यथार्थ अस्पताल में मरीजों से दवा खरीद के नाम पर खुली लूट
फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आयुष्मान भारत योजना देश की सबसे बड़ी भ्रष्टाचार योजना साबित हो चुकी है। इसके जरिए गरीबों के इलाज के नाम पर स्वास्थ्य विभाग और निजी अस्पताल मोटी बंदरबांट कर रहे हैं। मध्यम वर्गीय परिवारों की हालत तो और खराब है, सरकार ने मुफ़्त इलाज की सुविधा उसे तो नहीं दी है लेकिन निजी अस्पतालों को उन्हें लूटने की खुली छूट दे रखी है। सेक्टर 88 में यथार्थ सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल में एक मरीज को बाजार से करीब सात गुना ज्यादा दाम पर दवाएं खरीदने को मजबूर किया गया। परिजनों ने विरोध किया तो अस्पताल प्रबंधन ने अंदर की ही दवाएं इस्तेमाल किए जाने का फरमान सुना दिया। दरअसल, यह सारा धंधा खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग के अधिकारियों की शह पर ही हो रहा है, शिकायत और प्रमाण सामने होने के बावजूद विभाग के सीनियर ड्रग कंट्रोलर करण गोदारा जांच के बाद कार्रवाई करने की बात कर रहे हैं।
जानकारी के अनुसार भतोला निवासी विद्या देवी (80) को सांस लेने में तकलीफ होने की शिकायत पर परिजन उन्हें सात अक्तूबर को यर्थाथ सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल ले गए थे। अस्पताल के डॉ. गुरमीत ने तबीयत गंभीर होने और मौत का डर दिखा का उन्हें आईसीयू में भर्ती कर लिया। भतीजे सुरेंद्र के अनुसार डॉक्टर ने दवाएं लिखीं और अस्पताल के ही मेडिकल स्टोर से लाने को कहा। अस्पताल के मेडिकल स्टोर में काम करने वाले कर्मचारियों ने दवाओं का बिल 21000 रुपये बना दिया। छूट करने की गुजारिश की तो घटा कर बिल 18 हजार 903 बना दिया। इतने रुपये नहीं होने पर बाद में दवा लेने को कह लौट गए। परिजनों की सलाह पर वही दवा बाहर से खरीदी गई तो वहां मेडिकल स्टोर संचालक ने 3300 रुपये का बिल बनाया। परिजन यह दवा लेकर अस्पताल पहुंचे और अंदर के मेडिकल स्टोर में हो रही लूट की शिकायत कर विरोध जताया। अस्पताल प्रबंधन अपने मेडिकल स्टोर के पक्ष में खड़ा हो गया। उल्टे, बाहर से खरीद कर लाई गई दवा अस्पताल के अंदर इस्तेमाल नहीं करने पर अड़ा गया। सुरेंद्र के अनुसार अस्पताल प्रबंधन ने साफ धमकी दी कि इलाज कराना है तो उनके मेडिकल स्टोर की ही दवा खरीदनी पड़ेगी। परिजनों ने हंगामा किया तो अस्पताल प्रबंधन ने पुलिस में शिकायत कर गिरफ्तार कराने और जेल भिजवाने की धमकी तक दे डाली। प्रबंधन अस्पताल में अंदर की दवाएं इस्तेमाल किए जाने पर अड़ा रहा।
परिजनों ने मीडिया को बुला लिया लेकिन भी कोई सुनवाई नहीं हुई। अस्पताल के मार्केटिंग अधिकारी केके झा ने मीडिया को स्पष्ट शब्दों में मना करते हुए कहा कि जिसे जो छापना है, चलाना है चलाए, अस्पताल प्रबंधन अपने नियम नहीं बदलेगा। यानी अस्पताल में इसी तरह सात से आठ गुना ज्यादा कीमत पर ही दवाएं बेची जाएंगी। अस्पताल में चल रही लूट के खिलाफ पीडि़त पक्ष ने जिला खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग में शिकायत दर्ज कराई है। विभाग के सीनियर ड्रग कंट्रोलर करन गोदारा ने बताया कि मामले की जांच करा कर अस्पताल के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। गोदारा जी के पास 3300 रुपये की दवा की रसीद और अस्पताल के मेडिकल स्टोर का 21,000 रुपये का एस्टीमेट मौजूद है, इसके बाद वो जांच कराने की बात कह रहे हैं। लूट का स्पष्ट सुबूत होने के बावजूद तुरंत कार्रवाई नहीं किया जाने से माना जा सकता है कि निजी अस्पतालों को विभागीय अधिकारियों का संरक्षण हासिल है। ज़ाहिर है यह संरक्षण अस्पताल से हर महीने शुकराने की मोटी रकम मिलने के एवज में ही मिलता है।
मरीजों से लूट सिर्फ यथार्थ अस्पताल में ही नहीं चल रही है, मोदी की श्रद्धेय अम्मा के अस्पताल से लेकर हर निजी अस्पताल का यही हाल है। मोदी एक तरफ तो आयुष्मान योजना का ढिंढोरा पीटते रहे और दूसरी तरफ स्वास्थ्य बीमा कंपनियों के दबाव में स्वाथ्य सेवाओं के बजट में लगातार कटौती करते रहे। सरकारी अस्पतालों में मेडिकल, नॉन मेडिकल स्टाफ के पद घटा कर पुराने पदों पर भर्ती नहीं कर सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं पंगु कर दी गईं और लोगों को निजी अस्पताल में इलाज कराने को मजबूर किया गया। निजी अस्पतालों में महंगा इलाज का बिल के नाम पर हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियां फल फूल रही हैं। सरकार, बीमा कंपनियों और निजी अस्पताल के इस गंदे गठजोड़ का खामियाजा विद्या देवी जैसे करोड़ों मध्यम वर्गीय मरीज रोजाना देश भर में कहीं न कहीं भुगत रहे हैं और करण जैसे अधिकारी अपनी जेबें भर रहे हैं। करण गोदारा तो जेबें भरेगा ही क्योंकि नेताओं और विभाग के उच्च अधिकारियों को मोटा नजऱाना देकर ही उसने यह पद हासिल किया है, नियमित हिस्सापत्ती पहुंचाने के कारण ही वह इस पद पर 2016 से टिका हुआ है। हालांकि बीच में उसने 2022 के आरंभ में उच्चाधिकारियों को चुग्गा पानी कम कर दिया तो उसे हटा कर राकेश दहिया को वरिष्ठ औषधि नियंत्रण निरीक्षक का पद सौंपा दिया गया था। ईमानदार राकेश दहिया ने सभी निजी अस्पतपाल, मेडिकल स्टोर आदि की मुश्कें कस दी थीं। यहां तक कि जनवरी 2022 में उन्होंने रसूखदार मेट्रो अस्पताल के ब्लड बैंक में तगड़ी खामियां पाकर उसे करीब तीन महीने तक बंद करवा दिया था। राकेश दहिया की कार्यशैली से भ्रष्टाचारी अस्पताल, मेडिकल स्टोर संचालकों में खलबली मच गई थी। इन सबने मिलकर नेताओं और उच्चाधिकारियों से गुहार लगा कर महज चंद महीनों में ही राकेश दहिया का तबादला करवा दिया था और अपने चहेते करण गोदारा को फिर से गद्दी दिलाई। तब से गोदारा नियमित रूप से अधिकारियों और नेताओं को खुश कर इस पद पर जमा हुआ है।
मोदी का दूसरा मजाक प्रधानमंत्री जन औषधि परियोजना है। दावा तो किया जा रहा है कि सभी दवाएं बाजार दाम से भी अस्सी फीसदी तक कम दाम पर उपलब्ध हैं लेकिन सच्चाई ये है कि निजी अस्पताल इन दवाओं का इस्तेमाल ही नहीं करते। और मरीजों को बाजार से भी छह-सात गुना ज्यादा दाम पर दवाएं खरीदने को मजबूर कर रहे हैं और मोदी का खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग जनता की लूट में से अपना हिस्सा ले रहा है। इसका दूसरा पहलू ये भी है कि मोदी की जन औषधि परियोजना के लिए तो कंपनियां दवाएं सप्लाई करती हैं उनमें से कई कंपनियों के दवाओं के नमूने फेल हो चुके हैं, यानी जन औषधि की दवाओं की गुणवत्ता भी संदिग्ध है, लेकिन ढिंढोरा ऐसे पीटा जा रहा है जैसे बहुत अच्छी दवाएं मिलती हैं। जिस तरह से निजी अस्पतालों में मरीजों को लूटा जा रहा है उससे स्पष्ट है कि मोदी सरकार ने उन्हें ऐसा करने की खुली छूट दे रखी है और अपनी छवि चमकाने के लिए मोदी जी योजनाओं का झुनझुना बजा कर जनता को वरगला रहे हैं।