फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) आर्टिफिशल इंटेलिजेंस और क्वांटम कंप्यूटर के युग में जहां स्कूलों में आधुनिक शिक्षा देने की बात होनी चाहिए, संघी मानसिकता से घिरी मोदी-सैनी सरकारें नई शिक्षा नीति के नाम पर मनुवादी व्यवस्था लागू करने की तैयारी कर रही हैं। नई शिक्षा नीति के तहत अगले शिक्षा सत्र से प्राइमरी स्कूलों में संस्कार शिक्षक तैनात किए जाएंगे। इनकी योग्यता बारहवीं पास निर्धारित की गई है। ये अध्यापक विद्यार्थियों को क्या संस्कार देंगे, शिक्षा विभाग ने अभी इसका खुलासा नहीं किया है, बताया जा रहा है कि संस्कार का पाठ्यक्रम तैयार किया जा रहा है।
बीते दस साल में संघी-भाजपाई सरकार ने प्रदेश में शिक्षा का बेड़ा गर्क कर दिया है। शिक्षा जगत के जानकारों के अनुसार प्रदेश में प्रारंभिक शिक्षक (पीआरटी) के करीब 8500 पद खाली हैं, पीजीटी के 11 हजार और टीजीटी के कमोबेश 15 हजार पद खाली हैं। किसी भी सरकारी स्कूल में गणित, अंग्रेजी, विज्ञान विषयों के पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं। विद्यालयों में ढंग का पुस्तकालय, विभिन्न विषयों की लैबोरेट्री नहीं हैं। कक्षाओं के लिए साढ़े सात हजार से अधिक कमरों की जरूरत है।
सरकार के पास इन बहुत ही जरूरी सेवाओं के लिए पैसा नहीं है लेकिन संस्कार शिक्षकों की तैनाती का बजट तुरंत जारी कर दिया जाएगा। सीएम सैनी और उनके पूर्ववर्ती खट्टर, शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के ढोल तो पीटते रहे लेकिन किया कुछ नहीं। छात्रों को बेहतर शिक्षा देने के लिए पर्याप्त शिक्षक, आधारभूत ढांचा, लाइब्रेरी, लैबोरेट्री किसी भी स्कूल के अति आवश्यक घटक हैं लेकिन सरकार इन पर नहीं खर्च कर रही। स्थायी शिक्षक तो तैनात कर नहीं रही, और अब आधुनिक शिक्षा का बेड़ा गर्क करने को संस्कार शिक्षक लगाए जाएंगे। शिक्षा विभाग के सूत्रों के अनुसार संस्कार शिक्षकों की तैनाती भारत सरकार के साक्षरता मिशन और मिनिस्ट्री ऑफ कल्चर अफेयर्स के निर्देशन में एक निजी संस्था द्वारा प्राइमरी स्कूलों में की जाएगी। प्रत्येक अध्यापक प्रतिदिन दो घंटे अध्यापन करेगा, इसके लिए उसे प्रतिमाह 9240 रुपये मानदेय दिया जाएगा। शिक्षकों की तैनाती के लिए विभाग द्वारा आवेदन प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
राजनीतिक जानकार संस्कार शिक्षकों की तैनाती को सरकारी स्कूलों में सरकार का हिंदुत्ववादी एजेंडा लागू किए जाने का हथियार करार दे रहे हैं। उनका मानना है कि इसके जरिए सरकार स्कूलों में संघ के कार्यकर्ताओं की भर्ती करेगी। सरकारी स्कूलों में शिक्षक बनने के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता बीएड या बीटीसी निर्धारित है, बावजूद इसके संस्कार शिक्षक की शैक्षणिक योग्यता बारहवीं पास रखा जाना सरकार की बदनीयती दर्शाता है। बारहवीं कक्षा तक किसी भी विषय का पाठ्यक्रम एक प्रकार से विषय प्रवेश स्तर तक का ही होता है जिसकी गहन और पर्याप्त जानकारी स्नातक पाठ्यक्रम में ही होती है। ऐसे में बारहवीं पास किशोर/युवा इन बच्चों को क्या पढ़ाएगा समझा जा सकता है।
खास बात यह है कि सरकार यह व्यवस्था अगले शैक्षणिक सत्र से लागू करने वाली है जबकि संस्कार शिक्षा का पाठ्यक्रम भी अभी तैयार नहीं है। सरकार ने इन शिक्षकों की तैनाती का जिम्मा जिस संस्था को दिया है, उसका नाम सार्वजनिक नहीं किया गया है। जानकारों का मानना है कि यह संस्था संघ द्वारा या उसके किसी अनुषांगिक संगठन द्वारा ही संचालित होगी, जाहिर है कि संस्कार शिक्षक भी संघ की शाखाओं में दरियां उठाने-बिछाने वाले, लाठियां भांजने वालों को बनाया जाएगा। क्योंकि ये कम पढ़े लिखे होते हैं इसीलिए योग्यता बारहवीं पास रखी गई है।
क्योंकि अभी तक कोई पाठ्यक्रम तय नहीं हुआ है तो बहुत संभव है कि अगले शैक्षणिक सत्र में ये संस्कार शिक्षक संघ की शाखाओं में दिया जाने वाला कचरा ज्ञान ही सरकारी स्कूलों में बच्चों के दिमाग में भरेंगे। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि मनुस्मृति को आदर्श मानने वाले संघी-भाजपाई संस्कार के नाम पर बच्चों को चतुर्वर्ण व्यवस्था का अनुपालक बनाएं। संस्कार के पाठ्यक्रम में प्राचीन और मध्यकालीन कुरीतियों को धार्मिक गौरव की चाशनी में लपेट कर बच्चों को चटाया जाए। देश को सभ्य, मानवतावादी वैज्ञानिक सोच वाले समाज की महती आवश्यकता है, समाज की नई पौध को इसी दिशा में बढ़ाया जाना चाहिए। संस्कार के नाम पर अधकचरा और अवैज्ञानिक-अतार्किक ज्ञान देकर उसे अंतरराष्ट्रीय शैक्षिणक परिदृष्य से अलग थलग न कर दिया जाए।