जाना पड़ा। जेल से जमानत पाने के नाम पर संदीप का एकमात्र खेत बिक गया। कुछ पैसे वकील की फीस में लगे और ज्यादा पैसे गांव के दबंग भूमिहारों की सेवा पानी में खर्च हुए। जेल से छूट कर आने के उपरांत ज्ञात हुआ कि पूरे परिवार पर आज भी 13 लाख का उधार बकाया है। मुकदमा जो चल रहा है सो अलग।

मोदी सरकार ने वर्ष 1861-62 की लॉर्ड मैकाले की आईपीसी को वर्ष 2023 में बदलकर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता नाम दे दिया। धाराओं के नंबर बदलकर सरकार ने दावा किया कि इससे अंग्रेजी गुलामी की बेडिय़ों को उन्होंने असल मायनों में तोड़ दिया है। जबकि मैकाले का बनाया कानून भारतीयों को दबाए रखने का कानून था जिसे आज तक ठीक उसी मंशा से जारी रखा जा रहा है और दिन प्रति दिन उसमे नए कीर्तिमान गढऩे की होड़ राज्य सरकारों में लगी हुई है।

बीते माह लिबरल समाज के तथाकथित हीरो डी.वाई.चंद्रचूड़ सबसे लंबी अवधि तक चीफ जस्टिस बने रहने के कीर्तिमान के साथ सेवानिवृत हो गए। 2 साल बतौर मुख्य न्यायाधीश रहे चंद्रचूड़ के पास युगपुरुष बनने के कई मौके ठीक वैसे ही आए जैसे प्रधानमंत्री मोदी के समक्ष आए। पर ठीक प्रधानमन्त्री मोदी की ही तरह चंद्रचूड़ भी चूक गए और जाते-जाते अपना नाम काले अक्षरों में दर्ज करवा गए। क्योंकि मैंने लिबरल दुनिया के लोगों को चंद्रचूड़ से आस लगाते देखा है और उस आस को रोज टूटते भी देखा है तो कह सकता हूँ कि अब शायद ही कोई न्यायपालिका पर भरोसा करता हो। चंद्रचूड़ और गोगोई सरीखे जजों की कार्यशैली के समकक्ष प्रेमचंद की कालजयी कहानी ‘ईमानदारी’ रख कर देखने के बाद मेरा यकीन और पुख्ता ही हुआ कि जो जज अखबारों की सुर्खियों में अधिक होता है वह नागरिक को न्याय देने के मामले में कहीं नहीं होता।

नए मुख्य न्यायाधीश के रूप में संजीव खन्ना ने कार्यभार संभाल लिया है। पर यहां ये सवाल है कि इनमे से किसी के भी आने या जाने से आम नागरिक के जीवन में क्या बदलाव आ रहा है? जवाब है कुछ भी नहीं। थाने गए तो पुलिस को पैसा देना ही है। कोर्ट गए तो खेत और जमीन बिकनी तय है। नहीं तय है तो, सब बिकने के बाद न्याय का मिलना। मेरे इस दावे की तस्दीक हाल ही में आए न्यायपालिका के आदेशों से होती है। बुलडोजर पर आया सुप्रीम कोर्ट का अधूरा फैसला जिसमें किसी के घर को राज्य नहीं ढहा सकता। पर वहीं पिछले 2 वर्षों में पूरे भारतवर्ष में लगभग 15 लाख लोगों को लगभग 10 लाख घर ढहा कर अवैध तरीके से बेघर कर दिया गया है। इन पीडि़तों को कोई मुआवजा या राहत नहीं मिली।

राम मंदिर के फैसले में खुद चंद्रचूड़ लिखते हैं कि मंदिर के कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं और मस्जिद गिराया जाना एक अपराध था। बावजूद इसके मंदिर बनाने का आदेश देना और मस्जिद ढहाने के दोषियों को कोई सजा न देना दर्शाता है कि न्याय करने की अद्भुत कला हमारे देश के जजों ने विकसित की है। इसी सुप्रीम कोर्ट को उमर खालिद का मामला सुनने, कश्मीर के 370 मामले में एक संवैधानिक बेंच बनाने और न जाने कितने ही मामलों पर एक शब्द कहने में वर्षों लगे हैं।

तो क्या सच में इस देश की तासीर में अन्याय बसा हुआ है और हमारे पास इससे निकल कर एक न्यायप्रिय शासन स्थापित करने का कोई मार्ग नहीं बचा है? क्या भड़ास निकालने वाले लेख लिख कर और लोधी रोड के आईआईसी जैसे एलिट क्लबों में महंगी वाइन पर इन मामलों की चर्चा और हताशा के साथ घरों को लौट जाना ही हमारी नियति बन गई है?

शायद कुछ वक्त पहले तक मेरा जवाब होता, हां, यही हमारी नियति है। पर बीते एक माह के मेरे ग्रामीण अनुभव ने मेरी सोच पर एक गहरी चोट की है। हमें समाज को आगे ले जाने के लिए सबसे पहले हमारे बीते समाज के उन बीजों को खोद कर निकालना होगा जिसकी जड़ें ग्रामीण भारत में कहीं दबी हुई हैं। खोद के निकालने से मेरा यह कतई अर्थ नहीं कि मस्जिदों को खोद कर मूर्तियों को निकालें। बल्कि, उन सामाजिक मूल्यों को खोजें जो असल मायनों में गर्व करने लायक हैं।

लेख के प्रारंभ में जिस ग्राम पंचायत पाली का जिक्र किया गया उसके प्रधानपति (जिन्होंने पंचायत नामक सीरीज देखी है वे जानेंगे इसका अर्थ) भास्कर राय को अपने गाव के एक मामले में मध्यस्थता करने के नाम पर जाना पड़ा। क्योंकि दोनों ही पक्ष सामाजिक रूप से मजबूत और भास्कर के लिए राजनैतिक रूप से एक समान स्थिति में थे तो भास्कर के लिए कटु न्याय करना मुश्किल कार्य था। इसमें से पीडि़त पक्ष भास्कर का रिश्तेदार भी था। परिवार से भास्कर के करीबी रिश्ते होने के नाते एकतरफा पीडि़त की ओर खड़े होने से प्रधानपति की छवि धूमिल होने का खतरा बरकरार था। परंतु भास्कर ने हमारे जजों की भांति स्वयं को इस केस से अलग नहीं कर लिया।

75 वर्षीय श्रीराम को 50 वर्ष पहले इन्ही जमीनी विवादों के चलते जान बचाने के लिए छोटी उम्र में दिल्ली भाग जाना पड़ा। अथक प्रयासों से एम्स जैसे संस्थान में सम्मानजनक नौकरी मिली और वर्ष 2010 में भारत सरकार की सेवा से निवृत्त होकर फिर उसी गांव में बस गए। प्रेमचंद के उपन्यासों में वर्णित सुहाने गांव के सपने उच्च जाति वर्ग का व्यक्ति आज भी कुछ हद तक देख लेता है, पर जमीन के विवाद गांव में आज भी किस कदर हिंसात्मक हैं इसका अंदाज श्रीराम को नहीं था। बराए मौका श्रीराम को इसका साक्षात दर्शन अपने 6 पट्टीदारों के सामने अकेले होने पर मालूम चला। 6:1 के इस जमीनी विवाद में श्रीराम की आर्थिक और सामाजिक प्रतिष्ठा कई गुना है। परंतु लाठी का काम लाठी ही करती है जिसे चलाने का माद्दा श्रीराम में नहीं।

भाजपा सरकार की मस्जिद खोदो नीति का अनुसरण करते हुए श्रीराम के पट्टीदारों ने भी जमीन कब्ज़ाने का पुश्तैनी मामला लाठी के दम पर शुरू किया। मामला आक्रामक होता गया और 75 वर्षीय श्रीराम अकेले पड़ गए। इस मामले की सूचना मिलते ही भास्कर ने अपने सहयोगी के साथ मौके पर आकर गरम खून के लड़कों को ठंडा किया और मामले की सुनवाई करते हुए 6 दिनों बाद लेखपाल को बुलाने के नाम पर फिलहाल स्टे लागू किया। क्योंकि दबंग ही नेता होता है तो भास्कर की बात न चाहते हुए भी मजबूरन दूसरे पक्ष को माननी पड़ी।

तय समयानुसार लेखपाल आए, जरीब की खींचतान और नपाई के उपरांत लेखपाल ने बताया कि श्रीराम के पास ही जमीन फालतू है। इस कहे पर वहाँ मौजूद किसी को यकीन नहीं हुआ। पर ऐसा इसलिए हो सका क्योंकि दूसरे पक्ष में एक बुजुर्ग जमीनी मामलों के एक्सपर्ट होने के कारण लेखपाल को जमीन पर गुमराह करने में कामयाब रहे। इस मुद्दे को भास्कर ने तुरंत संज्ञान लेते हुए खुद मौके पर जमीन को दोबारा नपवा दिया और फैक्ट्स के साथ पूरे गांव के आगे साबित कर दिया की 6 लोगों का पक्ष लाठी और दुष्टता के दम पर श्रीराम की जमीन कब्जा किये हुए हैं जिसे अब खाली करना होगा।

इस त्वरित न्याय के लिए लेखपाल को एक-एक हजार रुपये दोनों पक्षों ने बतौर सहयोग राशि दिए, जिसे कानूनन अवैध कहा जाएगा। पर इस वैध-अवैध की रस्सी में जो बल है वह किसकी आहुति दे कर बना है? उपरोक्त कहानी में एक भी बात ऐसी नहीं जो भारत के 6.5 लाख गांव में से किसी एक गांव में आए दिन न होती हो। यदि, नहीं होता है तो न्याय और जो होता है वह है केवल थानों, और अदालतों के चक्कर। और इस चक्कर को पूरा करते रहने के लिए साहूकारों के चक्कर।

संविधान दिवस कि पूर्व संध्या पर गृहमंत्री अमित शाह ने घोषणा की कि, जो भी व्यक्ति भारतीय जेलों में अंडरट्रायल है और अपनी एक तिहाई सजा काट चुका है उसे बरी किया जाए। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट 2022 के मुताबिक देश में कुल बंदियों की संख्या 5,73,220 है। इनमे अन्डरट्रायल की संख्या 4,34,302 है यानि हर 4 में से 3 कैदी अन्डरट्रायल हैं। लगभग 60 प्रतिशत कैदी केवल उत्तरप्रदेश (21.7 प्रतिशत), बिहार (13.2 प्रतिशत,) मध्यप्रदेश, पंजाब और बंगाल राज्यों से आते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2017 के बाद ऐसे कैदियों की संख्या 40.7 प्रतिशत बढ़ी है।

उपरोक्त आंकड़े सरकारों, न्यायपालिका की बानगी कहने को काफी हैं परंतु यह लेख उन नागरिकों के लिए है जिन्हे वर्तमान व्यवस्था में यकीन न रहा जिसकी जड़ें सैकड़ों वर्ष पहले बोई गई थी। जो चाहते हैं कि एक बेहतर व्यवस्था हो तो उसकी भी जड़ें हजारों वर्षों के इतिहास में ही समाहित हैं। आवश्यकता है शहरीकरण
और पूंजीवाद के इस जाल में उसे ढूंढने की।

गुलाम भारत में अंग्रेजी हुकूमत हर 20 वर्ष में एक चार्टर लाती थी जिसके तहत वह अपनी नीतियों का मूल्यांकन किया करते थे। 1833 के चार्टर ऐक्ट के तहत 20 वर्ष बाद ब्रितानी हुकूमत 1853 के “इंडिया रिफॉर्म सोसाइटी” नामक अपनी पत्रिका के सर्वे में यह स्वीकार करती है कि “भारत के समाज को उन्होंने न केवल दूषित किया बल्कि उनकी ग्रामीण पंचायती न्याय व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया। न्याय प्रक्रिया महंगी और पेचीदा बना दी गई। कानून का इंसाफ उनके लिए है जो धनी हैं। जो पैसे देकर अदालत आ भी जाए तो वह देखता है कि जज अंग्रेजी जाति के नाम पर कलंक है”।

इन्ही प्रक्रियाओं को भारत की सभी सरकारों ने जस का तस आज तक नागरिक समाज पर काबिज किया हुआ है। सवाल है क्यों? अंग्रेजों को एक औपनिवेशिक समाज को दबाए रखने के लिए ऐसे कानूनों और प्रक्रियाओं कि जरूरत थी पर अपने देश में न उन्होंने यह पुलिस बनाई न ही ऐसी न्याय प्रक्रिया। फिर हमने उनकी इस दमनकारी प्रक्रिया को क्यों काबिज रखा। जवाब पाठक को मालूम होना चाहिए।

गांधी ने पंचायती राज की कल्पना प्रधानपति भास्कर जैसों को देख कर ही की होगी। शहरी, और अब तो ग्रामीण भारत के युवा इस ग्रामीण व्यवस्था को शायद नहीं जानते न जानना चाहेंगे। गर्व करने के असली कारणों को छोड़कर वे मस्जिदों के तहखानों में गर्व ढूंढते फिर रहे हैं। पंचायती राज की इस दूर-दृष्टि को संविधान में नीति निर्देशक तत्वों के तहत अनुच्छेद 40 में जोड़ दिया गया जो कि सरकार पर बाध्यकारी नहीं है।

ऐसा करके गांधी जी के इस स्वप्न से सरकारों ने इतिश्री की। बलवंत राय कमेटी की सिफ़ारिशों के तहत 73वें संविधान संशोधन ने 1992-93 में पंचायती राज व्यवस्था कानून बेशक लागू किया पर इसकी शक्तियां बेहद सीमित रहीं। केरल राज्य ने सभी 29 विषयों के क्रियान्वयन की शक्तियां पंचायती व्यवस्था को प्रदान की हैं। वहीं उत्तर प्रदेश इस मामले में देश भर में सबसे पिछड़ा है। इससे दो राज्यों की विकास दर के मूल अंतर को भी समझ जा सकता है।

जहां एक तरफ देश की सर्वोच्च तथाकथित न्यायपालिका के पूर्व मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने देश में गड़े मुर्दे उखाडऩे का रास्ता खोल दिया, वहीं एक छोटी सी पंचायत ने 5 दशकों के विवाद को निबटाने का काम किया वह भी एक सुनवाई और एक हजार प्रतिवादी के खर्चे में। तो जजों, सरकारों और समाज को पाली ग्राम प्रधानपति भास्कर से सीखना चाहिए कि नागरिक के हक में न्याय प्रक्रिया कैसे बनाई और प्रैक्टिस की जाए।

राजा विक्रमादित्य की न्याय की कहानी सुनने वाले देश को राजा की नहीं बल्कि ऐसी प्रक्रिया की आवश्यकता है जिसमे न्याय त्वरित रूप से मिले। और साथ ही ऐसे राजनीतिज्ञों और न्यायाधीशों की भी जो न्याय की अवधारणा को राजनीति और व्यक्तिगत लाभ से ऊपर देख पाने की वैसी क्षमता रखते हों जैसी की भास्कर के पास है। गांधी को शायद असल श्रद्धांजलि भास्कर जैसे पंचायती राज को जीवित रखने वाले ही दे सकते हैं न कि रस्म अदायगी वाले नेता और जज।

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Mazdoor Morcha
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