फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) रिश्वत लेकर अवैध निर्माण करवाने की गारंटी लेने वाला बल्लबगढ़ जोन का जेई परवेज आलम बेईमानी का काम भी बेहद ईमानदारी से करता है। जेई परवेज आलम केवल अवैध निर्माण करवाने का ही ठेका नहीं लेता, मुजेसर इलाके में लगने वाली साप्ताहिक बाजार की वसूली भी उसके जिम्मे है। मुजेसर में रविवार की शाम लगने वाली साप्ताहिक बाजार में यह संवाददाता पहुंचा और रेहड़ी-पटरी दुकानदार सहित टेबल पर दुकान लगाने वालों से जानकारी हासिल की।
अधिकतर दुकानदार तो धंधा बंद होने के डर से कुछ भी बोलने से कतराते रहे। कुछ दुकानदारों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पहले एक टेबल के लिए 110 रुपये, एक लाइट के तीस रुपये और नगर निगम की जमीन के पचास रुपये यानी कुल 190 रुपये वसूले जाते थे। रेडीमेड कपड़ों की दुकान लगाने वाले राजू ने बताया कि कुछ दिन पहले टेबल के रेट 150 रुपये, लाइट के 50 और जमीन के 80 यानी 280 रुपये कर दिए गए। दुकानदारों ने हल्का फुल्का विरोध किया तो बताया गया कि कमिश्नर मैडम ने साप्ताहिक मार्केट को अवैध बताते हुए बंद करने का आदेश दिया है। अब दुकान लगानी है तो इसी रेट पर भुगतान करना होगा वरना अपना सामान उठा कर चलते बनो। समझा जा सकता है कि पांच लाख का लहंगा पहनने वाली निगमायुक्त मोना ए श्रीनिवास ने शहर में लगने वाली साप्ताहिक बाजारों को बंद कराने का हुक्म, इन्हें बंद कराने के लिए नहीं बल्कि इनके दुकानदारों से वसूले जाने वाले नजराने की कीमत बढ़ाने के लिए ही जारी किया था। पटरी पर चादर बिछा कर प्लास्टिक का सामान बेचने वाले रामखिलावन ने बताया कि जो दुकानदार टेबल नहीं लेते जमीन पर ही दुकान लगाते हैं उनसे जमीन और लाइट का बढ़ा हुआ सुविधा शुल्क वसूला जाता है।
फास्ट फूड शॉप लगाने वाले माहेश्वरी नाम के कारीगर ने बताया कि बंधी रकम तो चुकानी ही पड़ती है, पुलिसकर्मियों, नगर निगम के साहब, सफाईकर्मियों को मुफ़्त में खिलाना-पिलाना भी पड़ता है। ये लोग किसी भी दुकान से कुछ भी ले सकते हैं। आईसक्रीम की रेहड़ी लगाने वाले पप्पू ने बताया कि सौ रुपये और दो आइस्क्रीम देनी पड़ती है, इससे ज्यादा सामान लेने पर पैसे मांगने पड़ते हैं, जो कभी पूरे शायद ही मिलते हों। घूम फिर कर बांसुरी, गुब्बारे-खिलौने बेचने वाले रामू कहते हैं कि सौ रुपये तो देने ही होते हैं कभी कभार साहब लोग अपने बच्चों को गुब्बारे आदि दिलाते हैं तो इसके क्या पैसे लिए जाएं। बाजार में पानी आपूर्ति करने वाले अमित गुप्ता ने बताया कि प्रति बोतल दो रुपये कमीशन देना पड़ता है, अगर नहीं देते तो दूसरे पानी वाले देने के लिए तैयार हैं, बड़ा कंप्टीशन है।
सुधी पाठकों को बताते चलें कि मार्केट में औसतन चार सौ छोटी बड़ी दुकानें लगती हैं, यानी प्रति सप्ताह कमोबेश एक लाख दस हजार रुपये वसूली होती है। इसमें से एक बड़ा हिस्सा बाजार के लिए मेज, बिजली, आदि सुविधाएं उपलब्ध कराने वाले दलाल का होता है लेकिन नगर निगम की जमीन का खर्च पूरा का पूरा जेई साहब को पहुंचता है, जहां से मैडम तक हिस्सा पहुंचाया जाता हैं। दलाल अपनी कमाई से पुलिस और नगर निगम के छोटे कर्मचारी जैसे सफाईकर्मियों को भी खर्चा-पानी देता है। जेई साहब इनके अलावा बाजारों में सड़क तक अतिक्रमण कर सामान बिछाने वाले दुकानदारों से कार्रवाई नहीं करने के एवज में प्रतिमाह खर्चा वसूलते है, जो उनके रोजमर्रा के काम जैसे कार में ईंधन भराना, अधिकारियों की फटीग निपटाने आदि के काम आते हैं।