मज़दूर मोर्चा ब्यूरो झूठ की बुनियाद पर खड़ी भाजपाई मोदी सरकार ने जनता को बेवकूफ बनाने के लिए सन 23 सितम्बर 2018 में आयुष्मान योजना का ढोल पीटना शुरू किया था। सैंकड़ों करोड़ रुपए विज्ञापनबाजी पर खर्च करके बताया गया था कि यह दुनियां की सबसे बड़ी स्वास्थ्य सेवा योजना है। इसके तहत भारत के 50 करोड़ नागरिक लाभान्वित होंगे। इसके द्वारा एक परिवार के लिए पांच लाख रुपए तक का इलाज मुफ्त प्राप्त किया जा सकेगा।
दरअसल, 2014 में सत्तारुढ़ हुई मोदी सरकार के पास, 2019 के आगामी चुनाव में दिखाने को कुछ भी ऐसा नहीं था जिसके नाम पर वोट मांगा जा सकता। स्वास्थ्य क्षेत्र में कुछ बड़ा कर दिखाने के चक्कर में मोदी ने इस पाखंड भरी योजना का ऐलान किया था। चिकित्सा सेवा किसी को मिले या न मिले, इसकी परवाह किए बगैर इसके कार्ड बनाने तथा मोदी के फोटो लगे फार्म घर-घर भेजने के साथ-साथ मीडिया के द्वारा इसके प्रचार पर सैंकड़ों करोड़ रूपया फूंक दिया गया। इस सबके बावजूद आज तक भी इस योजना के लिए 50 करोड़ कार्डधारक नहीं बनाए जा सके। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार मात्र 42 करोड़ 55 लाख कार्ड ही जारी हो सके हैं। यहां गौरतलब है कि यह कार्ड परिवार का न होकर व्यक्ति विशेष के लिए ही होता है।
बड़ा प्रश्न सरकार के सामने यह था कि कार्डधारक पांच लाख रुपए तक का इलाज कौन से अस्पताल में होगा? सरकार बखूबी जानती है कि उसके अपने सरकारी अस्पतालों में सुपरस्पेशलिटी ट्रीटमेंट की व्यवस्था न के बराबर है। इसलिए तय किया गया कि निजी व्यापारिक अस्पातालों से अनुबंध करके कार्डधारकों को इलाज दिलाया जाय। लेकिन सरकार द्वारा घोषित दरों पर इन में से ज्यादातर अस्पतालों ने अनुबंध करने से सा$फ इनकार कर दिया तो सरकार ने प्रशासनिक डंडे के द्वारा जबरन अनुबंध करने का प्रयास किया, इसमें कुछ हद तक सफलता भी मिली। कुछ अस्पतालों ने इस योजना में घोटालेबाजी की सम्भावना को समझते हुए अनुबंध करना लाभकारी समझा। गुजरात से लेकर हरियाणा तक करोड़ों रुपए की घोटाले बाज़ी के अनेकों समाचार प्रकाशित हो चुके हैं।
इस योजना के तहत बीमारियों की बाकायदा एक लिस्ट बनाई गई जिसके अनुसार कुछ बीमारियों को सरकारी अस्पतालों के लिए तो कुछ को व्यापारिक अस्पतालों के लिए चिन्हित किया गया। जिन निश्चित बीमारियों के इलाज हेतु मरीज सरकारी अस्पतालों में पहुंचे तो अधिकांश मामलों में धक्के खाते व सरकार को कोसते हुए, अपने साधनों से वैकल्पिक अस्पतालों में चले गए। निजी अस्पतालों में एक दूसरा ही तमाशा देखने को मिला वहां हर बीमारी के इलाज के लिए कुछ विशेष रकम तय कर रखी थी। उदाहरणार्थ कैंसर के लिए मात्र 84 हजार, ह्दय रोग के लिए मात्र एक लाख आदि-आदि। सर्वविदित है कि कैंसर का इलाज 84 हजार में नहीं हो पाता और न ही एक लाख में ह्दय रोग, तथा किडनी प्रत्यारोपण जैसा काम तो कई लाख में होता है। जाहिर है कि ऐसे में कार्डधारक को कोई भी अस्पताल तय रकम से ज्यादा का इलाज न देकर अधूरे इलाज के साथ चलता कर देगा या अतिरिक्त पैसे की मांंग करेगा। ऐसे आयुष्मान कार्ड को लेकर गरीब आदमी केवल अपना माथा पीट सकता है और यदि अंधभक्त न हो तो मोदी को जी भर कर गालियां दे सकता है।
हरियाणा सरकार ने भी अब पाखंड का पर्दा उतार फेंकते हुए घुटना प्रत्यारोपण, कूल्हा, कान के पर्दे, हर्निया अपेंडिक्स, बवासीर, टॉन्सिल, अंडकोष में पानी भर जाना जैसी बीमारियों को निजी अस्पतालो की सूची से निकाल कर अपने सरकारी अस्पतालों की सूची में डालकर निजी अस्पतालों को देनदारी से अपना पल्ला झाड़ लिया है। विदित है कि पिछले तीन चार वर्षों से निजी अस्पताल कई बार आयुष्मान कार्ड धारकों का इलाज करने से मना कर चुके हैं क्योंकि सरकार 200-300 करोड़ तक की पेमेंट रोक कर बैठ जाती है। अब न कार्ड धारक मरीज वहां जाएंगे और न ही सरकार में बिल खड़े होंगे यानी न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।
यदि ये सरकारी अस्पताल किसी काम के होते तो निजी अस्पतालों का व्यापार कैसे फल-फूल सकता था? ये सरकारी अस्पताल सदा से ही नाकारा नहीं रहे हैं। इन्हें धीरे-धीरे सरकार चलाने वालों नेताओं ने इस कदर नाकारा बना दिया कि निजी अस्पतालों का कारोबार दिन दूना और रात चौगुना फलने-फूलने लगा। इनमें से कुछ अस्पताल तो ऐसे बेदर्द एवं शातिर हैं कि वे अपने यहां आने वाले मरीज को इंसान न समझ कर केवल पिंजड़े में आया शिकार ही समझते हैं। उन्हें मरीज की जान से कुछ लेना-देना नहीं होता, उन्हें तो केवल मुना$फा एवं लूट कमाई से ही मतलब रहता है।