मज़दूर मोर्चा ब्यूरो शिक्षा तथा स्वास्थ्य दो ऐसे विषय हैं जो सरकार की उपेक्षा का अधिकतम शिकार होते हैं, जबकि यही दो विषय किसी कल्याणकारी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए । हरियाणा सरकार द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2024-25 का स्वास्थ्य बजट करीब आठ हजार करोड़ रुपए बताया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस बजट का 70 प्रतिशत केवल वेतन एवं भत्तों आदि पर खर्च होता है। केन्द्र सरकार ने इसका संज्ञान लेते हुए हरियाणा सरकार का इस ओर ध्यान आकृष्ट किया है। कायदे से, वेतन पर 25 प्रतिशत खर्च होना चाहिए। लेकिन इसका यह अर्थ कदाचित नहीं है कि वेतनभोगी तमाम डॉक्टरों व कर्मचारियों को हटा कर यह खर्च घटाया जाय। इसका असल मकसद यह है कि अस्पतालों व स्वास्थ्य केन्द्रों में इस्तेमाल होने वाली दवाओं एवं अन्य साजो-सामान उपलब्ध कराने पर खर्च बढाया जाना चाहिए। सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार विभाग में कार्यरत डॉक्टरों व अन्य कर्मचारियों की विस्तृत सूची नीचे दी जा रही है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि वेतन आदि पर 70 प्रतिशत खर्च किए जाने के बावजूद बड़ी संख्या में स्वीकृत पद खाली पड़े हैं। यदि ये तमाम पद भी भर दिए जाएं तो इस मद पर 70 के बजाय बजट का 85 प्रतिशत खर्च हो जाएगा। केन्द्र सरकार के नोटिस का असल मकसद, यदि ध्यान से समझा जाय तो बजट को आठ हजार से बढ़ाया जाय। बेशक बढ़ाने का कोई आंकड़ा तो दिया नहीं गया लेकिन समझा जा सकता है कि इसे कम से कम दो गुना तो किया जाना ही चाहिए।
विदित है कि स्वास्थ्य सेवा मुख्यत: राज्य की सूची में आती है। लेकिन राज्यों के पास धन की कमी के चलते केन्द्र सरकार भी इस सेवा में भाग लेती है। परन्तु दोनों की ही नीयत में खोट होने के चलते जनता को मिलने वाली सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का बेड़ा गर्क हुआ पड़ा है। किसी भी सरकारी अस्पताल एवं स्वास्थ्य केन्द्र में न तो पर्याप्त डॉक्टर एवं स्टाफ है और न ही आवश्यक दवाएं व साजो-सामान हैं। ऐसे में केवल वही गरीब-गुरबा मरीज इन अस्पतालों में पहुंचता है जिसके पास कहीं और जाने का विकल्प नही है। इन हालात में अधिकांश मरीज स्वास्थ्य लाभ से वंचित रहने के चलते अकाल मृत्यु को प्राप्त होते हैं। राज्य सरकार तो धनाभाव का बहाना लगा कर स्वास्थ्य सेवाओं को संकुचित करती जा रही है। दूसरी ओर ईएसआई कॉर्पोरेशन के जहां मजदूरों से वसूले गए धन का अम्बार लगा पड़ा है वहां भी सरकार चिकित्सा सेवाएं देने में घातक कोताही बरत रही है। कुल मिलाकर यही समझा जा सकता है कि सरकार की नीयत ही नही है गरीबों को चिकित्सा सेवाएं देने की। जनता से वसूले गए धन को विकास के नाम पर घोटालों के जरिए हड़पना ही राजनेताओं का एक मात्र उद्देश्य रह गया है।