डॉ. पंकज श्रीवास्तव इस शीर्षक को देखकर आप अगर चौंक रहे हैं और लिखने वाले को व्हाट्सऐप युनिवर्सिटी से निकला पागल समझ रहे हैं तो आप बिल्कुल ठीक हैं। लेकिन बॉक्स ऑफि़स पर धुआँधार कमाई कर रही फि़ल्म धुरंधर के निर्दशक आदित्य धर के ‘स्कूल’ से निकले किसी फि़ल्मकार के लिए ऐसी फि़ल्म बनाना मुश्किल नहीं होगा जब केंद्र में बीजेपी की सरकार नहीं होगी। जिस तरह से धुरंधर फि़ल्म में ‘व्हाट्सऐप ज्ञान’ को संदर्भहीन तथ्यों और सत्य-असत्य का घालमेल करके बीजेपी विरोधी दलों को विदेशी साज़िश में शामिल बताया गया है, उसी तरह कांग्रेस को पहली बार केंद्र की सत्ता से बाहर करने वाले जनता पार्टी के प्रयोग को भी आईएसआई का प्रोजेक्ट बताया जा सकता है। पीएम मोदी को ‘महामानव’ और विपक्ष को ‘देशद्रोही’ बताने का नैरिटव सेट करने के लिए बनायी गयी धुरंधर इस लिहाज़ से एक ख़तरनाक शुरुआत है।
इंदिरा गाँधी ने 1968 में रिसर्च एंड एनेलिसिस विंग या रॉ की स्थापना की थी। यह विदेशी धरती पर ख़ुफिय़ा ऑपरेशन्स के ज़रिए भारतीय हितों की रक्षा करने वाली बेहद दक्ष ख़ुफिय़ा एजेंसी के रूप में जल्दी की प्रसिद्ध हो गयी। लेकिन जनता पार्टी के शासन में प्रधानमंत्री बने मोरारजी देसाई ने रॉ को कमज़ोर कर दिया। रॉ में काम कर चुके बी.रमन ने अपनी किताब ‘काव-ब्वायज़ ऑफ रॉ’ में कई चौंकाने वाले रहस्योद्घाटन किये हैं। रामनाथ काव रॉ के पहले डायरेक्टर थे और यह किताब रॉ को मज़बूत करने में उनकी कल्पनाशीलता और पेशेवर दक्षता का बयान करती है। इसी से पता चलता है कि पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का ब्ल्यूप्रिंट हासिल करने के ऑपरेशन्स के लिए मोरारजी देसाई ने रॉ को पचास लाख रुपये देने से मना कर दिया था। यही नहीं, पाकिस्तान के तानाशाह जयि़ा उल हक़ को बातों-बातों में देसाई ने यह भी जानकारी दे दी कि भारत पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के बारे में जानता है। तब पाकिस्तान काहूटा में रेडियम संवर्धन की कोशिश कर रहा है।
दरअसल, जयि़ा उल हक़ लगातार देसाई से संपर्क में रहता था और देसाई की प्रसिद्ध ‘स्वमूत्र चिकित्सा’ का पाठ पढ़ता था। यह एक बुज़ुर्ग गांधीवादी नेता को शीशे में उतारने की उसकी कोशिश थी। जयि़ा उल हक़ को जब पता चला कि भारत की ख़ुफिय़ा एजेंसी काहूटा संयंत्र के बारे में जान गयी है तो उसने एक बड़ा ऑपरेशन चलाकर तमाम रॉ एजेंटों को पकड़वाकर मरवा दिया। देसाई जिस जनता पार्टी के नेता बतौर प्रधानमंत्री थे, उसमें जनसंघ का विलय हुआ था। अटल बिहारी वाजपेयी इस सरकार में विदेशमंत्री और लालकृष्ण आडवाणी सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे। ऊपर के दो पैराग्राफ़ में जो कुछ कहा गया है, उसमें कुछ कल्पना जोड़कर देसाई से लेकर वाजपेयी और आडवाणी तक को पाकिस्तान का एजेंटे बताने वाली फि़ल्म बनायी जा सकती है। क्लाईमेक्स में यह भी दिखाया जा सकता है कि भारत से ग़द्दारी करने के लिए ही मोरारजी देसाई को पाकिस्तान ने अपना सर्वोच्च सम्मान निशान-ए-पाकिस्तान दिया था। ‘आदित्यधर स्टाइल’ के फि़ल्मकार के लिए ऐसी फि़ल्म बनाना बायें हाथ का खेल होगा। पाकिस्तान विरोध की तीव्रता की वजह से यह फि़ल्म बॉक्स ऑफि़स में भी धमाल मचायेगी। धुरंधर की तरह उस फि़ल्म में भी यह डिस्क्लेमर दे दिया जायेगा कि यह फि़ल्म काल्पनिक है और कुछ घटनाओं से प्रेरित भर है ।
लेकिन हम जानते हैं कि यह सरासर बेईमानी होगी। न देसाई की देशभक्ति पर संदेह किया जा सकता है और न वाजपेयी और आडवाणी को पाकिस्तान परस्त बताया जा सकता है। फि़ल्म धुरंधर मोदी और बीजेपी की वाहवाही में यही बेईमानी कर रही है। इसलिए धुरंधर भारत के संसदीय गणतंत्र पर हमला है! यह पाकिस्तान विरोध के रैपर में तानाशाही के समर्थन में जनमत तैयार कर रही है। फि़ल्म बताती है कि भाजपा छोड़ सभी दल भारत विरोधी ताकतों के पैसे पर पलते हैं। प्रकारांतर में यह बहुजनों की दावेदारी को देश विरोधी ताकतों का प्रोजेक्ट बता रही है। ‘सोशलिस्टों’ को आईएसआई के पैसे मिलने की बात कहकर यह फि़ल्म कांग्रेस और सपा जैसे दलों पर ही निशाना नहीं बनाती, बल्कि भगत सिंह से लेकर नेहरू, लोहिया और जय प्रकाश नारायण जैसी विभूतियों को भी अपमानित करती है जो ‘समाजवाद’ के लिए जिये और मरे। आदित्य धर भूल गया है कि समाजवाद भारतीय संविधान का संकल्प है! भाजपा के लोग भले ही इसे प्रस्तावना से हटाने की माँग करते हों! फि़ल्म पीएम मोदी को दैवीय वरदान की तरह पेश करती है। यहाँ तक कि नोटबंदी जैसे फ़ैसले को भी देश विरोधी ताकतों की कमर तोडऩे का फ़ैसला बताती है जबकि इसने भारतीय अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी। 99.3त्न नोट बैंकों में वापस पहुँच गये थे! आम जनता महीनों परेशान रही थी। तब ताली बजाकर लोगों की परेशानी का मज़ा लेने वाले पीएम मोदी अब इसकी चर्चा भी नहीं करना चाहते जिसे दस साल बाद धुरंधर उनका मास्टर स्ट्रोक बता रही है।
फि़ल्म सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के इरादे से यूपी में बीजेपी विरोधी दलों से विधायक रहे माफिया अतीक़ अहमद से मिलते-जुलते चरित्र को आईएसआई का प्यादा बताती है जबकि वाजपेयी सरकार के छह और मोदी सरकार के बारह सालों के दौरान किसी एजेंसी ने ऐसी रिपोर्ट नहीं दी थी। अतीक़ और उसके भाई की 2023 में पुलिस हिरासत में हत्या कर दी गयी थी। मोदी और शाह समेत पूरे सदन ने लोकसभा में अतीक़ अहमद को श्रद्धांजलि दी थी। क्या संसद में आईएसआई एजेंट को श्रद्धांजलि दी गयी थी? आदित्य धर यह सवाल करने की हिम्मत नहीं दिखा पाये।फि़ल्म धुरंधर में अतीक़ अहमद और उसके भाई की पुलिस हिरासत में की गयी हत्या को भारतीय ख़ुफिय़ा एजेंसियों का ऑपरेशन बताया गया है। हाल ही में अमेरिका के धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने ‘रॉ’ पर प्रतिबंध की माँग की है। ऐसे वक़्त में रॉ का ऐसा चित्रण भारत के हितों के ख़िलाफ़ है। यह कूटनीतिक हाराकिरी है! और यह संयोग नहीं है कि दाऊद इब्राहीम को ‘बड़े साहब’ बतौर मास्टरमाइंड बताने वाली इस फि़ल्म में एजेंसियों की नजऱ में दाउद इब्राहिम के शूटर रहे यूपी के मोस्ट वांटेड ब्रजेश सिंह की चर्चा भी नहीं है। क्या इसलिए कि उसके परिवार के कई लोग बीजेपी से विधायक रहे हैं! वह ख़ुद भी कई मामलों में बरी होकर एमएलसी बना।
हक़ीक़त तो यह भी है कि फि़ल्म में आईएसआई के पैसे पर पलने वाले विपक्षी नेता बतौर पेश किये गये अतीक़ अहमद को बीजेपी के वरिष्ठ नेता केशरीनाथ त्रिपाठी का लगातार क़ानूनी संरक्षण हासिल था जो इलाहाबाद के बड़े वक़ील थे। वे यूपी विधानसबा के कई सालों तक अध्यक्ष भी रहे। अतीक़ की हत्या के बाद इंडिया टुडे में छपे एक लेख में कहा गया था-”अतीक़ अहमद के केशरीनाथ त्रिपाठी से बहुत अच्छे संबंध थे. कई मौक़ों पर अतीक़ अहमद को गिरफ़्तार होने से त्रिपाठी ने बचाया था। केशरीनाथ त्रिपाठी का निधन अतीक़ अहमद के लिए बड़ा झटका था। केशरीनाथ त्रिपाठी को अतीक़ अहमद कार गिफ़्ट करते थे और क़ानूनी मदद भी मुहैया कराते थे। इलाहाबाद में एक लेखिका के घर में केशरीनाथ त्रिपाठी ने ख़ुद कहा था कि उन्होंने कई मौक़ों पर अतीक़ अहमद को मारे जाने से बचाया है।”यह चिंता की बात है कि बीजेपी राज में ऐसी एजेंडा फि़ल्मों की भरमार हो गयी है जो आरएसएस और बीजेपी द्वारा व्हाट्सऐप में प्रचारित सामग्री को आधार मानकर कहानी बुनती हैं। नफऱत और ध्रुवीकरण के लिए यह फि़ल्मों का वैसा ही प्रयोग है जैसा कभी हिटलर ने यहूदियों और अपने विरोधी दलों को निशाना बनाने के लिए किया था। लेकिन धुरंधर एक अलग ही लेवल का फिऩोमिना है। यह फि़ल्म बताती है कि जो बीजेपी के साथ नहीं है, वह देश के ख़िलाफ़ है। सभी विरोधी दल और सरकार से सवाल करने वाले आईएसआई के पैसे पर पल रहे हैं लेकिन मोदी जी इनके इरादों को बार-बार नाकाम करते जाते हैं। विपक्ष की सरकार मतलब पाकिस्तान-परस्त सरकार! फि़ल्म में जो सीधे नहीं कहा जा रहा है, वह यह है- मोदी जी भारत को मिले दैवी वरदान हैं। वे हर सवाल से ऊपर हैं। क्या ज़रूरत है चुनाव की। मोदी जी को अनंत काल तक भारत के प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त कर देना चाहिए! लोकतंत्र? यह क्या बकवास है?