नंगई पर उतर आया ईएसआई कॉर्पोरेशन

नंगई पर उतर आया ईएसआई कॉर्पोरेशन
October 25 05:20 2025

मरीजों का खाना बंद, डायलिसिस में इंजेक्शन बंद, विशेषज्ञ डॉक्टर भगा दिए
फरीदाबाद (मज़दूर मेार्चा) मज़दूरों के वेतन से हर माह चार प्रतिशत वसूली करके अपने खजाने में 1 लाख 80 हजार करोड़ भर लेने के बाद ईएसआई कार्पोरेशन इलाज के नाम पर उन्हें भटका रहा है। एनएच तीन स्थित मेडिकल कॉलेज अस्पताल में जहां कैंसर मरीजों का बीएमटी (बोन मैरो ट्रासप्लांटेशन) होता था, कॉर्डियोलॉजी में मरीजों को पेसमेकर व हृदय के वाल्व लगाने तथा एंजिओग्राफी व एंजिओप्लास्टी आदि करने की सुविधा उपलब्ध थी, वह सब एक झटके में समाप्त कर दी गई है। कॉर्डियो विभाग के दो स्पेशलिस्ट डॉक्टरों को यहां से हटा दिया गया है। रेगुलर डॉक्टर अरविंद को खाली बैठने के लिए बसई दारापुर भेज दिया गया है, जहां न तो कैथलैब है और न ही अन्य आवश्यक उपकरण आदि। किडनी ट्रांसप्लांट करने वाले इस अस्पताल में अब नेफ्रोलॉजी (किडनी रोग सम्बन्धी) डॉक्टरों को भगा दिया गया है। मात्र एक अंशकालिक डॉक्टर हैं जो सप्ताह में चार दिन केवल दो-तीन घंटे के लिए आते हैं और केवल 25 मरीज़ देख कर निकल लेते हैं। जबकि मरीज हमेशा 200 से अधिक रहते हैं।

कैंसर मरीजों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर यहां पैटस्कैन व रेडियोथेरेपी सिस्टम लगाने की योजना के साथ-साथ बेड संख्या बढ़ाने की भी तैयारी चल रही थी। इसके विपरीत अब उक्त मशीनें लगा कर बेड संख्या बढ़ाना तो दूर मौजूदा कैंसर विशेषज्ञों को भी भगा दिया गया है। इसका कारण यह समझा जा रहा है कि कैंसर के इलाज में लगने वाली दवाइयां बहुत महंगी है। कॉर्पोरेशन के लिए मरीजों की जान इतनी कीमती नहीं है जो उन पर इतना भारी-भरकम खर्च किया जाए, आखिर वह 10-20 हजार कमाने वाला मज़दूर ही तो है। और तो और जिन मरीजों को मल-मूत्र त्यागने के लिए कोल्तोमी बैग अस्पताल से मिलते थे वो भी बंद हो गए हैं। ये बैग की कीमत मात्र 60-70 होती है, मरीज को ही वहन करनी पड़ रही है। किडनी मरीजों को डायलिसिस के दौरान कुछ आवश्यक टीके भी लगाए जाते थे इनका खर्च बचाने के लिए अस्पताल वाले कहते हैं कि बाजार से खरीद लाओ तो लगा देंगे।

यह बेशर्मी की इन्तेहा नहीं तो और क्या है? जिस कॉर्पोरेशन ने एडवांस पैसा लेकर चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराने का समझौता किया था वह अब उससे मुकर कर मरीजों को बाजार से दवा खरीदने को कह रहा है। डायलिसिस मशीनों और स्टाफ की कमी के चलते कुछ मरीजों को निजी अस्पतालों में रेफर किया जाता है तो कुछ को इधर-उधर भटका दिया जाता है। बसई दारापुर में मशीनें व स्टाफ पर्याप्त मात्रा में होने के बावजूद वहां के मरीजों को फरीदाबाद धकेल कर यहां भीड़ बढ़ा दी जाती है। जबकि होना तो यह चाहिए था कि गाजियाबाद, नोएडा, ओखला आदि तमाम अस्पतालों के मरीजों को बसई दारापुर का मेडिकल कॉलेज अस्पताल खुद सम्भालता। दिल्ली के अलावा यहां गुडग़ांव, मानेसर तक के मरीज रेफर होकर आते हैं। जाहिर है ऐसे में यहां भीड़ तो बढ़ेगी ही। मज़दूरों के वेतन से नियमित वसूली करके अब कॉर्पोरेशन उन मज़दूरों से ऐसा व्यवहार कर रहा है जैसे कि उसका दिवाला निकल चुका हो। अभी तक एक दिन के लिए भर्ती होने वाले मरीजों को भोजन दिया जाता था वो भी बंद कर दिया गया। इसे बंद करने के लिए कॉर्पोरेशन ने बाकायदा नोटिस लगा दिया है। जो इस प्रकार है।

गौरतलब है कि इस नोटिस के नीचे प्रशासन मरीजों से सहयोग भी मांग रहा है। मरीज पहले इस कॉर्पोरेशन को अपने वेतन से पैसा देवे फिर टीके बाजार से खरीद कर लावे, भर्ती के दौरान खाना अपने पल्ले से खाए उसके बाद इन बेशर्मों को सहयोग अलग से देवे। इतना ही नहीं डॉक्टरों द्वारा लिखी उचित दवाएं भी अब काउंटरों पर उपलब्ध नहीं होती। लोकल परचेज को तो लगभग समाप्त ही किया जा रहा है और रेट कॉन्टै्रक्ट (आरसी) में आने वाली दवाएं भी अत्यधिक सीमित मात्रा में आ रही हैं। समझा जाता है कि डॉक्टरों को भी मौखिक हिदायत दी जा रही है कि वे वही दवाएं लिखें जो उपलब्ध हैं, बीमारी ठीक हो या न हो। ठीक न होने पर मरीज स्वत: कहीं न कहीं और इलाज कराने चला जाएगा।

मरीज एक और सहयोग बिना मांगे प्रशासन को दे रहे हैं कि वे बेड पर बिछाने के लिए चादर व ओढऩे के लिए कम्बल घर से लेकर आते हैं। लगता है कि अभी तक अस्पताल की जो लॉन्ड्री बढिय़ा से धुलाई का काम करती थी उसने काम या तो बंद कर दिया है या बहुत धीमा कर दिया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार लॉन्ड्री व किचन में जो रेगुलर स्टाफ होता था उसकी स्वीकृत पोस्टें समाप्त कर दी गई हैं। योजना यह बनाई हुई है कि ये दोनों काम ठेके पर दिए जाएंगे। बीते दो-तीन साल से फाइलों में दबी यह योजना न तो लागू हो पाई है और न ही समाप्त हो पाई है। ऐसे में इन दोनों ब्रांचों में काम करने वाला स्टाफ न तो गिनती में पूरा है और न ही अपने काम के प्रति सहज है। विशेषज्ञ महंगे डॉक्टरों को भगाने के बाद कॉर्पोरेशन ने 55 साधारण एमबीबीएस डॉक्टरों के पद विज्ञाप्ति किए हैं। समझा जाता है कि मरीजों को बेवकूफ बनाने के लिए विशेषज्ञों की सीटों पर इन साधारण नौसिखिए डॉक्टरों को बैठा दिया जाएगा। ये डॉक्टर कुछ भी उल्टा-सीधा लिख कर कुछ दिन मरीज को भटकाते रहेंगे, ठीक न होने पर मरीज़ स्वत: ही कहीं और इलाज कराने पहुंच जाएगा। हां, कुछ जागरूक मरीज अवश्य ही सही व पूरा इलाज कराने का दबाव बनाएंगे। ऐसे लोगों को सरकारी अस्पतालों यानी कि दिल्ली के एम्स व सफदरजंग आदि अस्पतालों की ओर खदेड़ कर पल्ला झाड़ लिया जाएगा। ऐसे मरीजों को यह भी बताया जाएगा कि कॉर्पोरेशन इन अस्पतालों के साथ कैशलेस इलाज का समझौता करने जा रहा है।

विदित है कि इन अस्पतालों में पर्ची बनवाना कोई आसान काम नहीं है। घंटों लाइन में लगकर ही कोई अपनी पर्ची बनवा सकता है। उसके बाद डॉक्टर जो दवाइयां लिखेगा वे मरीज़ को बाजार से खरीदनी होगी। प्रत्येक टेस्ट एवं ऑपरेशन आदि के लिए भी एक तयशुदा फीस भी मरीज को जमा करानी होती है। सवाल यह पैदा होता है कि जब यह सारी मुसीबतें एवं खर्चें ही झेलने हैं तो कॉर्पोरेशन उससे हर महीने किस बात की वसूली करता है? इसी के जवाब में कॉर्पोरेशन वाले बीते कई वर्षों से लफ्फाजी करते आ रहे हैं कि वे इन अस्पतालों से कैशलेस एवं विशेष सुविधा का अनुबंध करने जा रहे हैं। वास्तव में ऐसा कोई भी अनुबंध न तो होने वाला है और यदि कागजों में हो भी गया तो धरातल पर लागू होना असम्भव है क्योंकि वे अस्पताल कॉर्पोरेशन के आदेश मानने को बाध्य नहीं है और इन अस्पतालों में सभी तरह के आवश्यक सामान खरीदने की कोई व्यवस्था नहीं है।

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Mazdoor Morcha
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