फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) गोयबल्स के सिद्धांत-एक झूठ को 100 बार बोलने से वह सच बन जाता है-पर चलने वाली संघी भाजपाई सरकार के मंत्री कृष्णपाल गूजर तथा हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री खट्टर बीते आठ साल से जनता को बहका रहे हैं कि मेट्रो रेल का विस्तार बल्लबगढ़ से पलवल तक कर दिया जाएगा। दावा तो गुडग़ांव तक का भी था, लेकिन उसे दोहराना अब बंद कर दिया है। ‘मज़दूर मोर्चा’ पहले दिन से ही यह लिखता आ रहा है कि दोनों दावें झूठे व खोखले हैं। इसके बावजूद गोयबल्स के सिद्धांत को मानने वाले भाजपाई मंत्री पलवल तक की मेट्रो चलाने से बाज नहीं आ रहे। उनमें इतनी समझ नहीं कि गोयबल्स का उक्त सिद्धांत धरती पर रेल नहीं चला सकता। इस सम्बन्ध में मंत्री कृष्णपाल ने बीते सोमवार को ही कहा था कि इसी वर्ष में इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू हो जाएगा। उक्त घोषणा सुनकर इस संवाददाता के कान भी खड़े हो गए और उन्होंने तुरन्त डीएमआरसी (दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन) के लोक सम्पर्क अधिकारी हिमांशु को फोन लगाया उन्होंने स्पष्ट कहा कि कॉर्पोरेशन में इस तरह का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। बेहतर होगा इस बाबत ‘हूडा’ से बातचीत करें। इससे उनका तात्पर्य यही था कि इस तरह का कोई प्रोजेक्ट है भी तो वह ‘हूडा’ के पास होगा जिसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं है। सर्वविदित है कि ‘हूडा’ का मेट्रो रेल चलाने से कतई कोई तालुक नहीं हो सकता।
लेकिन कृष्णपाल हो या खट्टर उन्हें रेल चलाने से कोई मतलब नहीं है, उनका उद्देश्य तो केवल जनता को मूर्ख बनाए रख कर लुभावने सपने दिखाना है। सपनों के सच होने की कोई गारंटी देना वे अपना दायित्व नहीं समझते। वे तो बस एक बार कह कर निकल लेते हैं और भांड मीडिया उसे गाने-बजाने में जुट जाता है। वैसे जनता की कोई विशेष रुचि पलवल तक मेट्रो चलाने में है भी नहंी क्योंकि यह बहुत महंगी सवारी है। यदि इसे चला भी दिया जाय तो यह खाली ही चलेगी। जनता की रुचि हमेशा सस्ते से सस्ती सवारी पाने में रहती है। सबसे सस्ती सवारी रेलवे की ट्रेन सेवा है। इसमें दिल्ली से पलवल तक मात्र 20-25 रुपए ही लगते हैं और मासिक पास बनवाया जाय तो मात्र 200 रुपए से कम में भी काम चल जाता है, जिसके बल पर पूरा महीना सारा दिन ट्रेन में आवागमन करते रहें तो भी यह खत्म नहीं होता। इसके विपरीत मेट्रो रेल बल्लबगढ़ से दिल्ली तक एक बार में ही 50-60 रुपये भी लग जाते हैें।
ये मेट्रो तो केवल इसलिए चल पा रही है कि मोदी सरकार ने रेलवे की शटल सेवा की कमर तोड़ रखी है। कोरोना से पहले जितनी शटल सेवा थी उससे करीब आधी सेवा अब बची है। यदि इसी शटल सेवा को 20 मिनट की फ्रिकेंसी पर मुंबई स्टाइल में चलाया जाय तो मेट्रो रेल की दुकानदारी बंद नहीं तो आधी जरूर हो जाएगी। इन हालात में जनता को अंधभक्ति छोड़ कर भाजपाई नेताओं को कहना चाहिए कि उन्हें मेट्रो रेल नहीं रेलवे की बेहतर शटल सेवा चाहिए।