मज़दूर-मुक्ति को समर्पित, कॉमरेड शेरसिंह को लाल सलाम

मज़दूर-मुक्ति को समर्पित, कॉमरेड शेरसिंह को लाल सलाम
February 04 01:03 2025

क्रांतिकारी मजदूर मोर्चा
25 जनवरी को सवेरे 8 बजे जैसे ही जयपुर से फ़ोन पर एक दिल चीरने वाली ख़बर आई, कॉमरेड शेरसिंह नहीं रहे, ऑटोपिन मज़दूर बस्ती तिलक नगर, सेक्टर 24, फऱीदाबाद की झुग्गी नं 4, ऊर्जा-विहीन होकर मानो बिलख पड़ी। ऑटोपिन इंडिया लिमिटेड फरीदाबाद की कंपाउंड वाल तथा विशाल गटर के बीच पतली सी पट्टी पर बसी, झुग्गी बस्ती की झुग्गी नं 4 असाधारण थी। छत तक पुस्तकों से भरी इस कुटिया में पिछले 50 साल से रह रहा असाधारण निवासी, अब यहां कभी नहीं आएगा। मज़दूरों की धड़कन को पिछले 50 साल से हर वक़्त महसूस करने वाले सच्चे मज़दूर नेता कॉमरेड शेरसिंह के दिल ने थक कर धड़कना बंद कर दिया था।

हाथ में अख़बार और दिल में मज़दूरों की मुक्ति की धधकती ज्वाला लिए बेचैन रहने वाले दुर्बल शरीर वाले कॉमरेड शेरसिंह फऱीदाबाद के मज़दूरों की पहचान बन गए थे। दिल में दर्द लिए ये पंक्तियां लिख रहे लेखक का अपना तजुर्बा है कि देश में किसी भी स्थान पर हुई किसी भी मज़दूर सभा में ऐसा नहीं हुआ कि फऱीदाबाद का जि़क्र आते ही वहां उपस्थित मज़दूर कार्यकर्ताओं ने उससे यह सवाल न पूछा हो, “कामरेड शेर सिंह कैसे हैं?”

माक्र्सवाद-लेनिनवाद वह जीवन दर्शन है, जिसे कोई भी इंसान, व्यक्तिगत नफ़े-नुकसान से ऊपर उठकर सच्चे दिल से समझ ले और दिमाग की बत्ती न जले ऐसा नहीं हो सकता। इस विज्ञान से लैस होते ही सोच का दायरा बहुत विशाल हो जाता है, अंधेरा और मायूसी बिखरने लगते हैंऔर भविष्य सचमुच प्रकाशमय नजऱ आता है। कॉमरेड शेरसिंह के साथ भी वही हुआ जो दुनिया के लाखों माक्र्सवादी-लेनिनवादी कार्यकर्ताओं के साथ हुआ है और आगे भी निश्चित रूप से हमेशा होता रहेगा। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का यह दर्शन हमें सिखाता है कि वर्ग-विभाजित समाज में मौजूद मानव-श्रम चूसकर मोटे होते जा रहे शोषक वर्ग के शोषण के क्रूर कोल्हू से मानवता को मुक्त करने और मानव विकास धारा में मौजूद तरह-तरह के रोड़ों को दूर करने से ज्यादा शानदार काम और कोई नहीं। यही काम है, यही रास्ता है जिस पर निरंतर चलते हुए क्रांति में अपनी हिस्सेदारी दजऱ् करना, इंसानी जि़ंदगी का सर्वोच्च लक्ष्य तथा इंसानी जीवन का अधिकतम आनंद प्राप्त करना है।

माक्र्सवाद-लेनिनवाद से कॉमरेड शेरसिंह का परिचय उस वक़्त हुआ, जब वे आईआईटी मद्रास में इंजीनियरिंग के छात्र थे। दिमाग की बत्ती जली और उन्होंने महसूस किया कि इंजीनियर बन कर पैसे कमाने, ख़ुद को और शादी कर अपने बीवी बच्चों को सभी भौतिक सुख सुविधाएं उपलब्ध कराने और अंत में बूढ़ा होकर मर जाने से भी ज़रूरी एक काम है, जिससे साधारण इंसान असाधारण तथा मामूली मज़दूर, गैरमामूली बन जाता है। साधारण और संकीर्ण जि़ंदगी को असाधारण और विशाल-विकराल बनाने का रास्ता उन्हें साफ़ नजऱ आया और वे उस पर चल पड़े। चलते गए फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। शादी- बच्चे, ऐशो-आराम-बंगला-गाड़ी वाली जि़न्दगी अब उन्हें तुच्छ लगने लगी।

आज की पूंजीवादी, उपभोक्तावादी संस्कृति ग्रस्त, मिडिल क्लास अपने जिन ‘अरमानों को हासिल करने के लिए जि़न्दगी भर भन्नाई फिरती है, पागल रहती है उन्हें पूरा करने की सभी परिस्थितियां कॉमरेड शेरसिंह को उपलब्ध थीं। करीब 75 साल पहले हिसार जि़ले के गांव…—में एक मिडिल क्लास किसान के घर उनका जन्म हुआ। शिक्षा वेलगंव से शुरू होकर, उस वक्त के बेहतरीन किंग जॉर्ज स्कूल, बिट्स पिलानी, आईआईटी कानपुर, फिर आईआईटी मद्रास और जब देश में आपातकाल लगा तब जेएनयू नई दिल्ली। ऐशो आराम की जिंदगी हासल करने के लिए ऐसी अनुकूल परिस्थितियां ऐसा लांच-पैड, अच्छे-अच्छों को मयस्सर नहीं होता। सारी संभावित सुविधाओं को उन्होंने ऐसे ठोकर मार दी मानो मज़दूर मुक्ति, क्रांति की उनकी मंजि़ल में ये उनके पैरों की बेडिय़ां बनने जा रही हों।

मज़दूर कार्यकर्ता और कम्युनिस्ट नेता बहुत देखे हैं लेकिन सूफ़ी संतों वाला इतना सरल जीवन, इतने कम खर्च में जीवन जीने वाला बंदा आज तक नहीं देखा। ऑटोपिन झुग्गी बस्ती में प्रवेश करते वक़्त सब्जी का ठेला लगाने वाला मज़दूर, उस लाल कुटिया में जिसमें ताला लगने का प्रावधान ही नहीं था, 2-3 टमाटर और एक खीरा छोड़ जाता था वही उनका दिन भर का भोजन था। वहां होने वाली मीटिंगों में चना और गुड़ का नाश्ता हमेशा याद रहेगा।

1970 का दौर देश में नक्सलवादी आंदोलन के उभार का दौर था। वे उसमें शामिल हो गए। जल्दी ही वे समझ गए कि कोई भी बदलाव जन-सैलाब की भागीदारी के बगैर मुमकिन नहीं। उन्होंने नक्सलवादी आंदोलन को जल्द ही त्याग दिया और छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को जागरुक कर संगठित करने में लग गए। उसी वक़्त ग्वालियर की प्रसिद्ध मिल के मज़दूर, मालिकों और शासन तंत्र का दमन झेल रहे थे। शेरसिंह ग्वालियर आ गए और मज़दूरों को राजनीतिक रूप से जागरुक कर उन्हें संगठित करने में लग गए। मज़दूरों के उसी आंदोलन में अपनी जि़म्मेदारी निभाते हुए कॉमरेड समझ गए कि मज़दूरों को व्यापक स्तर पर जगाने जागरुक करने की ज़रूरत है और गुडगांव, मानेसर, फऱीदाबाद मज़दूरों के गढ़ बनने की संभावनाएं रखते हैं। इसीलिए उन्होंने 1970 के दशक में फऱीदाबाद को अपना कार्य क्षेत्र बनाने का फैसला किया।

सेक्टर 24 स्थित ऑटोपिन इंडस्ट्रीज द्वारा अपनी कंपनी के बाहर, जिस सरकारी ज़मीन को अपनी पार्किंग बनाया हुआ था वहां मज़दूरों की झुग्गियां बन रही थीं। उसी झुग्गी बस्ती की झुग्गी नं. 4 को उन्होंने अपना ‘निवास-सह मज़दूर पुस्तकालय बनाया। 1982 में मज़दूरों के मासिक अख़बार, ‘फऱीदाबाद मज़दूर समाचार का प्रकाशन शुरू किया। मज़दूरों के इस लोकप्रिय अख़बार में मज़दूरों के दु:ख दर्दों को लिखना, छापना और फिर फैक्ट्री-फैक्ट्री लंच के वक़्त जाना और 1/ रुपये में वह अख़बार बेचना, कॉमरेड शेरसिंह की एकल-व्यक्ति परियोजना थी। ‘फऱीदाबाद मज़दूर समाचार मज़दूरों का अखबार ही नहीं बल्कि उन्हें नियमित रूप से जगाने वाला उनका संगठनकर्ता बन गया था। अख़बार के साथ-साथ वे दिल्ली-एनसीआर में ही नहीं बल्कि दूर-दूर तक होने वाले हर मज़दूर आंदोलन में लाजि़मी तौर पर सक्रिय भागीदारी करने से कभी नहीं चूकते थे।

मारुति आंदोलन को उन्होंने अभी वाले दौर में सिर्फ 2012 से ही कवर नहीं किया बल्कि 1980 के दशक में हुए बुनियादी आंदोलन में भी हिस्सेदारी की थी। कितना दुखद है कि आज जब फिर से गैर-कानूनी तरीके से निकाले गए और निष्पक्ष जांँच, एसआईटी तथा अदालत द्वारा बेक़सूर ठहराए जाने के बाद भी काम पर न लिए गए मारुति मजदूर ज़बरदस्त लड़ाई लड़ रहे हैं और पिछले 4 महीने से मानेसर चौक तहसील के सामने पर धरने पर बैठे हैं और जो अपनी शानदार संगठन क्षमता के आधार पर मारुति तथा हीरो ऑटो कंपनी द्वारा पिछले 10 साल में निकाले गए लाखों अस्थायी मज़दूरों को भी अपने साथ जोड़कर ‘अस्थाई मज़दूर संघ बनाने में क़ामयाब हो गए हैं और एक ऐतिहासिक मज़दूर आंदोलन का आगाज़ कर रहे हैं तब शेर सिंह उनके साथ नहीं होंगे।

जून 2011 में मारुति मज़दूरों की पहली ‘सिट-इन स्ट्राइक में जब मजदूर 13 दिन तक लगातार कंपनी के अंदर ही धरने पर बैठे रहे थे और सरकारी-दरबारी मीडिया ज़ोर-ज़ोर से चीख रहा था कि मारुति मजदूरों ने फैक्ट्री पर कब्जा जमा लिया है तब शेर सिंह ही थे जिन्होंने अपने ‘फऱीदाबाद मज़दूर समाचार में ऐलान किया था “जून 2011 को ए और बी शिफ्ट के मजदूरों ने मिलकर फैक्ट्री पर क़ब्ज़ा नहीं किया बल्कि कंपनी से कंपनी और सरकार का कब्जा हटा दिया है।” क़ब्ज़ा करने और नाजायज़ क़ब्ज़े को हटाने का फ़र्क बताने वाली ऐसी व्याख्या, कोई मीडिया कर्मी तो छोडि़ए, ट्रेड यूनियन लीडर या मज़दूर कार्यकर्ता भी नहीं कर पाया था। कॉमरेड शेरसिंह की धड़कनों में मज़दूर का दिल धड़कता था और उनकी धमनियों में मज़दूरों का लहू दौड़ता था।

कोविड महामारी के दौरान ‘मज़दूर समाचार बंद हो गया था। उसके बाद से कामरेड शेर सिंह देश भर में भ्रमण कर मज़दूरों के हाल उनके बीच रहकर जानने का कार्य करते थे। दरअसल 1960 तथा 1970 का दशक मज़दूर नगरी, फऱीदाबाद में ट्रेड यूनियन आंदोलन के उरूज का दौर था। उस दौर के एक प्रगतिशील संस्कृति-कर्मी साथी ने बताया था कि एक बार एक फैक्ट्री में मालिक ने मज़दूर को थप्पड़ मार दिया था कि लाखों मज़दूर हाथों में लाल झंडे लेकर सड़कों पर आ गए थे। बल्लभगढ़ से आगे झाड़सेंतली गांव से बदरपुर बॉर्डर तक मथुरा रोड एक लाल नदी के समान नजऱ आई थी। उस मगरूर फैक्ट्री मालिक को पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लेने और प्रशासन द्वारा मज़दूरों से हाथ जोड़कर माफ़ी मांगने के बाद ही मज़दूर काम पर लौटे थे। अगले दिन कुछ अख़बारों ने यह हेडलाइन लगे थी ‘फऱीदाबाद, इंडिया में नहीं बल्कि सोवियत संघ में है!

1980 से ही ट्रेड यूनियन आंदोलन लगातार कमज़ोर होता गया और आज ये हालत है कि मज़दूरों को उनके सभी अधिकारों से महरूम किया जा रहा है। किसी ना किसी फैक्ट्री में मालिक हर रोज़ मज़दूरों अपमानित करते हैं। शायद ट्रेड यूनियन आंदोलन के पतन का ही परिणाम था कि कामरेड शेरसिंह मज़दूरों को संगठित करने उनकी यूनियन बनाने, उनमें जागरूकता लाने के कार्यक्रमों को मज़दूरों की स्वाभाविक रूप से एकजुट होने की प्रक्रिया में अनावश्यक दख़ल, ‘आइडियोलॉजी को इंजेक्ट करना मानने लगे थे।

कोरोना के दौरान अखबार के बंद होने के बाद भी कॉमरेड शेरसिंह पहले की तरह ही सक्रिय थे। अब वे फऱीदाबाद मज़दूर समाचार के पिछले अंकों से महत्वपूर्ण सामग्री को संकलित कर लोगों के साथ व्हाट्सएप पर अथवा ईमेल से शेयर करते थे। पिछले 2 सालों से वे भारत भ्रमण पर थे और लगातार अपनी यात्रा मजदूरों से हुई बातचीत और औद्योगिक इलाकों के बारे में लिखते रहते थे। सुबह 4:30 के आसपास उनका व्हाट्सएप मैसेज तथा मेल प्राप्त हो जाते थे। उसी भ्रमण के दौरान वे पुणे में थे कि बीमार हो गए, वे अविवाहित थे। पुणे के साथी ने कॉमरेड शेरसिंह के भाई को जो जयपुर में रहते हैं सूचित किया। भाई ने ‘पुणे से जयपुर हवाई जहाज का टिकट भेज दिया। वे जयपुर तो पहुंच गए लेकिन अस्पताल ले जाते वक़्त उनकी मृत्यु हो गई। पिछली यात्रा से कामरेड शेरसिंह, नवंबर 24 में फऱीदाबाद लौटे थे, तब उन्होंने मिलने आने के लिए फ़ोन किया था, जैसा कि वे हमेशा करते थे। व्यस्तता के कारण मिलना नहीं हो पाया। इन पंक्तियों के लेखक को इस बात का मलाल हमेशा रहेगा।

फऱीदाबाद के मज़दूर आपको बहुत दिल से याद कर रहे हैं कॉमरेड। आप अचानक चले गए। आपके जाने से जो जगह ख़ाली हुई है, हम उसे भरने का दावा तो नहीं करते लेकिन सही माक्र्सवादी-लेनिनवादी लाइन की रोशनी में पूंजीवादी शोषण-उत्पीडऩ से, मज़दूर-मुक्ति, मानव-मुक्ति की समाजवादी क्रांति की वह मंजि़ल, जो अपने तय की थी, उसे हासिल करने के लिए समर्पित रहने के अहद को हम एक बार फिर दोहराते हैं।
अलविदा कामरेड शेर सिंह….

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Mazdoor Morcha
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