उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर जिले के दादरी खुर्द गांव में अडानी समूह द्वारा प्रस्तावित 1600 मेगावाट की कोयला आधारित अल्ट्रा सुपर क्रिटिकल थर्मल पावर परियोजना इन दिनों कई तरह के विवादों में घिर चुकी है। इसका एक कारण यह भी है कि यह परियोजना पर्यावरण संकट, स्थानीय समुदायों के अधिकारों और कानूनी प्रक्रिया की अनदेखी के सवालों को जन्म देती है। इस परियोजना को मिर्ज़ापुर थर्मल एनर्जी (यूपी) प्राइवेट लिमिटेड के नाम से अडानी समूह की सहायक कंपनी द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है। इसके लिए जिस ज़मीन का चयन किया गया है, उसमें लगभग 12 हेक्टेयर क्षेत्र ऐसा है जो 1952 की गजट अधिसूचना के अनुसार संरक्षित ‘वन भूमि’ के रूप में दर्ज है। सुप्रीम कोर्ट के गोडावर्मन केस (1996) के फैसले के अनुसार ऐसी किसी भी भूमि पर बिना अनुमति के कोई गैर-वन गतिविधि नहीं की जा सकती। हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के अनुसार, अडानी समूह पर आरोप है कि उन्होंने बिना आवश्यक पर्यावरणीय स्वीकृति के भूमि समतलीकरण और निर्माण कार्य शुरू कर दिया। इससे न केवल पर्यावरणीय कानूनों का उल्लंघन हो रहा है, बल्कि ग्रामीणों के मौलिक अधिकारों के साथ भी अन्याय का सवाल खड़ा हो गया है।
इसी ज़मीन पर 1320 मेगावाट की वेलस्पन एनर्जी की परियोजना प्रस्तावित थी जिसे 21 दिसंबर 2016 में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (हृत्रञ्ज) ने रद्द कर दिया था। उस दौरान भी पर्यावरण प्रभाव आंकलन रिपोर्ट (श्वढ्ढ्र) में काफी गंभीर खामियां निकल कर सामने आई थी। इसके साथ ही सार्वजनिक सुनवाई की पारदर्शिता में अनियमितता देखने को मिली थी।
आश्चर्य की बात यह है कि वही भूमि फिर से अडानी की कंपनी के पास चली गई। गौर करने की बात यह है कि नई डील की पारदर्शिता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कंपनी इससे पहले भी कई बार कथित अवैध संपत्ति पर कभी सड़क तो कभी जंगल सफाई का कार्य करती हुई आई है, लेकिन स्थानीय समूहों और युवाओं के आंदोलन ने कंपनी के मनमाने रवैये पर रोक लगाई है। पर्यावरण संरक्षण को लेकर काम करने वाले विंध्य बचाओ प्रोग्राम के कार्यकर्ताओं ने पर्यावरण को बचाने के लिए हर बार कठोर कदम उठाए है। 11 अप्रैल 2025 को उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इस परियोजना को लेकर सार्वजनिक सुनवाई आयोजित की, लेकिन इस प्रक्रिया पर भी कई तरह की अनियमितताओं का आरोप है। ग्रामीणों को समय पर सूचना नहीं दी गई, सुरक्षा बलों की भारी तैनाती से भय का माहौल रहा, और कई लोगों को बोलने का मौका तक नहीं मिला। स्थानीय लोगों और पर्यावरणविदों का कहना है कि यह सुनवाई केवल औपचारिकता थी, असल में जनता की राय लेने का कोई प्रयास नहीं हुआ। स्थानीय लोगों ने सार्वजनिक सुनवाई को गैरकानूनी बताते हुए विरोध किया।
आरोप है कि जल्दबाजी और ‘भाड़े की भीड़’ के बीच संपन्न हुई जनसुनवाई में प्रभावित लोगों को बुलाया ही नहीं गया था। क्यों है यह क्षेत्र संवेदनशील ? यह क्षेत्र पारिस्थितिकी दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। यहां भालू समेत कई सुरक्षित प्रजातियां पाई जाती हैं। 2019 में डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (डीएफओ) ने मड़िहान के जंगलों को भालू संरक्षण रिजर्व घोषित करने के लिए उत्तर प्रदेश वन विभाग को प्रस्ताव भी भेजा था।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि परियोजना के लागू होने से न सिर्फ वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट होगा, बल्कि पूरे क्षेत्र का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ जाएगा। वहीं ग्रामीणों का कहना है कि न तो उन्हें इस परियोजना की पूरी जानकारी दी गई और न ही उनकी सहमति ली गई। इस जंगल के नष्ट होने से पलायन और भुखमरी जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। उनके अनुसार मड़िहान के जंगलों के नष्ट होने से महज जंगली जीव जंतुओं, पर्यावरण को ही खतरा नहीं होने वाला, बल्कि आसपास के इलाकों में जल संकट भी गहरा हो जाएगा। इसका सीधा असर खेती-किसानी से लेकर आस-पास के रहवासियों के रोजमर्रा के जीवन पर पड़ेगा।