बाबरी मस्जिद पर राजनाथ सिंह के बयान की संपूर्ण पड़ताल

बाबरी मस्जिद पर राजनाथ सिंह के बयान की संपूर्ण पड़ताल
February 11 13:59 2026

“लाल बहादुर शास्त्री ने अक्षय ब्रह्मचारी से बाबरी मस्जिद के रीस्टोरेशन का वादा किया था जिसे राजनाथ सिंह और दैनिक जागरण ने पंडित नेहरू द्वारा सरकारी ख़र्च से मस्जिद के पुनर्निर्माण में बदल दिया” रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कुछ दिन पहले बयान दिया था कि पंडित नेहरू सरकारी ख़र्च से बाबरी मस्जिद का पुनर्निर्माण कराना चाहते थे। इसके संदर्भ के रूप में उन्होंने सरदार पटेल की पुत्री मणि बहन की डायरी का ज़िक्र किया।

इसके तुरंत बाद कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मणि बहन की गुजराती में लिखी असली डायरी का एक हिस्सा पोस्ट कर बताया कि ऐसी कोई बात नहीं हुई। इसके बाद दैनिक जागरण में अनंत विजय ने एक लेख लिखा था और उसमें उस अंग्रेज़ी डायरी का एक हिस्सा पोस्ट किया जिसकी विश्वसनीयता संदिग्ध है। इस लेख में जागरण ने संदर्भ दिया कि 20 सितंबर 1950 को नेहरूजी और पटेल में यह संवाद हुआ था। जहाँ पटेल ने मस्जिद के लिए सरकारी धन देने से मना कर दिया था। इस कहानी को वैसे तो सिरे से ख़ारिज किया जा सकता है लेकिन इसकी पड़ताल के लिए पंडित नेहरू और सरदार पटेल दोनों की सितंबर 1950 की व्यस्तताओं को ग़ौर से देखने की कोशिश की तो समझ में आया कि दैनिक जागरण या जिसने मनु बहन की डायरी अंग्रेज़ी में परिवर्तित किया है, उसने इतिहास की अलग अलग घटनाओं को आपस में मिला दिया है। पात्रों के नाम बदल दिए हैं और घटनाओं के स्वरूप और परिभाषा तक को अपनी मर्ज़ी के हिसाब से दुर्भावनापूर्ण ढंग से एडजस्ट कर दिया है।
अब आप पूरी सच्चाई सुनिये हुआ यह था कि दिसंबर 1949 में जब अयोध्या कि बाबरी मस्जिद में मूर्तियां रखी गई, तब इसको लेकर पूरे देश में बवाल मचा। उस समय प्रधानमंत्री पंडित नेहरू थे, गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल थे, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत और उत्तर प्रदेश के गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे।

प्रधानमंत्री ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि मस्जिद में रखी गई मूर्तियों को हटा दिया जाए तो लेकिन अयोध्या कि जिला मजिस्ट्रेट नायर ने मूर्तियां हटाने से इनकार कर दिया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने तत्काल इस तरह की कार्रवाई करने पर क़ानून व्यवस्था के लिए बड़ा संकट खड़ा होने की दुहाई देते हुए निर्देश पर अमल नहीं किया। (यह सारा प्रसंग मेरी किताब नर्मदा को सतना विस्तार से मिल जाएगा)

लेकिन अयोध्या में एक व्यक्ति थे अक्षय ब्रह्मचारी। ब्रह्मचारी जी उस समय फ़ैज़ाबाद जिला कांग्रेस के मंत्री थे। वे पक्के गांधीवादी, धर्मनिरपेक्ष और हिंदू मुस्लिम एकता में यक़ीन रखने वाले व्यक्ति थे।
उन्होंने पुरज़ोर तरीक़े से यह माँग उठायी की मस्जिद का पुराना स्वरूप बहाल (restoration) किया जाए। पुराना स्वरूप बहाल करने का अर्थ हुआ कि मूर्तियाँ वहाँ से हटा ली जाए और मूर्तियां रखने के पहले जो स्थिति अयोध्या की थी उसे बहाल किया जाए। इसी रीस्टोरेशन शब्द को मणि बहन की कथित अंग्रेज़ी डायरी में कल्पना के आधार पर रीकंस्ट्रक्शन (पुनर्निर्माण)शब्द बना दिया गया। जबकि सामान्य ज्ञान से भी कोई समझ सकता है जब मस्जिद बनी हुई थी तो उसके पुनर्निर्माण की बात कहाँ से पैदा होती है? अक्षय ब्रह्मचारी ने रीस्टोरेशन के लिए जनवरी 1950 में आमरण उपवास किया। लेकिन पंडित गोविंद बल्लभ पंत और गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री के आश्वासन पर उन्होंने अपना अनशन दो दिन बाद समाप्त कर दिया।

इसके बाद अक्षय ब्रह्मचारी इस बात की प्रतीक्षा करने लगे कि राज्य सरकार जल्द ही यथास्थिति बहाल करने के लिए कोई क़दम उठाएगी। राज्य सरकार ने जब कोई क़दम नहीं उठाया तो ब्रह्मचारी ने शास्त्रीजी, पंत जी और पर दिल्ली जाकर पंडित जवाहरलाल नेहरू से लंबी मुलाक़ात की। जुलाई 1950 में हुई इस मुलाक़ात के बारे में पंडित नेहरू ने पंत और शास्त्री को भी लंबे पत्र लिखकर स्थिति समझायी। इस पूरे घटनाक्रम पर महात्मा गांधी के अनन्य सहयोगी के जी मशरूवाला भी पूरी तरह निगाह रख रहे थे और उन्होंने महात्मा गांधी द्वारा स्थापित अख़बार नवजीवन में इस विषय में कई लेख लिखे। इस बीच ब्रह्मचारी के साथ भीड़ ने बुरा बर्ताव किया। अयोध्या स्थित उनके घर में कई बार तोडफ़ोड़ की गई और उन्हें अयोध्या छोड़कर बाहर निकलना पड़ा। जब सारे प्रयास करने के बावजूद मस्जिद का रीस्टोरेशन नहीं हुआ तो ब्रह्मचारी ने घोषणा की कि वह अगस्त 1950 में लखनऊ में आमरण उपवास करेंगे।

अक्षय ब्रह्मचारी 20 अगस्त उन्हें 1950 को लखनऊ में कांग्रेस कार्यालय के बाहर आमरण उपवास पर बैठ गए। यह अनशन काफ़ी लंबा चला। इसको लेकर विधानसभा में गोविंद वल्लभ पंत की सरकार ने कई बार बयान भी दिया और प्रदेश के गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री भी पूरे मामले के संपर्क में बने रहे। इसी समय कांग्रेस के नए अध्यक्ष का चुनाव होना था और पंडित जवाहरलाल नेहरू अपने पुराने मित्र लेकिन विचारधारा में अलग दिशा पकडऩे वाले पुरुषोत्तम दास टंडन के अध्यक्ष बनाए जाने के खिलाफ़ थे। इस दौरान का पटेल और नेहरू का पूरा पत्राचार देखने पर मुख्य रूप से कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव की चर्चा होती ही दिखाई देती है। दोनों नेताओं ने अलग अलग स्तर पर गोविंद बल्लभ पंत से अयोध्या के बारे में थोड़ी बात ज़रूर की लेकिन आपस में अयोध्या को लेकर उनका कोई पत्राचार नहीं मिलता।

इसी बीच सितम्बर के मध्य में नासिक में कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन में पंडित नेहरू, सरदार पटेल और गोविंद बल्लभ पंत तीनों उपस्थित थे। दैनिक जागरण ने जो लेख लिखा है उसमें दावा किया गया कि 20 सितंबर 1950 को सरदार पटेल ने मस्जिद के पुनर्निर्माण के लिए नेहरू को मना कर दिया। जबकि गुजराती डायरी में यह लिखा है कि बातचीत पंडित नेहरू और सरदार पटेल के बीच नहीं बल्कि पंडित गोविंद बल्लभ पंत और सरदार पटेल के बीच हो रही थी। इस समय के गोविंद बल्लभ पंत रे पत्र पढ़ें तो यह स्पष्ट होता है कि वे ना सिर्फ़ सरदार पटेल से बल्कि उनकी पुत्री मणि बहन से भी बातचीत कर रहे थे।

गुजराती डायरी में जो संवाद है उसमें सरदार पटेल गोविंद बल्लभ पंत से कह रहे हैं कि जो बात आपने विधानसभा में कही है, उसे सार्वजनिक रूप से पर्चा छपवाकर भी लोगों में बटवा दिजीये।
20 सितंबर को जब नासिक में यह बातचीत चल रही है, उसके तुरंत बाद लखनऊ में 22 सितंबर को मशरूवाला और विनोबा भावे 32 दिन से चल रहे हैं अक्षय ब्रह्मचारी के अनशन को तुड़वाते हैं।अक्षय ब्रह्मचारी ने बाद में बताया कि उन्हें लाल बहादुर शास्त्री ने स्पष्ट आश्वासन दिया था कि वह मस्जिद का रीस्टोरेशन कराएंगे। इसलिए ब्रह्मचारी जी अपना अनशन तोड़ दें। तो इस तरह लाल बहादुर शास्त्री ने मस्जिद के रीस्टोरेशन का जो वादा 22 सितंबर को अक्षय ब्रह्मचारी से किया था, उसे पत्रकारिता के नए युग में पंडित नेहरू द्वारा सरकारी पैसे से मस्जिद के पुनर्निर्माण की बात में तब्दील कर दिया गया। और दैनिक जागरण ने अपने आलेख का शीर्षक दे दिया “नेहरू का बाबर पर प्रेम।” तथ्यों से ऐसी भयानक,मनमानी और षड्यंत्र पूर्ण छेडख़ानी बताती है कि पत्रकारिता कैसे खुदकुशी कर रही है।
-साइबर नजर

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Mazdoor Morcha
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