श्रीकांत वेदों में जो प्रधानता अग्नि को दी गई है,उपनिषदों में वही महत्ता प्राण को दी गई है। या कहें कि वेद जिसे अग्नि कहते हैं उसी को पुराणों में प्राण की संज्ञा दे दी गई है। इस पुण्यभूमि के सुधि दृष्टाओं ने बहुत पहले से अन्न के महत्व को जान लिया था। 80त्न से अधिक आबादी जब 20-22 रूपये रोज़ पर गुज़ारा करती हो और भूखी सोती हो, जहां स्वयं अन्नदाता वर्ग यानि किसानों का एक बड़ा हिस्सा भूख और निराशा से पीडि़त होकर आत्महत्या करने को विवश हो तो महान विरासत वाले इस देश में ,जिसे अपने विश्वगुरु बनने की जल्दी हो और जिसे अतीत पर गर्व हो,और फिर से वही स्थान पाने के लिए लगातार कसरत कर रहा हो, वहां यह देखना-जानना जरूरी है कि यहाँ के नागरिक चेतना के किस स्तर पर जी रहे हैं। इसके लिए वर्तमान या भविष्य की ओर देखने से ज्यादा जरूरी है सतत अतीतोन्मुखी बने रहना।
उपनिषदों में जो कुछ अन्न के बारे में कहा गया है,उससे ब्रह्म के भौतिक पक्ष की पुष्टि होती है। मुण्डकोपनिषद में कहा गया है- तपस्या चीख़ते ब्रह्म ततोन्नमभिजायते।अन्नदाता प्राणो मन: सत्यम लोका: कर्मसु चामृतम् । तप से ब्रह्म संवर्धित होता है,उससे अन्न् उत्पन्न होता है, अन्न् से प्राण,मन और सत्य ,सभी लोक और कर्मसु चामृतम, कर्मों में जो अमृत निहित है,वह सब उत्पन्न होता है।तैतरेय और छान्दोग्य आदि उपनिषदों में भी ऐसे ही वर्णन हैं। छान्दोग्य में कहा गया है-सर्वाधिक ह वा इमानि भूतानि अन्नमेव प्रतिहरमाणानि जीवन्ति,सभी प्राणी अन्न ग्रहण करते हुए जीवित रहते हैं। आगे कहा गया है- दो व्यक्ति भोजन कर रहे थे। एक ब्रह्मचारी भिक्षा माँगने आया। उन्होंने भिक्षा नहीं दी। तब ब्रह्मचारी ने कहा- मैं प्राण के लिए भिक्षा माँगता था,परन्तु जिसके लिए अन्न है उसी को तुमने नहीं दिया।
श्वेतकेतु को अन्न ,जल आदि तत्वों का महत्व समझाने के लिए उनके पिता ने कुछ दिन उन्हें भूखे प्यासे रहने को कहा। पन्द्रह दिन तक कुछ न खाने पर उनसे कहा गया ,कुछ वेदमंत्र सुनाओ। उन्होंने कहा ,एक भी याद नहीं है।तब पिता ने कहा -“हे सौम्य !तेरी सोलह कलाओं में से एक कला बच रही है।”अब खाकर आओ,अन्न ग्रहण करो। जब श्वेतकेतु ने भोजन कर लिया तब उन्हें वेदमंत्र याद आने लगे। इस पर पिता ने कहा-“तेरी सोलह कलाओं में से एक बच रही थी। वह अन्न से सुलगाई गई,और फिर से चमक उठी ,और इससे अब तुम्हें फिर से वेद स्मरण हो आए। इसलिए हे सौम्य! मन अन्नमेव है,प्राण जलमय है और वाणी तेजोमयी है।”
अनेक वर्षों से सरकार भारत के अधिसंख्य नागरिकों में इन्हीं सोलह कलाओं को जागृत करने के लिए प्रयासरत है। उन्हें संभवतय: जानबूझकर राशन की लाइनों में रखा जा रहा है। क्योंकि अतीत में भारत भूमि पर ऐसे अनेक आख्यान प्रकाश में आए थे कि करोड़ों टन अनाज सडऩे दिया जाता था।
इस प्रकार जब श्वेतकेतु के समान ये सब नागरिक सघन भूख का दिव्यानुभव करते हुए आध्यात्मिक अनुभवों से गुजऱेंगे तब निश्चय ही श्वेतकेतु के ही समान इनकी चेतना का भी उन्न्न्यन हो जाएगा और फिलहाल मनुष्य से कुछ नीचे का जीवन जीने वाले प्राणी भी वेदमंत्रों का पाठ करने लगेंगे। वही स्थिति,वही अवसर भारत को विश्वगुरु की कुर्सी झपट लेने के लिए सबसे अधिक अनुकूल होगी। इस प्रयोग में यदि कुछ मनुष्य इहलोक से परलोक प्रस्थान कर भी जाएं तो क्या? ये शरीर ही तो मर्त्य है, आत्मा अजर-अमर है। यूं भी शरीर का जीर्ण-शीर्ण होना स्वाभाविक है। आत्मा तो नया शरीर धारण कर ही लेगी-वासांसि जीर्णानि यथा विहाय। ऐसा श्रीमद्भगवद्गीता में ही नहीं पूर्वोपनिषदों में भी उल्लिखित है,ऐसा उत्तरोपनिषद भी उल्लेख करेंगे। गीता भी तो एक उपनिषद ही है। भारत के विश्वगुरु बनने से बड़ी उपलब्धि क्या हो सकती है? इस महायज्ञ में समिधा बनकर आहुति स्वरूप स्वयं को आत्मार्पित कर देना ही मनुष्य जीवन का अंतिम ध्येय है, इसी में मानव जीवन की परम सार्थकता है। शुभमस्तु।