फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) पार्टी से ज्यादा कुर्सी की चाह रखने वाले भाजपा-कांग्रेस के सत्तालोलुप बागी नेता इस विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियों को झटका दे सकते हैं। इन बागयि़ों के कारण बल्लभगढ़, तिगांव, एनआईटी और पृथला विधानसभा सीटों पर कड़ा मुकाबला होने वाला है। इन सीटों पर बागी पार्टी प्रत्याशियों पर भारी नजर आ रहे हैं, जानकारों के अनुसार संभव है कि ये बागी चुनाव न जीत पाएं लेकिन पार्टी के प्रत्याशी को हराने में बड़े वोट कटवा तो साबित हो ही सकते हैं।
बल्लभगढ़ विधानसभा में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने ही ब्राह्मण कार्ड खेला है। भाजपा ने दो बार के विधायक और मंत्री मूलचंद शर्मा को तीसरी बार टिकट दिया है। शर्मा को मज़बूती से टक्कर दे रहीं शारदा राठौर की जगह कांग्रेस ने पूर्व विधायक योगेश शर्मा की बेटी पराग शर्मा को टिकट दिया है। पराग शर्मा लंबे समय एआईसीसी की मेंबर और दिल्ली विश्वविद्यालय में एनआईसीयू पैनलिस्ट भी रही हैं लेकिन जनाधार के मामले मेंं वह शारदा राठौर की तुलना में कहीं टिकती नहीं दिखाई देतीं। कांग्रेस के टिकट पर दो बार विधायक रहीं शारदा राठौर पूरे जोर शोर से खुद को कांग्रेस प्रत्याशी की तरह प्रमोट कर पिछले तीन चार महीने से जन संपर्क में जुटी थीं। टिकट कटने पर पार्टी लाइन से अलग होकर निर्दलीय दावेदारी पेश कर दी। जानकारों के अनुसार यदि शारदा को कांग्रेस से टिकट मिलता तो बल्लभगढ़ सीट कांग्रेस की झोली में जाती। पराग शर्मा के लिए जीत की राह काफी कठिन प्रतीत होती है। चर्चा यह भी है कि भूपेंद्र हुड्डा के इशारे पर ही शारदा राठौर निर्दलीय खड़ी हुई है क्योंकि पराग शर्मा उनके न चाहते हुए भी हाई कमान से टिकट लेने में सफल हो गई।
इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि मूलचंद शर्मा की सीट निकल रही है। उन्हें चुनावी सभाओं में भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है, नाराज जनता को मनाने के लिए वो गंगा-यमुना की झूठी कसम तक खाने से परहेज नहीं कर रहे हैँ। उनकी राह में बड़ा रोड़ा जमीन से जुड़े राव राम कुमार हैं। राव रामकुमार लंबे अर्से से बल्लभगढ़ क्षेत्र में अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं। पूर्व पार्षद राव रामकुमार को चुनाव क्षेत्र के कई निवर्तमान पार्षदों का समर्थन प्राप्त है। माना जा रहा है कि बल्लभगढ़ शहरी क्षेत्र में पार्षदों के सहारे राव रामकुमार कुमार मूलचंद के वोटों में बड़ी सेंध लगाएंगे जिसका उन्हें फायदा हो न हो लेकिन मूलचंद की निकटतम प्रतिद्वंदी शारदा राठौर को इसका लाभ मिल सकता है।
पिछले ढाई-तीन साल से जनता के बीच घूम रहे आम आदमी पार्टी (आप) के प्रत्याशी रवींद्र फौजदार भी दमदारी से चुनावी ताल ठोंक रहे हैं। शिक्षा-स्वास्थ्य और बिजली, पानी-सड़क की गंभीर समस्याओं से जूझ रही जनता के बीत तेजीे से पैठ बना रही ?भाजपा की प्रतिद्वंदी ‘आप’ के रवींद्र फौजदार भी मूलचंद शर्मा के वोटों में सेंध लगाते नजर आ रहे हैं।
तिगांव विधानसभा में भी कांग्रेस ने अपने पूर्व विधायक ललित नागर की जगह रोहित नागर को टिकट दिया है। रोहित भी पराग शर्मा की तरह कांग्रेेस के विभिन्न संगठनों में रहे बताए जाते हैं लेकिन जनता के बीच उनकी पैठ और पहचान उतनी नहीं है जिनती ललित नागर की। चर्चा तो यह भी है कि रोहित नागर ने दिल्ली में प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा के जिम पार्टनर बन कर उनसे नजदीकियां बढ़ाईं और उनके दम पर तिगांव का टिकट पाने में सफल हो गए। यह टिकट भी पार्टी आला कमान ने भूपेंद्र हुड्डा की मर्जी के खिलाफ दिया था इसलिए उनके इशारे पर ही ललित नागर भी बगावत करते हुए निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में हैं।बेशक, बीते पांच साल ललित कृष्णपाल की जी हुजूरी व जमीन के सौदों में हिस्सा पत्ती रखता रहा है।
जानकारों के अनुसार कांग्रेस द्वारा बांटी गई गलत टिकटों में से रोहित नागर भी एक मानी जा रही है, यहां से ललित नागर को कोई हराने वाला नहीं था। टिकट कटने के बावजूद क्षेत्र की जनता की सहानुभूति उनके साथ तेजी से जुड़ी है। बेशक, बीते पांच साल ललित कृष्णपाल की जी हुजूरी व जमीन के सौदों में हिस्सा पत्ती रखता रहा है। यहां भाजपा ने विधायक राजेश नागर को फिर से टिकट दिया है, ऊपर से देखने में वह मज़बूत दावेदार दिखते हैं लेकिन पार्टी की भितरघात उन्हें नुकसान पहुुंचा रही है। जानकार बताते हैं कि मंत्री कृष्णपाल गूजर और राजेश नागर में छत्तीस का आंकड़ा शुरू से रहा है क्योंकि तिगांव क्षेत्र के विधायक रह चुके कृष्णपाल इस क्षेत्र को अब अपने बेटे के नाम करना चाहते हैं, वे कभी नहीं चाहते कि कोई अन्य इस सीट पर अपनी जड़ें मज़बूत कर पाए। इसके साथ साथ वे नहीं चाहते कि उनके अलावा कोई और गूजर उनकी जाति का मसीहा बन सके। बस इसी कारण राजेश नागर से कृष्णपाल नैसर्गिक दुश्मनी पाले हुए हैं। चर्चा जोरों पर है कि लोकसभा चुनाव में ललित नागर ने पार्टी से गद्दारी करते हुए अंदरखाने कृष्णपाल गूजर के लिए वोट मांगे थे, इस कारण इस बार उनका टिकट काटा गया है। लोकसभा चुनाव का अहसान उतारने के लिए कृष्णपाल पर्दे के पीछे से ललित नागर के पक्ष में समर्थन जुटाने में लगे हैं। गूजर और ललित नागर का यह समीकरण राजेश नागर को महंगा पडऩे वाला है। भाजपा के एक खांटी कार्यकर्ता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि तिगांव में ललित नागर की जीत पक्की है। रही रोहित नागर की बात तो वह अपनी जमानत बचाने भर के वोट हासिल कर लें तो उन्हें जीता हुआ मान लेना चाहिए।
एनआईटी विधानसभा में भाजपा का टिकट पाने की उम्मीद लगाए नगेंद्र भड़ाना धोखा मिलने पर इनेलो-बसपा का टिकट ले आए। कृष्णपाल गूजर ने यहां अपने रिश्तेदार सतीश फागना को टिकट दिलाया है लेकिन गूजर बहुल सीट होने के बावजूद जाति का एक बड़ा तबका कृष्णपाल और उनके प्रत्याशी के खिलाफ है। जानने वाले कहते हैं कि सतीश फागना को केवल भाकरी गांव के फागनों के वोट मिल रहे हैं बाकी सारी भड़ानपुरी नगेंद्र भड़ाना के साथ है, क्षेत्र मेें कृष्णपाल गूजर को भी गद्दार के रूप में देखा जा रहा है। यहां नगेंद्र भड़ाना को गूजर समुदाय का सहानुभूति वोट मिल रहा है लेकिन आम जनता की नजर में भाजपा को समर्थन देने और सत्ता में रहने के बावजूद उन्होंने क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं कराया।
कांग्रेस ने विधायक नीरज शर्मा पर दोबारा विश्वास जताया है। जनता का मानना है कि विपक्षी विधायक होने के कारण भाजपा सत्ताधारियों ने उनके क्षेत्र में विकास कार्यों में रोड़े अटकाए। अच्छे जन प्रतिनिधि होने के कारण वह सड़क से लेकर विधानसभा तक जनहित की लड़ाई लड़ते रहे। जनता को लगता है कि इस बार प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनेगी तो नीरज शर्मा क्षेत्र का तेजी से विकास कराएंगे, बहुत संभव है कि आला कमान उन्हें उप मुख्यमंत्री भी बना दिया जाए। यहां सतीश फागना भाजपा का परंपरागत वोट बटोर कर नगेंद्र भड़ाना की जीत में बड़ी बाधा उत्पन्न करेंगे लेकिन जजपा प्रत्याशी हाजी करामत अली भी मुस्लिम और दलित वोट पर कब्जा जमा कर नीरज शर्मा के लिए मुश्किलें पैदा कर रहे हैं। जानकारों के अनुसार यहां नीरज शर्मा का पलड़ा थोड़ा सा भारी है लेकिन नगेंद्र भड़ाना उनको तगड़ी टक्कर दे रहे हैं।
जिस तरह तिगांव में रोहित भड़ाना कांग्रेस की भूल साबित हो रहे हैं ठीक उसी तरह बडख़ल में धनेश अदलखा भाजपा की सबसे बड़ी भूल साबित होने वाले हैं। उनकी योग्यता पूर्व सीएम खट्टर का खास ‘कमाऊ पूत’ होने के अलावा कुछ भी नहीं है। पैराशूटर प्रत्याशी होने के कारण क्षेत्र की जनता में उनका खासा विरोध है, लोगों का कहना है कि मूल रूप से मोहना का धनेश वर्तमान में सेक्टर नौ में रह रहा है दिखावे मात्र के लिए यहां मकान ले लिया है। भ्रष्टाचार जिसके लिए पानी लेने के समान है तो अदलखा को जनता से ज्यादा भाजपा नेताओं का असहयोग ही नुकसान पहुंचाने वाला है। दो बार की विधायक और पंजाबी समुदाय में अच्छी पैठ रखने वाली सीमा त्रिखा की खामोशी भी अदलखा को भारी पडऩे वाली है। आसानी से सत्ता नहीं छोडऩे वाली सीमा ने पार्टी आला कमान द्वारा टिकट काटे जाने का जाहिर तौर पर कोई विरोध नहीं किया लेकिन सत्ता छीनने वाले अदलखा की अंदरखाने काट करने में जुटी बताई जा रही हैं। पंजाबी बिरादरी में सीमा को शहीद और अदलखा को उसकी पीठ में छुरा घोंपने वाले की तरह पेश कर उसकी जड़ें खोदी जा रही हैं। सिर्फ सीमा ही नहीं टिकट के दावेदार राजन मुथरेजा, श्याम सुुंदर कपूर और राजीव जेटली भी धनेश की हार सुनिश्चित करने वाली संभावनाएं तैयार करने में जुटे हैं, ताकि धनेश के हारने पर आला कमान को बता सकें कि केवल खट्टर की चापलूसी से कोई सीट नहीं जीत सकता।
इस सीट पर कांग्रेस ने पिछली बार के रनरअप विजय प्रताप को टिकट दिया है। जानकारों के अनुसार यह सीट स्पष्ट रूप से कांग्रेस की झोली में जा रही है क्योंकि इस विधानसभा में भाजपा को तगड़ा नुकसान होने वाला है। सीमा त्रिखा की जीत में पंजाबी और गूजर वोट जो कि कृष्णपाल गूजर के समर्थन के कारण मिला था, का बड़ा योगदान था। इस चुनाव में समीकरण इसके ठीक उलट हैँ, पंजाबी वोट सीमा त्रिखा को टिकट नहीं दिए जाने से नाराज है, इधर विजय प्रताप की पत्नी पंजाबी बिरादरी से होने के कारण इस वोट को पिछले चुनाव की भांति पति के पक्ष में करा चुकी हैं। ऊपरी तौर पर तो कृष्णपाल गूजर चेले धनेश अदलखा का समर्थन करते नजर आ रहे हैं लेकिन अंदरखाने वो भी महत्वाकांक्षी धनेश को गूजर वोट दिलाने से बच रहे हैं, उन्हें डर है कि आज विधायक बनने के लिए सीमा त्रिखा को किनारे लगवाने वाला अदलखा कल उनकी भी जड़ें न काट डाले। चर्चा तो यह है कि टिकट लेने के लिए अदलखा ने कृष्णपाल गूजर, खट्टर से लेकर पार्टी आला कमान के मुंह नोटों से भर दिए। टिकट पाने से पहले ही उसके द्वारा बांटी गई इस रकम का अनुमान 58 करोड़ रुपये लगाया जा रहा है। भितरघाती ही नहीं धनेश की राह में आप के ओम प्रकाश वर्मा के अलावा पंजाबी बिरादरी से जेजेपी के परविंदर सिंह और भारतीय शक्ति चेतना पार्टी के कमल बाली भी वोट कटवा साबित होने वाले हैं।
पृथला विधानसभा में भाजपा ने इस बार टेकचंद शर्मा को टिकट दिया है, 2014 में बसपा से चुनाव लड़े थे और तब भाजपा उम्मीदवार नयनपाल रावत को उन्होंने हराया था। 2019 में भाजपा ने नयनपाल रावत का टिकट काटा तो वो निर्दलीय खड़े हुए थे और जीत कर भाजपा को समर्थन दिया था। इस बार उन्हें पूरी उम्मीद थी कि भाजपा टिकट देगी लेकिन पार्टी ने टेकचंद शर्मा को टिकट दे दिया। इस चुनाव में यह दोनों प्रत्याशी एक दूसरे के वोट भरपूर काटते नजर आ रहे हैं। सुधी पाठकों को बताते चलें कि 2009 में अस्तित्व में आने के बाद से पृथला विधानसभा सीट पर भाजपा नहीं जीती है। 2014 में मोदी लहर के बावजूद जनता ने बसपा के टेकचंद शर्मा को चुना था। टेकचंद की राह में केवल नयनपाल रावत ही रोड़ा नहीं हैं बसपा उम्मीदवार सुरेंद्र वशिष्ठ ब्राह्मण और दलित वोटों में बड़ी सेंध लगा रहे हैं जिसका सीधा नुकसान भाजपा को होता दिख रहा है। आम आदमी पार्टी प्रत्याशी कौशल तातारपुर भी भ्रष्टाचार मुक्त शासन के नाम पर भाजपा शासनकाल की नाकामियां गिना कर वोट कटवा साबित होने वाले हैं। कांग्रेस ने यहां से 2009 में पार्टी से विधायक रहे रघुवीर तेवतिया पर एक बार फिर विश्वास जताया है। जमीन से जुड़े होने के कारण उनका भी बड़ा जनाधार है। इस चुनाव में जनता उनके पक्ष में नजर आ रही है, नयनपाल रावत और टेकचंद शर्मा की लड़ाई में रघुवीर तेवतिया जीत के काफी करीब माने जा रहे हैं।
जानकारों के अनुसार पूरे प्रदेश में इस बार सत्ता विरोधी लहर है, ऐसे में सही प्रत्याशियों का चुनाव नहीं किए जाने का खामियाजा कम से कम पंद्रह सीटों पर भाजपा को उठाना पड़ सकता है, कई महत्वपूर्ण सीटों पर भितरघाती पार्टी को नुकसान पहुंचा रहे हैं। कांग्रेेस का भी कुछ ऐसा ही हाल है, यहां भी करीब एक दर्जन प्रत्याशियों को जनाधार नहीं होने के बावजूद टिकट दिए गए जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ सकता है। ज्यादातर का मानना है कि कांग्रेस इस बार पूर्ण बहुमत में आ रही है।