आनन्द स्वरूप वर्मा (हिंदी पत्रकारिता : संदर्भ प्रभाष जोशी) बाबा नागार्जुन सहित जिन लोगों को यह भ्रम है कि Jansatta ने वैज्ञानिक सामाजिक सोच को आगे बढ़ाया है’, उन्होंने या तो ‘जनसत्ता’ को ठीक से पढ़ा नहीं, प्रभाष जोशी और बनवारी के लेखों पर ध्यान नहीं दिया या उस अखबार में कार्यरत आलोक तोमर, राकेश कोहरवाल, महादेव चौहान, कुमार आनंद, राजेश जोशी आदि जैसे तेज तर्रार युवा रिपोर्टरों की रिपोर्टों के आधार पर अनुमान लगा लिया कि अखबार और संपादकों की विचारधारा भी प्रगतिशील होगी। इन लोगों को यह जान कर हैरानी होगी कि प्रभाष जोशी, बनवारी, और किसी ज्योतिर्मय आदि के नाम से समय-समय पर प्रकाशित लेखों में पाठकों को बताया जाता रहा है कि नवरात्रि पर व्रत रखने से क्या लाभ होते हैं, पिंडदान करने से किस तरह पितर तृप्त होते हैं, सूर्यग्रहण पर दान करने से मनुष्य का इहलोक और परलोक कैसे सुधरता है, श्री गणेशाय नम: के जाप के साथ काम शुरू करने से सारे विघ्न दूर हो जाते हैं तथा सती प्रथा और नरबलि जी हाँ, ध्यान दें नर बलि-को बर्बर मानने वाले पश्चिमी तौर तरीकों और आधुनिक अँग्रेजी शिक्षा में रंगे लोग हैं।
1986 में इंदौर से बुरहानपुर जाते हुए प्रभाष जोशी को जगह-जगह दुर्गोत्सव के लिए मंडप बनते दिखायी देते हैं और उन्हें भारतीय नारी के देवी रूप और नवरात्रि के महात्म्य की याद आ जाती है। वह पाठकों को बताते हैं कि “नवरात्रि के नवों दिन नियम ध्यान से रहा जाता है जैसे सब लोगों को देवी आ जाती हैं। और देवी आने का मतलब है कि व्यक्ति, परिवार और समाज शरीरातीत हो गया है। दुर्गा पूजा के दिनों में किसी बंगाली को माँ कहते हुए देखो तो साफ लगता है कि उसे देवी चढ़ गयी हैं। किसी गुजराती को गरबा करते हुए देखो तो भी लगता है कि किसी दिव्य शक्ति ने उसे ले लिया है” (या देवी सर्वभूतेषु, प्रभाष जोशी, 10 अक्टूबर, 1986)। इसके बाद लगभग एक हजार शब्दों में जोशी जी ने भारतीय समाज में देवी के स्थान को रेखांकित करते हुए भारतीय नारी की शक्ति का वर्णन किया है और पाठकों के मन में अपने प्रगतिशील होने का भ्रम पैदा किया है लेकिन निष्कर्ष रूप में प्रस्तुत लेख की अंतिम पंक्तियां इस भ्रम को तोड़ देती हैं- “नवरात्रि पर दुर्गा सप्तशती का पाठ करते या सुनते हुए अगर आप अपने भयों, कुंठाओं और विकृतियों के बारे में सोच सकें और उनसे मुक्त हो सकें तो आपके घर से लेकर देशभर में ऐसी ऊर्जा प्रकट होगी जो जीवन को दिव्य बना सकती है। मुझे नवरात्रि का उत्सव इसीलिए एक तरह की आंतरिक स्वाधीनता का उत्सव लगता है। दुख यही है कि बहुत साल जी लेने के बाद इस नवरात्रि में इस स्वाधीनता का बोध हुआ।” हमें भी दुख है कि जोशी जी को इतनी देर में यह बोध हो सका-पहले हो गया होता तो वह किसी मंदिर या मठ में पंडा से लेकर धर्माचार्य तक कुछ भी होते और हिंदी पत्रकारिता उनकी कृपादृष्टि से बच जाती।
इसी क्रम में एक और लेख देखिए जिसे बनवारी ने लिखा है। बनवारी को पश्चिमी सभ्यता का ‘फोबिया’ है। पुरातनपंथी, रूढि़वादी और कट्टर धर्मांधता से ग्रस्त बनवारी को लगता है कि पश्चिमी सभ्यता और आधुनिकता ने भारत की परंपराओं और रीति-रिवाजों को छिन्न भिन्न कर दिया है। रीतियों और कुरीतियों में फर्क किये बिना उन्हें भारत की हर परंपरा प्यारी है और जो भी इसका विरोध करता है उसे वह पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित कहने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।
अपने लेख ‘श्री गणेशाय नम:’ में गणेश जी की महिमा का वर्णन शुरू करने से पूर्व उन्होंने यूरोप के लोगों के एकांगी चिंतन को कोसा है और कार्ल माक्र्स की इस बात के लिए भत्र्सना की है कि उन्होंने श्री हनुमान का मजाक उड़ाते हुए भारतीयों को वानर देव की पूजा करने वाला कहा था। इसके बाद ‘श्री गणेश’ की महिमा का वर्णन करते हुए वह लिखते हैं कि “श्री गणेश को विघ्न विनाशक माना जाता है इसलिए ऐसा कोई काम नहीं है जिसे उन्हें याद किये बिना शुरू किया जा सकता हो… पौराणिक कथा के अनुसार श्री गणेश जी की दो पत्नियाँ हैं-ऋद्धि और सिद्धि। ऋद्धि का मतलब होता है गति। लेकिन गति अपने आप में पर्याप्त नहीं है। उसका कल्याणकारी होना भी जरूरी है। तभी वह सार्थक हो सकती है। सिद्धि का मतलब है जो उसे सार्थक बनाये। श्री गणेश जी की इन दोनों पौराणिक पत्नियों का हमारे इहलौकिक लक्ष्य तय करने में बुनियादी महत्व रहा है” (‘श्री गणेशाय नम:’, बनवारी, 28 अगस्त, 1987)। इस लेख की अंतिम पंक्तियाँ हैं- “हमने अपनी प्राकृतिक संपन्नता नष्ट कर दी है, एक दूसरे के सुख-दुख को समझने और उसी के अनुसार अपने इहलौकिक लक्ष्य तय करने की सामथ्र्य खो दी है। यह विकास हमारे रास्ते की बाधा ही है, हमारे कल्याण में विघ्न ही है। इसको दूर करने के लिए हमें श्री गणेश जी की शरण में जाना पड़ेगा। श्री गणेशाय नम:।”
बनवारी प्राय: गाय को गऊ माता कहते हैं लेकिन इससे हमें एतराज नहीं होना चाहिए-यह तो अपनी-अपनी श्रद्धा की बात है। भारत के लिए गाय जैसे उपयोगी जानवर को कोई माता कह रहा हो तो यह गाय को सम्मान ही देना है। एतराज तब होता है जब वह इस भू-खंड पर रहने वाले हर व्यक्ति को हिंदू मानने लगते हैं। भूतपूर्व राष्ट्रपति जैल सिंह की मथुरा यात्रा पर लिखी उनकी टिप्पणी पर ध्यान दें-“राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह आज मथुरा में जन्माष्टमी मना रहे हैं। हमारे सामाजिक और धार्मिक उत्सवों से जुडऩे वाले पहले राष्ट्राध्यक्ष तो वे हैं ही, उन्होंने हमारी परंपरा और तत्व चिंतन को भी अच्छी तरह आत्मसात किया है… पिछले सप्ताह उन्होंने पशु चिकित्सकों के सम्मेलन में गऊ माता के बारे में जो कहा था वह किसी दूसरे राष्ट्रीय कर्णधार से सुनने को नहीं मिल सकता। इससे पहले मास्टर तारा सिंह के स्मृति समारोह में उन्होंने कहा था कि देश में फैले सभी धर्मों और मतों की मां सनातन धर्म है इसलिए उनमें कोई भेद या टकराव देखना सही नहीं है। इसी भाषण में उन्होंने यह भी कहा था कि देश में रहने वाला हर व्यक्ति हिंदू है क्योंकि हिंदू कहे जाने पर किसी का धर्म या पूजा पद्धति बदल नहीं जाती। इसका मतलब तो इस भू-खंड में रहने वाले उन सब लोगों की तरफ इशारा करना है जो कि यहाँ की सनातन परंपरा को आत्मसात किये हुए हैं। इसलिए हिंदू कहे जाने पर हमें गर्व होना चाहिए… ज्ञानी जैल सिंह या उन्हीं के रुतबे का कोई नेता हमारी आस्था के इन सभी केंद्रों का जीवन उन्हें लौटाने की प्रतिज्ञा कर ले तो देश में आज जो थकावट और विचारहीनता दिखायी दे रही है, शायद उससे कुछ पार पाया जा सके” (‘हमें अपनी आस्था की तरफ लौटना है’, बनवारी, 27 अगस्त, 1986)।
बनवारी वर्णाश्रम व्यवस्था को भी आदर्श मानते हैं हालाँकि यह कहते हैं कि कोई भी व्यवस्था तुलनात्मक तरीके से ही बेहतर हो सकती है. आदर्श नहीं हो सकती। उनका मानना है कि वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था में जरूरत के मुताबिक संशोधन कर दिये जाएं या उनके उददेश्यों को पूरा करने वाली नयी संस्थाएँ खड़ी की जाएं। लेकिन यह काम अपनी सभ्यता में आस्था रख कर ही हो सकता है, अनास्था रख कर नहीं (वणाश्रम व्यवस्था के मायने, बनवारी, 25 अक्टूबर, 1986)।