पत्रकारिता का अंधा युग-6

पत्रकारिता का अंधा युग-6
February 12 12:37 2026

आनन्द स्वरूप वर्मा
11 मई, 1999 को पोकरण परमाणु परीक्षण के एक वर्ष पूरा होने के अवसर पर समाचार एजेंसी ‘वार्ता’ ने एक रिपोर्ट जारी की जिसका शीर्षक था ‘परमाणु परीक्षण ने पोकरण की काया ही पलट दी। यह रिपोर्ट विस्तार के साथ ‘जनसत्ता’ ( 11 मई, 1999) में प्रकाशित हुई। इस रिपोर्ट में बताया गया था कि ‘परमाणु विस्फोट के एक साल बाद पोकरण और खेतोलाई गाँव अकाल की छाया से निकल आए हैं। यहाँ रिकॉर्ड बारिश हो रही है। यहाँ लगभग 100 किलोमीटर के क्षेत्र में बंजर भूमि हरी-भरी हो गयी है।’ कुछ ‘सूत्रों’ के हवाले से इस इलाके की खुशहाली का वर्णन किया गया था। इस वर्णन में इसे भी विकास के रूप में चित्रित किया गया था कि निर्माण विभाग ने यहाँ एक मील का पत्थर लगाया है जिस पर पोकरण नाम लिखा नजर आता है।’

इसी दिन और अखबारों में पोकरण का जो विवरण प्रकाशित हुआ था उसमें एक अलग तस्वीर ही नजर आती थी। इन रिपोर्टों में बताया गया था कि ‘विस्फोट के बाद से ही लोगों की आँखों में काफी तकलीफ है, नाक से खून बह रहा है, कुछ को चमड़ी के रोग हो गये हैं और कइयों ने गुर्दे और दिल की बीमारी की शिकायत की है। विस्फोट का सबसे ज्यादा असर यहाँ की गायों पर पड़ा। कई गायों के थन में से दूध की बजाय खून की बूँदे निकली और कुछ तो अंधी भी हो गयीं।’ यह ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के संवाददाता की रिपोर्ट का अंश था।

राजेश सिन्हा ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में लिखा कि अकेले अप्रैल माह में चार लोगों की कैंसर से मौतें हुई हैं और कई लोग कैंसर से पीडि़त हैं।’ अन्य अखबारों में भी ऐसी ही रिपोर्ट देखने को मिली लेकिन ‘वार्ता’ के संवाददाता को कहाँ से खुशहाली की तस्वीर दिखायी दी यह समझना कठिन है। जाहिर है कि यह एक प्रायोजित रिपोर्ट थी और इसके पीछे वही तत्त्व सक्रिय रहे होंगे जो परमाणु परीक्षण को देश का मस्तक गर्व से ऊँचा उठाने वाला’ मानते रहे हैं। यह तो महज एक छोटा सा उदाहरण है। हर रोज और हर प्रमुख घटना पर आपको कोई न कोई ऐसी रिपोर्ट दिखायी पड़ जाएगी जो गुमराह करती है। पूँजीवाद की मीडिया संबंधी रणनीति में इसे ‘डिसइन्फारमेशन कैंपेन’ कहते हैं। कारगिल युद्ध के समय इस तरह की खबरों की भरमार दिखायी देती थी।

3 जून, 1999 को चंडीगढ़ से प्रकाशित दैनिक ट्रिब्यून’ ने प्रथम पृष्ठ पर एक खबर दी जिसका शीर्षक था ‘घुसपैठियों पर नापास बमों से हमले’ यह समाचार किसी और अखबार में दिखायी नहीं दिया। ‘दैनिक ट्रिब्यून’ ने इस खबर के स्रोत का जिक्र नहीं किया या हालांकि यह महत्त्वपूर्ण खबर थी और इसके साथ यह जानकारी दी जानी चाहिए थी कि यह खबर कहाँ से मिली। अगले दिन 4 जून को ‘जनसत्ता’ ने भारतीय वायुसेना के हवाले से बताया कि यह खबर गलत है। इसी प्रकार मुंबई से प्रकाशित अँग्रेजी दैनिक ‘फ्री प्रेस जर्नल’ ने 14 जून को प्रमुखता के साथ एक खबर प्रकाशित की-गौरी और शाहीन को नियंत्रण रेखा पर तैनात कर दिया गया है। इस खबर का भी कोई स्रोत नहीं दिया गया था। फिर 25 जून को ‘राष्ट्रीय सहारा’ ने सुर्खियों में छापा-‘गुलाम कश्मीर और पंजाब की सीमा पर पाक के परमाणु हथियार तैनात।’ इस खबर का स्रोत क्या है इसकी भी कोई जानकारी नहीं दी गयी।

कारगिल के मामले में मीडिया ने पूरे देश में जिस तरह का युद्धोन्माद फैलाया वह अभूतपूर्व है। इस काम में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया दोनों में होड़ लग गयी थी कि कौन कितना ‘देशभक्त’ है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया निश्चय ही बाजी मार ले गया क्योंकि उसे पहली बार युद्ध के मोर्चे को जीवंत रूप में लोगों के ड्राइंग रूम तक पहुँचाने का अवसर मिला था। यहाँ यह गौर करना काफी दिलचस्प होगा कि उस वर्ष 12 जून तक, जब तक विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता से भारत बाहर नहीं हो गया, मीडिया की सारी देशभक्ति क्रिकेट पर न्यौछावर हो रही थी। यहाँ तक कि 9 जून को पाकिस्तान के मुकाबले भारतीय क्रिकेट टीम की जीत के समाचार को लगभग सारे अखबारों में पहला स्थान मिला जबकि उस दिन बटालिक और द्रास क्षेत्र में घमासान युद्ध चल रहा था। दरअसल क्रिकेट के बहाने तमाम बड़ी कंपनियाँ कारोबार कर रही थीं और इसके लिए विश्वकप को उन्होंने ‘राष्ट्रीय गौरव’ से जोड़ दिया था। 12 जून के बाद क्रिकेट का स्थान कारगिल ने ले लिया और फिर उन्हीं कंपनियों ने, जो कल तक क्रिकेट के जरिये देशभक्ति का स्वाँग कर रही थीं, तुरंत क्रिकेट भरपूर की जगह कारगिल को बैठा दिया और अब कारगिल के नाम पर व्यवसाय होने लगा। इस काम में व्यापारियों को मीडिया से सहयोग मिला। ये खबरें 1999 की हैं।

अब एक दूसरी खबर देखिए जो अप्रैल 2017 की है। इस खबर का संबंध ईवीएम मशीनों से है। 18 अप्रैल, 2017 को सभी अखबारों में और इससे पहले की रात में सभी टीवी चैनलों पर यह खबर दिखायी दी कि ‘चुनाव आयोग ने मई के पहले सप्ताह में ईवीएम को हाईजैक करने की खुली चुनौती दी है।’ किसी अखबार ने लिखा कि चुनाव आयोग ने यह चुनौती अरविंद केजरीवाल को दी है तो किसी ने कहा कि सभी विपक्षी दलों को चुनौती दी गयी है कि वे आएँ और ईवीएम मशीन की गड़बड़ी को साबित करें। बाद में पता चला कि यह खबर प्लांट करायी गयी थी। खबर पीटीआई द्वारा जारी की गयी लेकिन इसमें किसी स्रोत का उल्लेख नहीं था केवल ‘आधिकारिक सूत्रों के हवाले से यह खबर जारी थी। न तो चुनाव आयोग ने इस आशय का कोई प्रेस रिलीज जारी किया और न कोई प्रेस कांफ्रेंस आयोजित किया। जाहिर सी बात है कि ईवीएम मशीन की साख पर जो लोग सवाल उठा रहे थे उनकी आवाज को बेअसर करने के लिए सरकार की ओर से यह खबर प्रचारित करवायी गयी। इसे आप आसानी से डिसइनफॉर्मेशन या मिसइनफॉर्मेशन अभियान का नमूना कह सकते हैं।

इसी तरह 21 अगस्त, 2017 को एबीपी न्यूज ने डोकलाम विवाद पर एक फर्जी रिपोर्ट’ प्रसारित की और एक तथाकथित रक्षा विशेषज्ञ के हवाले से यह बताया कि डोकलाम भारत का हिस्सा था जिसे नेहरू ने चीन को ‘गिफ्ट’ कर दिया। रिपोर्ट के अंत में एंकर ने यह कह कर इस झूठ से अपना पल्ला झाड़ लिया कि ‘चुंबी वैली को चीन को देने की बात कहीं नहीं थी जिससे यह साबित होता है कि चुंबी वैली को लेकर नेहरू पर किया जा रहा दावा ठीक नहीं है।’ बावजूद इसके सामान्य दर्शक के मन में उसने यह धारणा पैदा की कि नेहरू ने चीन की तुष्टिकरण के लिए भारत के खिलाफ काम किया।
जुलाई 2011 में पाकिस्तान की तत्कालीन विदेश मंत्री हिना रब्बानी खर की भारत यात्रा पर हिंदी के समाचार चैनलों ने जिस छिछोरेपन का परिचय दिया वह अत्यंत शर्मनाक है।’ इन चैनलों ने निहायत फूहड़पन के साथ बस हिना रब्बानी की खूबसूरती का वर्णन किया। चैनलों के इस रवैये पर पाकिस्तानी मीडिया ने भी गौर किया। उसने अपनी रिपोर्टिंग में लगभग सभी चैनलों के टुकड़े प्रस्तुत करते हुए इसका मजाक उड़ाया। आश्चर्य की बात है कि यह हलकापन हिंदी के चैनलों पर ही हावी रहा।

एजेंडा सेट करने का काम चैनलों के जरिये कैसे किया जा रहा है इसका जो उदाहरण जेएनयू प्रकरण में ज़ी न्यूज ने पेश किया वह तो अभूतपूर्व है। इसने योजनाबद्ध ढंग से जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को ‘राष्ट्रवाद’ के नाम पर जिस तरह कटघरे में खड़ा किया और एक फर्जी वीडियो के जरिये मीडिया ट्रायल करके ‘देशद्रोही’ साबित किया, उससे एक बेहद खतरनाक प्रवृत्ति की शुरुआत हैं। नरेंद्र मोदी का पहला कार्यकाल पूरी तरह इस फर्जी राष्ट्रवाद के मुद्दे पर केंद्रित रहा। जी न्यूज के ही पत्रकार विश्वदीपक ने इस स्थिति से क्षुब्ध होकर इस्तीफा दे दिया। विश्वदीपक ने अपने इस्तीफे में लिखा- ‘मैं पत्रकार होने के साथ-साथ उसी देश का एक नागरिक भी हूँ जिसके नाम अंधराष्ट्रवाद का जहर फैलाया जा रहा है और इस देश को गृह युद्ध की तरफ धकेला जा रहा है। मेरा नागरिक दायिन्य और पेशेवर जिम्मेदारी कहती है कि मैं इस जहर को फैलने से रोकें। मैं जानता हूँ कि मेरी कोशिश नाव के सहारे समुद्र पार करने जैसी है लेकिन फिर भी मैं शुरुआत करना चाहता हूँ। इसी सोच के तहत जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार के बहाने शुरू किये गये अंधराष्ट्रवादी अभियान और उसे बढ़ाने में हमारी भूमिका के विरोध में मैं अपने पद से इस्तीफा देता हूँ ।’

इसी क्रम में एक अन्य पत्रकार नसीर अहमद का जिक्र प्रासंगिक है जो आइबीएन-7 चैनल के कश्मीर ब्यूरो के प्रमुख थे। उन्हें भी फर्जी राष्ट्रवाद की भेंट चढऩा पड़ा। नसीर अहमद ने आइबीएन-7 में आने से पहले तकरीबन 16 साल का वक्त ब्यूरो प्रमुख के रूप में ज़ी न्यूज में गुजारा था। 29 अगस्त, 2016 को उन्होंने संस्थान से में यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि ‘पत्रकारिता करने की जगह उनके ऊपर फर्जी खबरें चलाने का दबाव संपादकों की ओर से बनाया जा रहा है।’ ‘मीडिया विजिल’ से बातचीत में उन्होंने बताया कि बुरहान वानी की हत्या के बाद उनसे कहा गया था कि वह ऐसी स्टोरी भेजें जिसमें उसकी लड़कियों के साथ तस्वीरें हों और वानी को ऐयाश दिखा कर बदनाम किया जा सके। उन्होंने ऐसा करने से जब इंकार कर दिया तो उनकी जगह जम्मू के रिपोर्टर से यह स्टोरी करवायी गयी। उन्होंने बताया कि उनकी बीट पर जम्मू के रिपोर्टर ने स्टोरी की। ना कोई बाइट, न सुरक्षा बलों से बातचीत, न किसी का वर्जन और स्टोरी चला दी गयी7 चुनाव के दिनों में पेड न्यूज के रूप में प्रायोजित खबरें काफी चर्चा में रह चुकी हैं। पेड न्यूज के खिलाफ जबर्दस्त आवाज भी उठी और भारतीय प्रेस परिषद ने भी इस पर कड़ा रुख अपनाया लेकिन प्रेस परिषद को बगैर दाँत का शेर कहा जाता है क्योंकि इसके पास कोई अधिकार है ही नहीं।

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Mazdoor Morcha
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