फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) प्रयाग महाकुंभ में 28 जनवरी की रात हुई भगदड़ में शासन-प्रशासन की अव्यवस्था के पैरों तले कुचल कर संजय कॉलोनी निवासी अमित भी परलोक सिधार गए थे। हादसे में मृत श्रद्धालुओं की गिनती छिपा रही योगी सरकार ने बिना पोस्टमॉर्टम कराए ही आनन-फानन अमित का शव हरियाणा भिजवा दिया। उनका अंतिम संस्कार हुए एक सप्ताह से अधिक का समय बीत चुका है लेकिन भाजपा की हिंदू हित रक्षक सरकार उनका मृत्यु प्रमाणपत्र नहीं बना रही है। उनके परिजनों को नगर निगम से यह कह कर लौटा दिया जाता है कि अमित की मृत्यु हो गई है इसके सुबूत में डॉक्टर का लिखा हुआ पर्चा लेकर आओ।
बीके अस्पताल के डॉक्टर कहते हैं कि अमित की जहां मौत हुई है वहीं का डॉक्टर लिख कर देगा। अब, महाकुंभ में सर्वाधिक डुबकियां लगवाने का रिकॉर्ड बनाने को आतुर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार और खासकर प्रयागराज जिला प्रशासन को इतनी फुरसत कहां, कि वह एक अमित की मृत्यु का सर्टिफिकेट बनाते फिरे। रिपोर्टें आ रही हैं कि महाकुंभ में मरने वालों के परिजनों से वहां का प्रशासन लिखवा रहा है कि मृत्यु प्राकृतिक हुई है, और कोई कार्रवाई नहीं चाहते,कई मामलों में इसके बाद ही शव दिया गया। ऐसे में प्रयागराज के सरकारी अस्पताल के जो डॉक्टर कुंभ मेें मरने वालों का आंकड़ा जारी नहीं कर पा रहे, वे प्रशासन से अनुमति लिए बगैर लिख कर देने वाले नहीं महाकुंभ को भाजपा की उपलब्धि बनाने के लिए देश भर के भाजपा शासित प्रदेशों से अंधभक्तों को भर-भर कर संगम नगरी भेजा गया था। शुभ मुहूर्त में संगम स्नान कर मनोकामनाएं पूर्ण करने, पाप व कष्ट मिटाने शहर के अमित भी अपने परिवार के साथ गए थे। उनकी गलती यह थी कि वह साधारण श्रद्धालु थे, तो उन्हें भी वाईआईपी के लिए आरक्षित बड़े इलाके में नहीं घुसने दिया गया और लाखों श्रद्धालुओं के झुंड में भेड़-बकरियों की तरह हांक दिया गया। वीआईपी को समस्या न हो, इसके लिए आम श्रद्धालुओं के संगम नोज तक आने-जाने का संकरा रास्ता ही दिया गया। इसमें भगदड़ हुई तो अमित जैसे डेढ़ हजार से अधिक श्रद्धालु गिरे और उठ न सके। पैरों के नीचे रौंदे जाने से अमित सहित अनेक श्रद्धालुओं की अकाल मृत्यु हो गई, निर्लज्ज बाबा धीरेंद्र शास्त्री की भाषा में सबको मोक्ष प्राप्त हो गया।
सीएम योगी की तरह मौतों का आंकड़ा छिपाने में जुटे प्रयागराज प्रशासन ने चालाकी से बिना पोस्टमॉर्टम कराए ही पुलिस अभिरक्षा में अमित का शव उनके घर भिजवा दिया। पुलिस मामलों के जानकारों के अनुसार क्योंकि घटना महाकुंभ में घटी थी इसलिए प्रयागराज पुलिस को ही मृतक का पोस्टमॉर्टम कराना चाहिए था, यह प्राधिकार पुलिस को ही है, आम नागरिक को नहीं। क्योंकि घटना यहां की नहीं थी इसलिए मुजेसर थाना और संजय चौकी पुलिस ने भी पोस्टमॉर्टम नहीं कराया। संजय कॉलोनी चौकी इंंंचार्ज के अनुसार यूपी पुलिस ने अमित का संजय नाम पता सत्यापित करवाया था, पोस्टमॉर्टम नहीं कराया गया। मृत्यु के दो दिन बीत जाने के कारण दुखी परिजनों ने भी बिना पोस्टमॉर्टम कराए ही अंतिम संस्कार कर दिया। अमित के परिवारीजन संजय चौहान ने बताया कि बुधवार को प्रयागराज पुलिस के सब इंस्पेक्टर रामजीत ने फोन कर पूछा कि उन्होंंंने अमित के शव का पोस्टमॉर्टम कराया था या नहीं, उन्होंने बताया कि यहां पोस्टमॉर्टम नहीं हुआ। जानकारों का मानना है कि नियमानुसार प्रयागराज के स्वरूप रानी अस्पताल में ही अमित के शव का पोस्टमॉर्टम होना चाहिए। इन लोगों का मानना है कि अमित की तरह ही हादसे में मरने वाले अन्य प्रदेशों के श्रद्धालुओं के शव भी इसी तरह बिना पोस्टमॉर्टम कराए वहां से हटवा दिए गए। बहुत संभव है कि योगी सरकार जिन तीस लोगों के मरने की बात कह रही है उनमें अमित का नाम नहीं होगा, पोस्टमॉर्टम नहीं होने से हादसे में मृत्यु होने का कोई सुबूत भी नहीं बचा है। यदि ऐसा हुआ तो योगी ने मृतक आश्रितों को 25 लाख रुपये मुआवजा देने की जों घोषणा की है उसका लाभ इन्हें नहीं मिलेगा। अमित मिलट्री इंजीनियरिंग सर्विसेज में नौकरी करता था, अब उसकी मृत्यु हादसे में होना प्रमाणित करना मुश्किल होगा, जिस कारण उसके परिवार को इस तरह की मृत्यु पर मिलने वाले फायदे भी नहीं मिलने वाले। फिलहाल तो परिवार मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने के लिए सरकार की अनदेखी और लाल फीताशाही में उलझा हुआ है। मृत्यु प्रमाणपत्र के लिए डॉक्टर का लिखा पर्चा होना चाहिए, अब श्मशान घाट की पर्ची पर्याप्त नहीं है।
यानी मरने पर भी पर्ची बनाने के लिए डॉक्टर को पैसे दो। अब यह पर्ची लेने के लिए अमित के परिजनों को एक बार फिर प्रयागराज में प्रशासन की चौखट पर माथा रगडऩा पड़ेगा। वीआईपी श्रद्धालुओं की सेवा टहल में लगे प्रशासन के पास इस ‘गैर जरूरी काम के लिए फिलहाल वक्त नहीं है, महाकुंभ के बाद कब यह पर्चा मिलेगा यह भी तय नहीं है।अमित का मृत्यु प्रमाणपत्र जारी नहीं किए जाने से नाराज लोगों का कहना है कि सरकार ने जिस तरह से हर शहर से भेजने का इंतजाम किया था उसी तरह मरने वालों की सहायता का भी बेहतरीन इंतजाम क्यों नहीं? यह सवाल करने वालों को समझना चाहिए कि सरकार उनका इस्तेमाल अपने प्रचार और अंधभक्त तैयार करने के लिए करती है न कि उनके कल्याण और मरने पर सहायता देने के लिए। कुंभ गए तो सरकार की वाह-वाह, मर गए तो तुम्हारी जिम्मेदारी।