फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) पूर्व सीएम खट्टर की छत्रछाया में हरियाणा फार्मेसी काउंसिल में अभ्यर्थियों को लूटने के आरोपी धनेश अदलखा और भ्रष्टाचार में लिप्त उनके सहयोगी राजकुमार वर्मा, सोहनलाल कंसल को सीएम सैनी राज में एक बार फिर यह सब करने की खुली छूट दे दी गई है। 20 जनवरी 2025 को प्रदेश सरकार की ओर से जारी गजट नोटिफिकेशन के अनुसार राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय ने हरियाणा फार्मेसी काउंसिल के छह सदस्यों का चुनाव किया है। भ्रष्टाचार के मामले में काफी समय जेल काटने वाले सोहनलाल कंसल को राज्यपाल ने सौगात देते हुए उनके पुत्र कनिश्क कंसल को भी चुना है। इनके अलावा पानीपत निवासी टीपू सिंह और झज्जर निवासी अनिल कुमार को भी काउंसिल का सदस्य बनाया गया है।
भाजपा सरकार में धनेश अदलखा को फिर से काउंसिल का सदस्य बनाए जाने पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। स्टेट विजिलेंस ने फार्मासिस्टों को लाइसेंस जारी करने और रिन्यू करने के एवज में दलाल सुभाष आरोड़ा व अन्य के जरिए मोटी रकम हड़पने का दोषी करार देते हुए जुलाई 2022 में अदलखा, कंसल और वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार उन्मूलन एक्ट के तहत केस दर्ज किया था। गिरफ़्तार हुए सोहन लाल कंसल ने कुबूल किया था कि लाइसेंस और रिन्यू करने के एवज में मोटी रिश्वत ली जाती थी, यह सब अध्यक्ष धनेश अदलखा ही करवाता था। रिश्वत की रकम तीनों में बंटती थी।
विजिलेंस गिरफ्तार करती इससे पहले खट्टर-कृष्णपाल गूजर का चहेता धनेश फरार हो गया और तब ही प्रकट हुआ जब भ्रष्टाचार के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस का पाखंड करने वाले सीएम खट्टर ने उसे विजिलेंस शिकंजे से बचा लिया। खुले भ्रष्टाचार की जांच में ऐसी लीपापोती कराई गई कि धनेश और रजिस्ट्रार राजकुमार वर्मा को उसी विजिलेंस ने क्लीनचिट् दे दी जिसके पास इन लोगों द्वारा रिश्वतखोरी के ठोस सुबूत थे। भ्रष्टाचारी चेले को क्लीनचिट् दिलाने भर से खट्टर को चैन नहीं आया तो उन्होंने उसे बडख़ल विधानसभा का टिकट भी दिला दिया।
खट्टर की परंपरा को ही आगे बढ़ाते हुए नए सीएम नायब सैनी ने भी अदलखा सहित भ्रष्टाचार के सभी आरोपियों को एक बार फिर हरियाणा फार्मेसी काउंसिल का सदस्य बनवाया है। इन लोगों को काउंसिल का सदस्य बनाए जाने से भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई करने वाले और बिना रिश्वत लाइसेंस लेने की जिद करने वाले फार्मासिस्टों का मनोबल औंधे मुंह गिरा होगा। इसके विपरीत अदलखा, कंसल, वर्मा रिश्वत लेने के और भी फूलप्रूफ तरीके तैयार करेंगे ताकि फिर से विजिलेंस जांच के चक्कर में न उलझ जाएं। वैसे भी अदलखा राजनेताओं के साथ-साथ अफसरों के साथ हिस्सा-पत्ती करने में विशेष महारत रखता है, तो लूट की हराम कमाई से खुद पनपने के साथ ऊपर तक सबको पनपाता रहेगा। भ्रष्टाचार के आरोपियों की काउंसिल में दोबारा तैनाती से सरकार की नीयत और मंशा का पता चलता है, रही बात भ्रष्टाचार उन्मूलन और जीरो टॉलरेंस की तो ये जुमले अंधभक्त और अनभिज्ञ जनता के लिए हैं जो इन्हें सुनकर प्रदेश में सब कुछ ठीक होने का मुगालता पाले बैठी है।
ऐसा प्रतीत होता है कि इस तरह की काउंसिलों की स्थापना ही लूट कमाई के लिए हुई है, यदि ऐसा नहीं है तो पंजीकरण के बाद हर पांच साल पर लाइसेंस रिन्यू जैसी गैरजरूरी शर्तें नहीं रखी जातीं। छात्र शिक्षण संस्थाओं से पढ़ कर फार्मेसी की डिग्री-डिप्लोमा हासिल करते हैं, काउंसिल उनके ज्ञान, कौशल या डिग्री-डिप्लोमा में कोई इजाफा भी नहीं करती तो पंजीकरण और हर पांच साल पर रिन्यू की अनावश्यक अनिवार्यता केवल लूट कमाई का जरिया नहीं तो और क्या है?