आवारा कुत्तों व गौ-वंश को लेकर प्रशासनिक नौटंकी

आवारा कुत्तों व गौ-वंश को लेकर प्रशासनिक नौटंकी
February 11 16:34 2026

फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) सड़कों, गलियों व मुहल्लों में लावारिस एवं आवारा घूमते कुत्तों व गौ-वंशों ने आम जनता का जीना मुहाल कर रखा है। कुत्ता काटने के बढते मामलों का रिकार्ड रखने का वैसे तो कोई तरीका नहीं है, लेकिन सरकारी अस्पतालों में एंटी रेबीज इन्जेक्शन लगवाने के लिए आने वालों की संख्या से काफी कुछ समझा जा सकता है। शहर के बीके अस्पताल में जहां प्रतिवर्ष 10 हजार कुत्ता काटे के मरीज आते थे, अब इनकी संख्या 20 हजार से पार हो चुकी है। सरकारी अस्पलालों में भी यह टीका मुफ्त नहीं लगता।

इसके लिए कम से कम 105 रुपये तो लगते ही हैं, वह भी तब, जब अस्पताल में टीका उपलब्ध हो, नहीं तो बाजार से खरीद कर लाने पर और भी महंगा पड़ता है। यह भी देखने में आया है कि कुत्तों के शिकार आम तौर पर गरीब आदमी या उनके बच्चे ही होते हैं। इनके लिए दिहाड़ी तोड़ कर अस्पताल जाना व टीके पर खर्च करना का$फी भारी पड़ता है। किसी जमाने में नगर पालिका वाले बाकायदा अभियान चला कर आवारा कुत्तों को मार कर आम जनता को इनसे सुरक्षा प्रदान किया करते थे। लेकिन अब कुत्ता प्रेमी बन कर इनके भी अनेकों वकील खड़े हो गए हैं। जो कुत्तों को डंडा मारने पर थाने में मुकदमा दर्ज करा देते हैं। अनेकों कुत्ता प्रेमी अपने घर में कुत्ते न पाल कर गली मुहल्ले में घूमते-फिरते आवारा कुत्तों को खाना खिला कर आते-जाते लोगों के लिए मुसीबत खड़ी करने से गुरेज नहीं करते।

स्थानीय नगर निगम ने भी इन कुत्तों के नियंत्रण के नाम पर फर्जी एनजीओ खड़े करा कर उनको करोड़ों रुपये इस बात के दिए हैं कि इनकी नसबंदी करा कर इनकी संख्या को रोकेंगे। कुछ ने इनके शेल्टर होम के नाम पर भी अच्छी रकम डकारी है। इसी सप्ताह हरियाणा के मुख्य सचिव अनुराग रस्तोगी ने आदेश जारी किया है कि आगामी आठ सप्ताह में उन्हें कोई आवारा कुत्ता सड़क पर नजर नहीं आना चाहिए। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि यदि कोई नजर आ गया तो वे किसका क्या करेंगे? इसी दौरान फरीदाबाद के एडीसी ने कहा कि वे इन कुत्तों का बधियाकरण करा कर उनकी जन्मदर को घटाने में लगे हैं। वास्तव में यह सब फर्जीवाड़ा है आज भी पॉश सेक्टरों में जगह-जगह छोटे-छोटे पिल्ले घूमते दिख जाएंगे जबकि बधियाकरण का यह कार्यक्रम बीते दसियों वर्ष से चल रहा है और करोड़ों रुपये इस पर खर्च हो चुके हैं।

माता कही जाने वाली गाय व सांड हजारों की संख्या में घूमते इस शहर में नजर आते हैं। शहर में लगे हर कूड़े के ढेर पर सैंकड़ों गौ-वंश अपना भोजन ढूंढते मिल जाएंगे। इन आवारा पशुओं से रात के अंधेरे में टकरा कर कई वाहन-चालक भयंकर दुर्घटनाओं के शिकार हो चुके हैं। कई बार सांडों की आपसी लड़ाई के चलते राहगीर उनके लपेटे में आकर अपनी जान से हाथ धो चुके हैं। इस सबके बावजूद प्रशासन के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। जब ज्यादा हो-हल्ला मचता है, गौशालाएं खोलने की बात करते हैं, इसके नाम पर गौ-सेवा आयोग बना कर उसका चेयरमैन कोई श्रवण कुमार गर्ग नियुक्त कर दिया जाता है। उसे तमाम तरह की सरकारी सुविधाओं के साथ-साथ अच्छा-खास बजट भी अलॉट कर दिया जाता है। इस वर्ष का बजट 272….करोड़ रुपये है।

जब-तब खुलने वाली इन गौ-शालाओं के बावजूद आवारा घूमते इन गौ-वंशों की संख्या में कोई कमी नजर नहीं आती। और जो गौ-शालाएं हैं भी, उनके भीतर इनकी दुर्दशा का नक्शा ‘मजदूर मोर्चा’ अनेकों बार प्रकाशित कर चुका है। गौ-शालाओं की यह दुर्दशा न केवल $फरीदाबाद बल्कि करनाल, कुरुक्षेत्र, कैथल, जींद सहित लगभग सभी जिलों में तो है ही राजस्थान व अन्य राज्य भी इससे अछूते नहीं हैं। जाहिर है गौ-शालाओं के नाम पर मिलने वाला बजट चंद सरकारी दल्ले व उनके लगुवे-भगुवे डकार जाते हैं।

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Mazdoor Morcha
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