बजट पूर्व विचार विमर्श की नौटंकी, ईएसआईसी बारे सरकार को ज्ञान नही

बजट पूर्व विचार विमर्श की नौटंकी, ईएसआईसी बारे सरकार को ज्ञान नही
February 13 03:57 2026

फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) हरियाणा सरकार द्वारा वित्तीय वर्ष 2026-27 का बजट आगामी फरवरी महीने में विधानसभा में पेश किया जाना है। जनता की आवश्यकताओं को समझकर बजट बनाने के लिए जरूरी है कि उनकी राय-मशवरा बजट पेश करने से पहले ली जाये। इसी औपचारिकता को पूरा करने के लिए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने नौ जनवरी को होटल राजहंस में विभिन्न वर्गों की मीटिंग बुलाई थी। लंच से पहले उद्योगपतियों, कारोबारियों व अन्य विशिष्ट लोगों को बुलाया गया था। लंच के बाद स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सम्बन्धी विषयों पर बात-चीत के लिए डॉक्टरों के संगठन तथा अन्य सम्बन्धित लोगों को आमंत्रित किया गया था। डॉक्टरों के संगठन (आईएमए) की विशेष समस्या यह थी कि उनके द्वारा आयुष्मान के तहत मरीजों के जो इलाज किए जाते हैं, उनका भुगतान हरियाणा सरकार तब तक नहीं करती जब तक कि वे इलाज करने से इनकार न कर दें। हर साल 200-300 करोड़ तक के बिल सरकार पर खड़े रह जाते हैं।

इसी अवसर पर ईएसआई कॉर्पोरेशन की सेवा से निवृत डॉ. जसवंत सिंह ने सीएम सैनी को समझाने का प्रयास किया कि राज्य भर में 30 लाख से अधिक बीमाकृत परिवारों की चिकित्सा सेवा देना ईएसआई कॉर्पोरेशन के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसके लिए हरियाणा सरकार का ईएसआई हेल्थ केयर विभाग 960 करोड़ का बजट बना कर इन परिवारों को बेहतरीन चिकित्सा सेवा प्रदान करा सकता है। इसके लिए राज्य सरकार को मात्र बजट का आठवां भाग यानी 112 करोड़ रुपए ही खर्च करने होंगे। इतना ही नहीं यदि अस्पतालों में 70 प्रतिशत बिस्तरे भरे हों तो 60 करोड़ अतिरिक्त राज्य सरकार को मिल सकते हैं, जिसके लिए आठवां भाग भी नही देना होगा। विदित है कि राज्य के कुल 76 लाख परिवारों में से 30 लाख परिवारों का चिकित्सा खर्च जब ईएसआई कॉर्पोरेशन सम्भाल लेगा तो राज्य के पास केवल 46 लाख परिवार ही तो बचेंगे, जिनको चिकित्सा सेवा देना अपेक्षाकृत आसान होगा।

कॉर्पोरेशन के नियमानुसार प्रत्येक बीमाकृत परिवार पर तीन हजार रुपए वार्षिक खर्च करने का बजट राज्य सरकार बना सकती है। इसके विपरीत हरियाणा सरकार मात्र 370 करोड़ का ही बजट बनाती है और वह भी पूरा खर्च नहीं कर पाती। औसतन यह खर्च प्रति परिवार 1450 रुपए वार्षिक के आसपास पड़ता है। इस कम खर्च करने की वजह से ही राज्य भर में हरियाणा सरकार द्वारा चलाई जा रही ईएसआई डिस्पेंसरियों व अस्पतालों की हालत दयनीय है। इनमें न तो पर्याप्त स्टाफ है और न ही आवश्यक दवाएं एवं उपकरण आदि। जाहिर है ऐसे में बीमाकृत परिवारों को वांछित चिकित्सा सेवा मिलना सम्भव नहीं हो सकता।

मूढ़ मती सैनी की न तो ये सब बातें सुनने की इच्छा थी और न ही समझने की कोई क्षमता लेकिन उन्होंने चुप रह कर अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन नहीं किया। दूसरी ओर उनके निकट बैठे तीक्ष्ण बुद्धि सुपर सीएम कहे जाने वाले सेवा निवृत्त आईएएस राजेश खुल्लर ने झट से यह कह कर कि अभी कुछ समय पूर्व ईएसआई को जमीन दी तो थी, अपनी अक्ल का दिवालियापन प्रदर्शित कर दिया। जवाब मे जब डॉ. जसवंत ने कहा कि वे जमीन की बात करने नहीं आए, यहां बजट की बात हो रही है तो चापलूसी पसंद खुल्लर साहब झेंप गए, उन्हें इस तरह के जवाब सुनने की आदत नहीं थी। खुल्लर ने यह भी जता दिया कि वे ईएसआई के बारे में इससे अधिक कुछ भी नहीं जानते कि उन्होंने कभी इसके लिए कोई जमीन दी थी। वास्तव में ये जमीन कोई मुफ्त में उपहार स्वरूप नहीं दी गई थी। मानेसर में बनाए गए आईएमटी में प्लॉटों के कुछ बेढंगे टुकड़े बचे रह गए थे जिनका कोई ग्राहक नहीं था। वही सात एकड़ जमीन 120 करोड़ में ईएसआई कॉर्पोरेशन के मत्थे मढ दी गई थी।

गौरतलब है कि हरियाणा सरकार द्वारा ईएसआई हेल्थ केयर का बजट 960 करोड़ बनाए जाने व उसे ईमानदारी से खर्च किए जाने पर डॉक्टरों तथा पैरा मेडिकल स्टाफ आदि के रूप में करीब 10 हजार लोगों को नई नियुक्तियां मिल सकेंगी। दूसरी ओर राज्य के 30 लाख परिवारों को बेहतरीन चिकित्सा सुविधा मिल पाएगी। परन्तु यह सब तो हरियाणा सरकार का लक्ष्य है नहीं। इसलिए सीएम सैनी ने तो कहना ही क्या था, खुल्लर डॉ. जसवंत से बाद में मिलने की कह कर गायब हो गए। पता चला कि वे तो गए। उन्होंने यह नहीं बताया कि डॉ. जसवंत कब और कहां मिलें, चंडीगढ़ मिलने आएं तो क्यों आएं? उनका यह कोई निजी मामला तो है नहीं, जो उनके चक्कर काटते फिरें। काम राज्य सरकार का है, अगर उन्हें समझने व काम करने की जरूरत नहीं है तो डॉ. जसवंत को भी पागल कुत्ते ने नहीं काटा जो उनके चक्कर काटते फिरे। वैसे डॉ. जसवंत ने पूरा विवरण व दस्तावेज बजरिया ईमेल खुल्लर को भिजवा दिए हैं।

झूठी खबरें छपवाने पर है जोर
ईएसआर्ईसी संस्थान की ओर से ‘पेड न्यूज’ की तरह अखबारों में छपवाई गई एक खबर से ऐसा आभास मिलता है कि यहां आने वाले सैंकड़ों किडनी मरीजों के लिए काफी बड़े स्तर पर काम हो रहा है। न जाने कितने किडनी प्रत्यारोपण इस अस्पताल में किए जा रहे हैं। किसी भी प्रत्यारोपण से पहले ह्यूमन ल्यूकोसाइटएंटीजन (एचएलए)नामक आवश्यक टेस्ट कराना होता है। इसकी सुविधा इस संस्थान में न होने के चलते इसे बाहर से करवाना पड़ता था। पूर्व डीन डॉ. असीम दास ने अपने कार्यकाल में इसकी आवश्यकता को समझते हुए अपने यहां ही इसके लिए लैबोरेटरी बनाने का काम पूरा कर लिया था। डॉ. अनिल कुमार पांडे जो बाद में यहां के डीन भी बने उनका योगदान भी इस प्रोजेक्ट में बहुत महत्वपूर्ण रहा था। इन दोनों पूर्व डीनों के वक्त में यहां कुल तीन किडनी प्रत्यारोपण हुए थे। इस काम के लिए यूरोलॉजी के डॉक्टर सर्जरी करते हैं तथा नेफ्रोलॉजी के डॉक्टर सर्जरी के बाद मरीज की देखभाल करते हैं क्योंकि सर्जरी के बाद पैदा होने वाली समस्याओं को केवल नेफ्रोलॉजी विशेषज्ञ ही समझ सकते हैं। यही विशेषज्ञ डायलिसिस करवाने वाले मरीजों में उत्पन्न होने वाली समस्याओं का निदान भी करते हैं।

पहले दो प्रत्यारोपण के लिए डॉ. दास ने एकार्ड अस्पताल की पूरी सर्जरी टीम को अपने यहां बुलाकर प्रत्यारोपण कराए थे क्योंकि यहां के सर्जन डॉ. निशांत का कहना था कि उन्होंने पहले कभी यह काम नहीं किया है, इसलिए एक-दो बार विशेषज्ञ टीम के साथ मिल कर काम करने से उनका आत्मविश्वास बढ़ जाएगा, हुआ भी ऐसा ही। इसके बाद तीसरा प्रत्यारोपण डॉ. निशांत ने सफलतापूर्वक किया प्रत्यारोपण तो गया भाड़ में, यहां तो प्रति दिन डायलिसिस के लिए आने वाले सैंकड़ों मरीजों की देखभाल के लिए कोई नेफ्रोलॉजिस्ट ही मौजूद नहीं है। इस कमी के चलते एक महिला मरीज की मौत हो चुकी है और कुछ अन्य समर्थ मरीज बाहर के व्यापारिक अस्पतालों में जाकर अपनी समस्याओं का समाधान कराते हैं। दुर्भाग्य की बात तो यह है कि पिछले दिनों ऐसा ही एक मरीज दिल्ली स्थित एम्स तक भी इस काम के लिए पहुंचा था। लेकिन यहां के नालायक निकम्मे डॉक्टरों ने वे टेस्ट तक करने में अड़ंगेबाजी लगाई जो एम्स के डॉक्टरों ने लिख कर दिए थे। यानी खुद कुछ करना नहीं और दूसरों के बताए पर भी अमल नहीं करना। अब यही दस्तूर बन चुका है ईएसआई मेडिकल कॉलेज अस्पताल का। केवल अपनी पीठ थपथपाने के लिए झूठी खबर छपवाते हैं। यदि उक्त खबर झूठी एवं पेड न होती तो पत्रकार यह पूछ सकता था कि उक्त लैब की स्थापना कब हुई, इसमें कितने टैस्ट प्रतिदिन या प्रतिमाह किये जा रहे हैं और कितने प्रत्यारोपण प्रतिमाह यहां किए जा रहे हैं। यह भी पूछा जा सकता था कि अस्पताल में कोई नेफ्रोलोजिस्ट है या नहीं, अगर है तो उसका नाम व शैक्षिणक योग्यता क्या है।

  Article "tagged" as:
bjp
  Categories:
view more articles

About Article Author

Mazdoor Morcha
Mazdoor Morcha

View More Articles