फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) शहर की लाइसेंसशुदा कालोनियों इंद्रप्रस्थ कॉलोनी, इरोज गार्डन में रिहायशी प्लॉटों में चल रहे व्यावसायिक कॉंप्लेक्स, दुकानों को सील करने या तोडऩे की कार्रवाई के बजाय इनके संचालकों को जिला नगर योजनाकार एन्फोर्समेंट डीटीपीई कार्यालय से एक बार फिर नोटिस देने का पाखंड किया जा रहा है। यदि यह पाखंड नहीं होता तो नोटिस की भाषा दस दिन में जवाब देने वाली नहीं होती, बल्कि चेतावनी दी जाती कि यदि दस दिन में अवैध निर्माण खुद नहीं तोड़ा तो डीटीपीई खुद उसे तुड़वाएगा। हमेशा की तरह ही अवैध निर्माण करने वाले इस नोटिस को गंभीरता से नहीं लेंगे क्योंकि उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि नोटिस क्यों जारी किए गए हैं।
संदर्भवश सुधी पाठकों को बताते चलें कि डीटीपीई राहुल सिंगला ने बीती 30 जनवरी को ग्रीन फील्ड कॉलोनी में करीब दो सौ अवैध निर्माणों पर नोटिस चस्पा किया था। इन्हें भी दस दिन में जवाब का मौका दिया गया था लेकिन रिहायशी प्लॉटों में धड़ल्ले से चल रहीं ये व्यावसायिक गतिविधियां न तो बंद हुईं और न ही डीटीपीई ने कोई कार्रवाई की। भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार यह नोटिस भेजे ही लूट कमाई की नीयत से गए हैं न कि कार्रवाई करने की नीयत से। यदि वह गंभीर होते तो ऐसे अवैध निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियां चलाने वाले भवनों को मौके पर ही सील करते। दस दिन भी बीत चुके हैं अब कार्रवाई करें। दरअसल, डीटीपीई को भी मालूम है कि ग्रीनफील्ड कॉलोनी के मुख्य मार्ग पर कॉमर्शियल एक्टिविटी चलाने वाले अधिकतर लोगों को सत्तापक्ष का संरक्षण प्राप्त है, उन्हें यह संरक्षण पिछली अन्य सरकारों में भी हासिल था। ऐसे में इनकी दुकानें सील करने या तोडऩे की हिम्मत नहीं की जा सकती, तो नोटिस देकर जो कुछ हासिल हो सकता है वही किया जा रहा है।
समझने वाली बात यह भी है कि डीटीपीई मुख्य मार्ग पर आवासीय प्लॉटों में चल रही व्यावसायिक गतिविधियों को तो नोटिस दे रहे हैं लेकिन ग्रीन फील्ड कॉलोनी के अंदर एफएआर और बिल्डिंग बायलॉज का उल्लंघन कर बनाए जा रहे बिल्डर फ्लोर उन्हें नहीं दिखाई दे रहे। इन्हें नोटिस भी नहीं दिया जाता क्योंकि इनका नजराना आर्किटेक्ट के जरिए पहले ही पहुंचा दिया जाता है। दरअसल, बिल्डर फ़्लोर का कंप्लीशन सर्टिफिकेट तो आर्किटेक्ट ही जारी करता है, इसी पर विभाग की मुहर लग जाती है, यानी आर्किटेक्ट जो भी काला-सफेद करके लाता है, बिना जांचे परखे ही उसे कंप्लीशन सर्टिफिकेट जारी कर दिया जाता है। जाहिर है कि अपने काले-सफेद को पास कराने के लिए आर्किटेक्ट पहले से ही दाम दे चुका होता है। यानी जिन अवैध निर्माणों से दाम मिल चुका है तो वहां कार्रवाई नहीं करनी। इसी कंप्लीशन सर्टिफिकेट की आड़ में अवैध फ्लैटों की रजिस्ट्री भी हो जाती है, यानी आर्किटेक्ट, डीटीपी, तहसील सब की मिलीभगत से यह खेल चल रहा है। यदि कार्रवाई करनी पड़ी तो सबकी कमाई रुक जाएगी। दरअसल, लाइसेंसशुदा कॉलोनियों में बीते दस-पंद्रह साल से अवैध निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियां चल रही हैं, डीटीपी की ओर से यह बताते हुए कि अवैध निर्माण और गतिविधियों के खिलाफ सरकार बहुत गंभीर है, कार्रवाई के नाम पर साल-दो साल में नोटिस जारी किए जाते हैं।
कार्रवाई केवल नोटिस तक ही सिमट जाती है, बहुत हुआ तो सत्ता पक्ष का विरोध करने वालों की इमारतें सील कर दी जाती हैं तोड़ी वो भी नहीं जातीं, क्योंकि बाद में ले देकर उनकी भी सील खोल दी जाती है। यही कारण है कि अवैध निर्माण बदस्तूर जारी रहता है और डीटीपी भी नोटिस भेजने की औपचारिकताएं करते रहते हैं। इससे नगर योजना का स्वरूप बिगड़े या आम जनता को परेशानी हो डीटीपी, राजनेताओं या सरकार को कुछ फर्क नहीं पडऩे वाला।