फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) विश्व हिंदू परिषद द्वारा अरावली संरक्षित वन क्षेत्र में कई एकड़ जमीन पर चलाई जा रही गोपाल गोशाला में सैकड़ों गायें चारा-पानी के अभाव में तड़प तड़प कर मरने को मजबूर हैं। हिंदुत्व और गोरक्षा के नाम पर बड़े बड़े आंदोलन चलाने वाले विहिप का गोशाला प्रबंधन इन गोवंश को चारा-पानी इसलिए नहीं देता, कि ये दुधारू नहीं हैं। यानी हिंदुत्व का राग अलापने वालों के लिए ये गोवंश उपयोगिता समाप्त होने के साथ ही पूजनीय से आर्थिक बोझ की श्रेणी में आ जाते हैं। गोपाल गोशाला में भेजे जाने वाले ये बेकार के गोवंश अभागे हैं क्योंकि यदि ये बाहर रहते तो कहीं मुंह मार कर या घास चर कर अपना पेट भर ही लेते लेकिन सेवा के नाम पर कैद होने के बाद भूख से तड़पते हुए जान दे देना ही इनकी नियति बन चुकी है।
बीते दिनों एक महिला समाजसेवी गोवंश की सेवा करने के इरादे से गोपाल गोशाला पहुंची थीं। गोशाला के मुख्य द्वार से अंदर घुसते ही एक ऊंची दीवार वाले बाड़े में दो सौ से अधिक गोवंश को भूख से तड़पते हुए चारे-पानी के लिए संघर्ष करते पाया। पूजनीय गोवंश की दुर्दशा देख वह भड़क गईं और बाड़े के अंदर जाकर गहनता से जांच की। पशुओं को चरने के लिए बनाई गई चरही में पड़ा कूड़ा और ईंट पत्थर बता रहे थे कि इनमें लंबे समय से चारा नहीं डाला गया था। पशुओं के पीने के पानी का भी कोई इंतजाम नहीं था।
भोजन-पानी नहीं मिलने से कई गायें कमजोर होकर जमीन से उठने लायक नहीं थीं, एक गाय तो उनके सामने ही भुखमरी से दम तोड़ती नजर आई। उन्होंने वीडियो वायरल किया तो हिंदुत्व के रक्षक हरकत में आ गए और फौरन ही वीडियो बंद करवा कर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। महिला सैकड़ों गोवंश की दुर्दशा पर आंसू बहाती रही और सीएम-पीएम से लेकर गोरक्षा आयोग तक शिकायत करने की चेतावनी देती रही लेकिन खुद को असली गोरक्षक बताने वाले विहिप के कारिंदों ने गोशाला की असलियत आम जनता तक न पहुंच जाए इस डर से उन्हें जबरन बाहर कर दिया। स्थानीय सूत्रों के अनुसार यहां भुखमरी से आए दिन किसी न किसी गोवंश की मृत्यु हो जाती है, मरे हुए जानवरों को जंगल में फिकवा दिया जाता है।
सूत्र बताते हैं कि इसी कारण गोशाला में गोवंश की संख्या लंबे समय से दो हजार के आसपास ही बनी हुई है। यहां नगर निगम भी हर महीने आवारा गोवंश को पकड़ कर भेजता है। यदि आवारा पशुओं में कोई दुधारू गाय होती है तो उसे अंदर की पशुशाला में रखा जाता है जहां उनके चारे और दोनों समय दुहने की व्यवस्था की जाती है। आवारा बैल, सांड और साधारण गायों को बाहर के बाड़े में रखा जाता है। खास बात यह है कि बाहर के बाड़े में रखे गए गोवंश के नाम पर गो ग्रास सेवा दान वसूला जाता है लेकिन उन्हें ऊंट के मुंह में जीरा की तरह ही चारा डाला जाता है। गोवंश की सेवा के नाम पर मोटी कमाई कर रही विहिप को भूख-प्यास से मर रहे पूजनीय पशुओं की हत्या की जिम्मेदारी लेने की हिम्मत दिखानी चाहिए।
गोपाल गोशाला प्रबंधन से मिली जानकारी के अनुसार यहां के गोवंश के चारे-पानी के लिए नगर निगम से प्रति माह चार लाख रुपये दिए जाते हैं। इसके अलावा स्वयंसेवी संस्थाएं, गऊ प्रेमी, हिंदुत्ववादी संगठन, पशु प्रेमी संगठनों से भी गो ग्रास सेवा के लिए दान मिलता है। गो ग्रास सेवा दान की अधिकतम राशि निर्धारित नहीं है लेकिन न्यूनतम 11 सौ रुपये है। इस मद में कितनी रकम आती है पदाधिकारियों ने इसकी कोई जानकारी नहीं दी।
इनके अलावा गोशाला की कमाई गाय का दूध, घी, दही, गोमूत्र और गोबर बेचने से होती है। गाय का दूध अस्सी से नब्बे रुपये प्रति लीटर की दर से बिकता है और खरीदने वाले अधिकतर प्रशासनिक अधिकारी हैं, सुबह शाम इन अधिकारियों के नौकर कारों से आते हैं और शुद्ध दूध ले जाते हैं। गाय का घी ढाई हजार रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेचा जाता है, इसकी मांग इतनी ज्यादा है कि हमेशा कमी बनी रहती है। दही भी 120 से 140 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से मिलता है। गोमूत्र प्रति बोतल सौ से डेढ़ सौ रुपये में मिलता है, गोबर की बिक्री से भी अच्छी खासी कमाई होती है।
इनके अलावा गोशाला परिसर में शनिदेव मंदिर व अन्य देवी देवताओं के मंदिर हैं, बड़ा मंडप होने के कारण हर माह कोई न कोई बड़ा धार्मिक आयोजन किया जाता है जिसमें दान, चढ़ावा, धार्मिक पुस्तक, सामग्री आदि की बिक्री से बहुत मोटी कमाई होती है। बावजूद इसके भूखे प्यासे तड़प-तड़प कर गोवंश मरने को मजबूर है। दरअसल, गाय में 33 करोड़ देवी देवता केवल तब ही बसते हैं जब वह किसी मुसलमान के पास है। भले ही मुसलमान गोपालक हो लेकिन बजरंगी दंगाईयों, विहिपियों, संघियों को वह गोतस्कर, और गोवध करने वाला ही नजर आता है। भले ही हाजी जमात अली की तरह अपनी गायों को अपने बच्चों की तरह पालता हो। गो तस्करी और हत्या के शक में उसे पीट पीट कर मार डाला जाता है।
गोशाला के नाम पर हुआ जमीन का खेल दुख की बात यह है कि जिस गोवंश के नाम पर अरावली की पीएलपीए संरक्षित जमीन पर बहुत बड़े इलाके में गोशाला का धंधा किया गया उन्हें ही अब मरने के लिए छोड़ दिया गया। जानकार बताते हैं कि सत्ता के संरक्षण में संरक्षित अरावली वन क्षेत्र में गोशाल के नाम पर गैर वानिकी गतिविधियां की जा रही है। उनके अनुसार कृष्णपाल गूजर के मामा मेवला महराजपुर निवासी तिलकराज बैंसला की जमीन अरावली पीएलपीए संरक्षित क्षेत्र में पड़ी थी जिसका कोई व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं हो सकता था। ऐसे में गोशाला की आड़ लेकर तिलकराज ने विहिप को गोपाल गोशाला के लिए यह जमीन दे दी। गोशाला चल निकली और सरकार ने इस तक पहुंच बनाने के लिए बाकायदा चौड़ा सा रास्ता भी दे दिया तो विहिप ने गोशाला के लिए वहां और जमीन खरीद डाली। अपनी जमीन होते ही विहिप ने तिलकराज की जमीन लौटा दी। भांजे केंद्रीय मंत्री गूजर के संरक्षण मे तिलकराज बैंसला ने अब इस जमीन पर शेड डाल कर मज़द़ृर, दिहाड़ी कामगारों के रहने का इंतजाम किया है, भविष्य में इस बेशकीमती जमीन का इस्तेमाल मोटी कमाई के उद्देश्य से किया जाएगा।