फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) काम नहीं काम का ढिंढोरा पीट कर नाम कमाने की रणनीति वाली भाजपा डबल इंजन सरकारों के अधिकारी भी घोषणावीर बन चुके हैं। सीएमओ डॉ. जयंत आहूजा ने सेक्टर 56 में साठ बेड का अस्पताल बनाए जाने का प्रस्ताव बना कर महानिदेशक स्वास्थ्य सेवाएं को भेजा है। डॉ. आहूजा के अनुसार उन्होंने यह प्रस्ताव मुख्यमंत्री नायब सैनी द्वारा चार मई को एनआईटी विधानसभा क्षेत्र में हुई रैली में सेक्टर 56 में अस्पताल बनाने की घोषणा के मद्देनजर तैयार किया है। बीते ग्यारह साल से मोदी-खट्टर-सैनी की घोषणावीर सरकारों की कथनी करनी में अंतर वाली कार्यशैली पर नजर रखने वालों को इस प्रस्ताव में कुछ खास नजर नहीं आ रहा। इन लोगों का कहना है कि शहर में पांच शहरी स्वास्थ्य केंद्र, चार सामुदायिक स्वाथ्य केंद्र, 14 शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और दस प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं। इनके अलावा 60 उप स्वास्थ्य केंद्र हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तीस बेड के छोटे अस्पताल होते हैं, इनमें प्राथमिक चिकित्सा, सामान्य और माइनर ऑपरेशन, पैथोलॉजी जांच, स्त्री विशेषज्ञ, प्रसव सुविधाएं आदि उपलब्ध होनी चाहिए।
इसी तरह दस बेड वाले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में भी प्राथमिक चिकित्सा, घाव या चोट की माइनर सर्जरी, चिकित्सकीय परामर्श व इलाज की सुविधाएं उपलब्ध होती हैं। इस आधार पर दो सौ बेड के बीके अस्पताल के अलावा शहरी और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में करीब सवा पांच सौ बेड उपलब्ध होने चाहिए। सच्चाई यह है कि मेवला महराजपुर का 46 बेड का अत्याधुनिक स्वास्थ्य केंद्र जिसका उद्घाटन केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर और दो महीने बाद खुद मुख्यमंत्री खट्टर ने किया था उसमें आज तक एक भी बेड नहीं है, मरीजों को भरती करने की सुविधा शुरू नहीं हो पाई है, कारण स्टाफ की कमी। सूत्रों के अनुसार यह तीन मंजिला स्वास्थ्य केंद्र फार्मासिस्ट के भरोसे चलाया जा रहा है। तिगांव स्वास्थ्य केंद्र में तो ऑपरेशन थियेटर तक नहीं है तो समझा जा सकता है कि वह भी केवल रेफरल यूनिट बन कर रह गया है।
यदि बीके अस्पताल के दो सौ बेड छोड़ भी दिए जाएं तो नौ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रा में 286 और 14 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में 140 बेड यानी करीब सवा चार सौ बेड उपलब्ध हैं। जग जाहिर है कि किसी भी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या इक्का दुक्का में प्रसव सुविधा को छोड़ कर किसी भी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में मेडिकल-पैरा मेडिकल स्टाफ नहीं होने के कारण मरीज भरती नहीं किए जाते। हालात ये हैं कि नौ स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सक तो छोड़ो, फार्मासिस्ट और नर्सिंग स्टाफ तक नाम मात्र को है। इसका अर्थ हुआ कि शहर को नए अस्पताल की नहीं बल्कि जनरल फिजिशयन, स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ, आंख-नाक-गला रोग विशेषज्ञ, दंत चिकित्सक, हड्डी रोग आदि विशेषज्ञ चिकित्सकों के खाली पड़े पदों को भरने के साथ साथ आवश्यक उपकरणों आदि की जरूरत है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार जिले के सबसे बड़े बीके अस्पताल में ही सामान्य और विशेषज्ञ चिकित्सकों के 42 प्रतिशत पद खाली हैं। समझा जा सकता है कि पीएचसी-सीएचसी में पहुंचने वाले मरीजों को क्यों जिला अस्पतला रेफर कर दिया जाता है।
बताते चलें कि पूर्व सीएमओ डॉ. विनय गुप्ता ने सीएम नायब सैनी की चुनावी घोषणा के आधार पर जिले के सभी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में ऑपरेशन की सुविधा उपलब्ध कराए जाने का प्रस्ताव बनाकर मुख्यालय पंचकूला भेजा था। घोषणा और प्रस्ताव को भेजे एक साल पूरा हो चुका है ऑपरेशन तो दूर स्वास्थ्य केंद्रों में मरहम पट्टी व टीकाकरण करने की भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। अब सीएमओ डॉ. जयंत आहूजा ने सेक्टर 56 में साठ बेड का अस्पताल बनाने का प्रस्ताव बना कर भेजा है। डॉ.आहूजा की मानें तो अस्पताल बनने से सेक्टर-55, 56, समयपुर रोड, सोहना रोड, राजीव कालोनी, कृष्णा कालोनी, सरुरपुर, जीवन नगर, गौछी, कुरैशीपुर, फतेहपुर तगा, खेड़ी कलां, नंगला एन्क्लेव के करीब दो लाख नागरिकों को फायदा होगा। सवाल ये पैदा होता है कि क्या दो तीन मंजिला इमारत खड़ी करने से कही कोई फायदा हो जाएगा? सेक्टर 55 में खड़ी ऐसी ही एक बिल्डिंग से जिसमें न तो डॉक्टर है न स्टाफ आज तक लाभ हो पाया किसी को? समझने वाली बात यह है कि अस्पतालों के नाम पर बिल्डिंग बना देने से जनता को कोई लाभ होने वाला नहीं है, लाभ केवल तभी हो सकता है जब अस्पतालों में पर्याप्त स्टाफ एवं उपकरण आदि उपलब्ध कराए गए हों।
जानकार कहते हैं कि सरकार की नीयत आम जनता को चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराना कतई नहीं है, अगर होती तो पहले से बने पड़े अस्पताल, स्वास्थ्य केंद्रों को चलाने के गंभीर प्रयास किए जाते लेकिन इसमें नियमित तौर पर बंधा खर्चा होगा, कमाई नहीं। यदि नई बिल्डिंग बनाई जाएगी तो सत्ताधारी नेता, जन प्रतिनिधि, मंत्री-संतरी, अधिकारी सबको मोटा कमीशन मिलेगा। जिस तरह पूरे देश मेें करोड़ों रुपये खर्च कर बनाए जा रहे निर्माणाधीन पुल आए दिन टूट रहे हैं, सड़कें गड्ढों में तब्दील हो रही हैं वह भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के स्तर का जीता जागता नमूना है। इतना होने के बावजूद न किसी अधिकारी और न ही ठेकेदार पर कार्रवाई होती है, तो समझा जा सकता है कि पूरे देश में शासन की देख रेख में सत्तापक्ष और अधिकारी जमकर जनता की गाढ़ी कमाई की बंदरबांट कर रहे हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि मौजूदा बने खड़े अस्पतालों को ठीक ढंग से चलाने की व्यवस्था करने के बजाय सीएम सैनी ने साठ बेड का अस्पताल बनवाने की घोषणा अपने जनप्रतिनिधियों के लिए नाम-दाम कमाने की व्यवस्था की है। अस्पताल चलाने में तो स्टाफ, उपकरण, मशीनेें, रोजाना खपने वाला सामान आदि पर खर्च होता है। इसलिए बिल्डिंग बनाओ और कमीशन लेकर फारिग हो। जनता का क्या है उद्घाटन होने पर तालियां पीटेगी लेकिन सुविधाएं मांगने के लिए सड़क पर नहीं उतरेगी।
मेवला महाराजपुर सीएचसी, सेक्टर 55 सीएचसी के उद्घाटन में भी जनता ने खूब तालियां बजाई थीं, अब ये बेकार खड़े हैं। सीएमओ डॉ. जयंत आहूजा का दावा भी सीएम सैनी, विधायक सतीश फागना और भाजपाई नेताओं की तरह हवा हवाई नजर आ रहा है। जैसे कि ये नेता करते हैं कि घोषणा करने में क्या जा रहा है कुछ भी बोल दो, जनता तो मूर्ख है खुश हो जाएगी। जानकारों का मानना है कि जिस तरह सभी स्वास्थ्य केंद्रों में ऑपरेशन कराने की योजना आज तक परवान नहीं चढ़ सकी है उसी तरह यह प्रस्ताव भी निदेशालय की मेजों में धूल फांकेगा। बहुत संभव है कि मंझावली पुल, ग्रीन फील्ड एक्सप्रेस वे, राजा नाहर सिंह स्टेडियम की तर्ज पर चुनाव के ठीक पहले एक बार फिर से इन योजनाओं का ढोल पीटा जाए, चुनाव होने के बाद अगले पांच साल तक फिर भुला दिया जाएगा।