रुचिर गर्ग आपकी भारत के संविधान में आस्था बची रह गई हो तो क्या आप किसी एक दिन इस देश के एक आम मुस्लिम नागरिक की तरह जी कर देखना चाहेंगे ? यह दोहराने की तो जरूरत नहीं है कि संविधान में भारत को एक संप्रभु,समाजवादी,पंथनिरपेक्ष,लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया है। यह भी दोहराने की जरूरत नहीं है कि संविधान में इस देश के नागरिकों के लिए न्याय,स्वतंत्रता,समानता और बंधुत्व सुनिश्चित करने का संकल्प लिया गया है । लेकिन संविधान की आत्मा से, ‘हम भारत के लोग’ से क्या हमने अपने मुसलमान पड़ोसी को बेदखल कर दिया है ? हम-आप तो उस पीढ़ी से हैं जिन्होंने सीधे आजादी की लड़ाई देखी नहीं,जिन्होंने इस लड़ाई में दी गई कुर्बानियां नहीं देखीं,जिन्होंने जाना नहीं कि आजादी के संघर्ष में बहे खून को हिंदू,मुसलमान,सिख, ईसाई में बांटा नहीं जा सकता। दुनिया के इस महान स्वतंत्रता संघर्ष में सबका खून साथ बहा है ये हमने देखा नहीं और अपने पुरखों के बताए को भूल भी चुके हैं।
हम आजादी की लड़ाई के मूल्यों को,कुर्बानियों को,आजाद देश की एकता और अखंडता की तमाम शिक्षाओं को तिलांजलि देते जा रहे हैं इसलिए हमें नफरत की एक आंधी ऐसा बहा ले गई कि हमें अपने पड़ोस में रहने वाले मुसलमान के मासूम बच्चों के चेहरे पर धर्म नजर आने लगा है ! कुछ लोग, बहुत सारे लोग, शायद बहुत सारे से भी बहुत ज्यादा लोग निजी हाउसिंग सोसाइटियों में महंगे घर बना कर रहने लगे तो उन्हें लगने लगा कि ये देश तो बस उनका ही है और यहां मुसलमान की औलादों का क्या काम ? उन्हें लगने लगा कि इस देश की हवा,यहां की मिट्टी,यहां का पानी,यहां के पेड़,बाग-बगीचे सब केवल उनकी सांसों को सुरक्षित रखने के लिए हैं , मुसलमान का उनकी सोसाइटी में क्या काम ? उन्हें लगने लगा कि देश केवल उनके खून पसीने से चलता है,अब्दुल तो बस उनकी गाडिय़ों का पंक्चर बनाने के लिए जिंदा रहे और कोने में पड़ा रहे !! लानत है उन्हें जिन्होंने अपनी रोज की जिंदगी से मोहब्बत को बेदखल कर नफरत को जगह दे डाली है ! उनके विवेक की ऐसी मौत पर संवेदना ही व्यक्त की जा सकती है। दरअसल आज एक मित्र से मुलाकात हुई और उन्होंने जो बताया वो विचलित करता है। उसमें नया कुछ नहीं रह गया है लेकिन जब आपको वो मासूम बच्चे नजर आ रहे हों जिन्हें- ‘मुसलमान है !’ कह कर अपने बच्चों से दूर कर दिया जाता हो,तो लगता है कि ज़हालत घर-घर घुस गई है ।
लगता है कि नफरत ने कोई गली नहीं छोड़ी है,कोई घर नहीं छोड़ा है! ये रायपुर की एक आलीशान हाउसिंग सोसाइटी की कहानी है।
छोटा सा मुस्लिम परिवार। किसी मोहल्ले के अपने घर को बेच कर एक बिल्डर की खड़ी की हाउसिंग सोसाइटी में महंगा घर बना लेता है।इस उम्मीद में कि बच्चों को क्लब हाउस मिलेगा,गार्डन मिलेगा,साफ पानी और सुरक्षा मिलेगी , चौड़ी सड़कें होंगी,स्विमिंग पूल होगा,उच्च शिक्षित लोगों का ऐसा साथ मिलेगा कि बच्चे एक बेहतर भविष्य की ओर आगे बढ़ेंगे। मिला क्या ? उच्च शिक्षित ऐसे लोग जो इंसान को इंसान नहीं धर्म की नजरों से देखते हों ! मिले कौन ? ऐसे नफरती लोग जो अपने छोटे-छोटे बच्चों को यह सिखा रहे हैं कि फलाने बच्चे मुसलमान हैं उनके साथ नहीं खेलना!उनसे दूर रहना है! मिले कौन ? ऐसे पड़ोसी जो कहते हैं कि आपकी वजह से हमारी प्रॉपर्टी की कीमत कम हो गई! सुरक्षित जिंदगी के लिए जिस मुस्लिम परिवार ने महंगी सोसाइटी में जाना मंजूर किया उसे सुरक्षा के नाम पर रोज उन गाड्र्स का सामना करना पड़ता है जो मुसलमान के हॉर्न बजाने पर दरवाजा देर से खोलते हैं,उनके मेहमानों से बदतमीजी करते हैं और उनसे तो खैर… और मिला एक ऐसा बिल्डर जिसने पैसे पूरे लिए ,हर सुविधा के एवज में पाई-पाई वसूली लेकिन उसका सिस्टम हर रोज यह जताता है कि सोसाइटी की सुविधाएं किसी मुसलमान के लिए नहीं हैं ! ऐसे लोग खुश हो सकते हैं कि दशकों की नफरत भरी मेहनत अब रंग ला रही है। हिंदू राष्ट्र की बस अब घोषणा ही बाकी है ! संयोग से अभी लोहड़ी पर एक पंजाबी मित्र के घर जाना हुआ। वहां दुबई से उनके भाई भी आए हुए थे। दुबई की जिंदगी के बारे में बात करते हुए कह रहे थे कि वहां तो पाकिस्तानियों और बांग्लादेशियों के साथ के बिना व्यापार तो छोडि़ए जीवन की कल्पना नहीं है ! और यहां ये नफरत पसंद लोग अपने पड़ोस के मासूम बच्चों को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं ! दरअसल इनके भेजे रातों रात नहीं बदले हैं ।बहुत मेहनत के साथ इन्हें नफरत के खाद-पानी के साथ सींचा गया है।
ये वो तबका है जो भारत के संविधान की आत्मा को कुचलना ही चाहता है और हर रोज अपनी गलियों में कुचल रहा है यह भी दिखता है। देश को इस नफरत में धकेलने वाले कभी शिक्षा,रोजगार,कला,संस्कृति की बात नहीं करते। इन बातों को करने वालों को हर रोज पंडित नेहरू की तरह गालियां खानी पड़ती हैं ! अपने बच्चों को इस राह पर धकेलने वालों को ज़िंदगी में एक बार अपने उन बच्चों को आस्था के वो रंग दिखलाने चाहिए जहां हिन्दू मुसलमान नहीं, प्रेम बसता है। उन्हें अपने बच्चों को एक बार विज्ञान की वो राह दिखलानी चाहिए जहां डॉ. इब्राहिम अली अबूबकर सिद्दीक, डॉ. मोहम्मद जाहिद अशरफ, डॉ. निशांत अफऱोज़, डॉ. एस एन ए रिजवी, डॉ.सैयद जहूर कासिम से लेकर सना फिरोज,यासर अम्मार ,मोहम्मद साबिर आलम,अरीब अहमद,अख्तर अब्बास,इशरत जमाल जैसे युवा वैज्ञानिक इस देश के निर्माण में अपनी शानदार भूमिका के साथ मौजूद मिलेंगे । ये सारे नाम गूगल पर सर्च कर लें। मैंने भी किए हैं। इनके काम भी वहीं दर्ज हैं। ये बस चंद उदाहरण हैं।
देश शिक्षा,रोजगार से लेकर अनुसंधान तक पिछड़ रहा है क्योंकि हम आप नफरत की प्रयोगशाला के गिनी पिग बन चुके हैं। इंदौर गंदे पानी में डूब कर मर रहा है,दिल्ली की हवा के साथ ही पानी भी जहरीला है ये बात ष्ट्रत्र की ऑडिट रिपोर्ट में कही गई है। लेकिन पहले हिन्दू मुसलमान कर लें फिर साफ हवा,शुद्ध पानी के लिए लड़ेंगे ! आज यही देश है ! प्रिय सोसाइटी-नागरिकों चिंता इस बात की करो। आपके ही पुरखों ने खून और पसीना बहाया तो आज आप बड़े गार्डन और स्विमिंग पूल वाली सोसाइटी में धूप सेक रहे हैं। और हां ! आपके पुरखे अकेले नहीं लड़े थे। कंधे से कंधा मिला कर अपने देश के लिए जो लड़े थे उनमें मरणोपरांत परम वीर चक्र प्राप्त शहीद अब्दुल हमीद भी थे। बेमिसाल बहादुरी के प्रतीक वीर अब्दुल हमीद। देर तो बहुत हो चुकी है फिर भी इस देश को अंदर से खोखला होने से बचाइए । अब्दुल के बच्चे के साथ अपने बच्चे को रॉकेट उड़ाने की तकनीक सिखाइए।हो सकता है कुछ और अब्दुल कलाम पैदा हो जाएं।नहीं तो इस देश के बच्चे वही गले में गमछा डाले हिन्दू मुसलमान ईसाई करते गलियों में घूमेंगे! सम्पन्न और ताकतवर के बच्चे तो फिर भी बच जायेंगे पर आम हिन्दुस्तानी क्या करेगा ? इसलिए जरूरी है कि आम हिन्दुस्तानी इस देश के संविधान को बचाने की लड़ाई लड़े।