युवक क्या कर सकते हैं, यह समझिये

युवक क्या कर सकते हैं, यह समझिये
March 30 19:03 2026

हरिशंकर परसाई
युवक पहले स्वयं शिक्षित हों फिर लोगों को शिक्षित करें । शिक्षा से मतलब उस शिक्षा से नहीं है जो दी जा रही है । सही शिक्षा । इतिहास की सही समझ होनी चाहियें। मध्ययुग के इतिहास की गलत समझ सांप्रदायिक द्वेष का मूल कारण है । यह इतिहास मुझे भी गलत पढ़ाया गया था और आप युवकों को भी गलत पढ़ाया जाता है। मुसलमान भारत में लूटपाट करने या राज्य जीतने के लिए आते थे । इस्लाम का नाम वे उत्तेजित करने के लिए लेते थे । मेहमूद नवी सोमनाथ का खजाना लूटने आया था, इस्लाम के लिए नहीं। उसकी सेना में हिन्दू बहुत थे। रास्ता बतलाने वाले भी हिन्दू थे। जितने हमलावर आये, उन सबकी सेना में बहुत से सिपाही भारत में भर्ती होते थे। सिपाही अच्छी नौकरी करना चाहते थे, चाहे वह हिन्दू राजा की हो या मुसलमान राजा की । शिवाजी के सेनाध्यक्ष मुसलमान थे और प्रतापसिंह के हिन्दू । अकबर के सेनापति मानसिंह थे और औरंगजेब के सेनापति जयसिंह। बाबर की पानीपत में लड़ाई इब्राहिम लोदी से हुई जो मुसलमान था । राज्य और पैसे के मामले में ना मुस्लिम-मुस्लिम भाई-भाई थे, ना हिन्दू-हिन्दू भाई-भाई। औरंगजेब की ज्यादा लड़ाई मुसलमानों से हुई थी ।

पहले जो आये वे लुटेरे थे । मुगल यहाँ रहने आये थे। बाबर लौटकर वतन नहीं गया। मुगल लोगों की सभ्यता और संस्कृति उन्नत थी । इन्हें शकों और हूणों जैसी बर्बर जातियों की तरह भारतीय समाज पचा नहीं सकता था । ये ताजमहल बनाने वाले लोग थे। इनके साथ संस्कृति का समन्वय ही हो सकता था और वह हुआ । हिन्दू से मुसलमान तलवार की धार से नहीं बने। कारीगर मुसलमान बने और नीची जाति के लोग स्वेच्छा से बने । वे हिन्दू समाज में अछूत थे, अपमानित होते थे और अत्याचार के शिकार थे । उन्हें इस्लाम में बराबरी का दर्जा मिला । बहुदेववाद से छूटकर एकेश्वरवाद मिला। मंदिर लूटने का मुहकमा मुसलमान राजाओं के यहाँ नहीं था। हिन्दू राजाओं के शासन में बाकायदा मंदिर लूटने का मुहकमा था। यह रिकॉर्ड है । मंदिर धर्म के कारण नहीं, धन के कारण लूटे जाते थे। सबसे ज्यादा मंदिर राजा हर्ष ने लूटे। मुसलमान राजा भी मंदिर धन के लिए ही लूटते थे पर औरंगजेब काशी के विश्वनाथ मंदिर तथा उज्जैन के महाकाल मंदिर को धन देता था ।

मध्ययुग के काव्य में कहीं हिन्दू-मुस्लिम द्वेष नहीं है, समन्वय है । मुसलमान कवियों ने कृष्ण पर काव्य लिखा है । कबीरदास ने हिन्दू-मुसलमान दोनों को ही पाखण्ड के लिए लताड़ा है पर यह नहीं कहा कि तुम भाई-भाई हो और आपस में मत लड़ो। इसकी जरुरत ही नहीं थी। विस्तार से लिखा नहीं जा सकता । मेरा मतलब इतिहास को ठीक से पढ़े, समझें । जाति प्रथा खत्म करें । मंदिर और मस्जिद के लिए न लड़े । सांप्रदायिक राजनीति के चक्कर में ना आएँ । द्वेष को खत्म करें । युवक जनता को शिक्षित करें ।

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