फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी अंतिम चरणों में है और शिक्षा विभाग अपने शिक्षकों को पढ़ाने का काम छोड़ कर नगर निगम चुनाव में लगा रहा है, यानी अधिकारियों की नजर में बच्चों के उज्जवल भविष्य से ज्यादा पार्षदों का चुनाव अहम है।
दसवीं-बारहवीं के परीक्षा परिणामों में फरीदाबाद बीते कई साल से प्रदेश में अंतिम पायदान या उसके पास ही रहता आया है। शिक्षकों से पढ़ाई न करवा कर उन्हें जब दूसरे कामों में लगाया जाएगा तो यही परिणाम आएंगे। पहले तो लोकसभा चुनाव में लगा दिया गया। चुनाव संपन्न करा दाखिले और शिक्षण कार्य शुरू कराते ही विधानसभा चुनाव में लगा दिया गया। जो समय कक्षाओं में पाठ्यक्रम पूरा कराने का था वह मतदाताओं की सूची बनाने, बांटने, चुनाव की ट्रेनिंग, मतदान-मतगणना कराने में बीत गया। शिक्षक दूसरी ड्यूटी में मशगूल रहे और स्कूलों में छात्र पढ़ाई में पिछड़ते गए। चुनाव संपन्न हुए तो पढ़ाई कराने से पहले ऑटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाउंट रजिस्ट्री (अपार) आईडी बनाने, टैब बांटने और पुराने विद्यार्थियों से टैब वापस लेने जैसे दूसरे महत्वपूर्ण कार्य उनके जिम्मे लगा दिए गए।
शिक्षक इन कार्यों में लगे थे फिर नगर निगम चुनाव की घोषणा कर दी गई और उन्हें इसमें झोंक दिया गया है। शिक्षक अब बीएलओ की जिम्मेदारी निभाते हुए मतदाता सूची अपडेट करने, घर-घर मतदाता पर्ची पहुंचाने में लगाए जा रहे हैं। इसके बाद मतदान और मतगणना में जुटेंगे यानी इस महीने भी अधिकतर शिक्षक गैर शैक्षणिक कार्यों में लगे रहेंगे। चुनाव ड्यूटी ही नहीं, शिक्षकों से बेगार लेने की प्रथा काफी पुरानी है, चुनाव का समय न हो तो उन्हें पोलियो ड्रॉप पिलाने, सरकारी कार्यक्रम, योग दिवस की तैयारियां करने आदि में जोत दिया जाता है। सरकार कोई योजना बनाए तो उसके लिए सर्वे, जनगणना आदि में शिक्षकों को झोंकना स्थायी प्रक्रिया हो चुकी है।
कोढ़ में खाज शिक्षकों की कमी है। सरकार सर्व शिक्षा अभियान, शिक्षा का मौलिक अधिकार जैसे ढिंढोरे बजाती है लेकिन स्कूल चलाने के लिए जरूरी शिक्षकों के पद नहीं भर रही है। फरीदाबाद में शिक्षकों के 5500 से अधिक पद स्वीकृत हैं, इनमें से डेढ़ हजार से अधिक पद खाली हैं। अंग्रेजी, गणित, विज्ञान और कॉमर्स विषयों के 483 पद स्वीकृत हैं जबकि इनमें से 148 पद खाली हैं। बचे खुचे शिक्षक भी चुनाव या अन्य गैर शैक्षिणक कार्यों में लगा दिए जाएंगे तो बच्चों का भविष्य चौपट होना तय है। और जब परीक्षा परिणाम में अधिकतर बच्चे असफल होते हैं तो इन्हीं शिक्षकों पर गाज गिरती है, परिणाम खराब आने के लिए उनसे जवाब तलबी होती है, वेतन वृद्धि रोकने से लेकर दूर दराज तबादले जैसी सजा दी जाती है, हालांकि वहां भी उनसे यही सब काम कराए जाते हैं।
अनकहा संदेश यही है कोई समझ सके तो समझ ले कि जिसने बच्चे पढ़वाने हों तो प्राइवेट में पढ़ा लो, लेकिन वहां दसियों हजार फीस भरनी होती है। सरकारी स्कूलों के भरोसे मत रहना, सरकार की कोई इच्छा नहीं है कि आम आदमी के बच्चे पढ़ सकें। पढ़ लेंगे तो नौकरी मांगेंगे, सरकार से सवाल करेंगे, बहस करेंगे इससे भी बड़ी बात यह है कि अगर पढ़ लिखकर इनके ज्ञान चक्षु खुल गए तो नफरती राजनीति करने वालों की रैलियों में भीड़ नहीं जुटेगी, मंदिर-मस्जिद के नाम पर दंगा करने वाले नहीं मिलेंगे, उन्मादी नारे लगाने वालों का टोटा हो जाएगा जिनके बल पर ये सरकार बनाते हैं।