मंत्री जी! अधिकारियों के शामिल होने से नहीं जनता के काम होने से सफल होगी ग्रीवेंस कमेटी

मंत्री जी! अधिकारियों के शामिल होने से नहीं जनता के काम होने से सफल होगी ग्रीवेंस कमेटी
January 20 07:44 2025

फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) पांच साल सत्ता से बाहर रहने के बाद ग्रीवांस रिड्रेसल कमेटी की पहली बैठक की अध्यक्षता कर रहे मंत्री राव नरबीर सिंह को बैठक में पुलिस आयुक्त का हाजिर न होना अपनी तौहीन लगा। हालांकि बैठक में पुलिस विभाग की ओर से शिकायतें सुनने और उनका निस्तारण कराने के लिए डीसीपी मौजूद थे लेकिन मंत्री जी का मानना था कि पुलिस आयुक्त से नीचे का अधिकारी काम का नहीं होता, इसीलिए बोले कि डीसीपी क्या करेगा।

हालांकि पुलिस प्रवक्ता यशपाल सिंह ने बताया कि कोर्ट केस के कारण सीपी बैठक में नहीं आ सके फिर भी मंत्री जी का गुस्सा शांत नहीं हुआ और डीसी विक्रम सिंह को बैठक में अनुपस्थित रहने वाले अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी करने का फरमान सुना दिया। बताते चलें कि बैठक में शिकायतों से संबंधित विभागों के अधिकारियों के साथ ही अन्य अनावश्यक अधिकारी भी मौजूद थे। बिना काम के गुलदस्ते की तरह सजाए गए इन अधिकारियों के कार्यालय से अनुपस्थित रहने के कारण उस दिन का काम बाधित हुआ।

मंत्री राव नरवीर सिंह को समझना चाहिए कि बैठक जनता की समस्याओं का समाधान करने के लिए बुलाई जाती है न कि अधिकारियों द्वारा नेता-मंत्रियों की ईगो भरपाई करने के लिए। सीपी की अनुपस्थिति पर गुस्सा करने से ज्यादा उन्हें इस बात पर नाराजगी जतानी थी कि श्रम विभाग और जिला प्रशासन एक गरीब मज़दूर महिला सोनी को इंसाफ नहीं दिला रहे। सेक्टर 69 स्थित फैक्टरी में काम करते हुए जुलाई 2024 में सोनी की उंगली कट गई थी, मालिक ने न तो इलाज के पैसे दिए और न ही नौकरी पर रख रहा है। मंत्री जी यदि सच में जनहितैषी होते तो महिला को इंसाफ दिलाने में आनाकानी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करते। डीसी विक्रम सिंह ने अपनी सुविधा के अनुसार यह एक केस छांट लिया जबकि इस तरह के सैकड़ों केस मौजूद हैं और मज़दूर इंसाफ पाने के लिए अधिकारियों के दफ़्तरों के चक्कर काट रहे हैं।
हूडा ने सेक्टर 58 इलेक्ट्रो प्लेटिंग जोन में साल 2002 में 52 उद्यमियों को प्लॉट अलॉट किए थे, 22 वर्ष बीतने के बाद भी उद्यमियों को प्लॉटों पर कब्जा नहीं दिया गया। निर्धारित समय में निर्माण नहीं कराने पर बेचे हुए प्लॉट रिज्यूम करने वाले हूडा के अधिकारी 22 साल से उद्यमियों को टरका रहे हैं, इसमें दस साल से भी अधिक समय से तो भाजपा की ही सरकार है। अधिकारियों की मौजूदगी पर खुश होने वाले राव नरबीर को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए कि इतने साल में उनकी सरकार उद्यमियों को इंसाफ नहीं दे सकी।

उद्योग नहीं लग पाने के कारण इन 22 सालों में उद्यमियों को करोड़ों का नुकसान हुआ उसकी तो बात छोड़ दो। यदि इतने ही तेज तर्रार होते तो मंत्री जी हूडा के लापरवाह अधिकारियों को कम से कम निलंबित कर उनके खिलाफ जांच का आदेश देते, इसके विपरीत हूडा अधिकारियों को उद्यमियों के प्लॉट दिलाने का सलाह देकर कर्तव्य की इतिश्री कर ली। बताते चलें कि खट्टर ने भी 2023 में ग्रीवांस कमेटी की बैठक में उद्यमियों के पैसे वापस करने और नई जगह प्लॉट देने का आदेश दिया था, वह भी आज तक पूरा नहीं हो सका, राव नरबीर तो यह भी नहीं बोल सके, और बेचारे उद्यमियों को हूडा के निकम्मे अधिकारियों के रहमो करम पर छोड़ गए।

समझने वाली बात यह है कि ग्रीवांस कमेटी की शिकायतें और उन पर होने वाली कार्रवाई का एजेंडा एक से डेढ़ सप्ताह पहले ही तय हो चुका होता है। डीसी महोदय आने वाली सैकड़ों शिकायतों में से अपनी सुविधानुसार दस-पंद्रह का चयन कर लेते हैं। चयन के बाद शिकायतों को संबंधित विभागों को निस्तारण के लिए भेज भी दिया जाता है ताकि बैठक में मंत्री जी निस्तारण का ऐलान कर अपनी सरकार की कर्मठता का प्रदर्शन कर सकें।

बावजूद इसके बैठक में एक तिहाई शिकायतों का निस्तारण मौके पर नहीं हो पाया। 18 में से 6 शिकायतों को अगली सुनवाई के लिए छोड़ दिया गया। कामचोर अधिकारी भी जानते हैं कि ग्रीवांस कमेटी की बैठक केवल पाखंड है, बैठक खत्म काम खत्म। वरना मंत्री की बैठक से पहले ही शिकायतों के निस्तारण या उनकी पूरी तैयारी करके आते, लेकिन बैठक में ऐसा कुछ नजर नहीं आया। अगली बैठक में मंत्री भी नहीं पूछने वाले कि पिछली बैठक में छूट गई शिकायतों का क्या हुआ।

मंत्री-नेता द्वारा अपनी शान दिखाने के लिए दरबार का पाखंड किया जाता है। दरबार में जो चुनी-छटी शिकायतें आती हैं उनके निस्तारण का नाटक किया जाता है। यदि सच में जनता की समस्याओं को सुनना और सुलझाना है तो खुला दरबार लगाया जाए, सभी पहुंचें और मंत्री के सामने अपनी समस्या रखें लेकिन ऐसा करने पर शिकायतियों का तांता लग जाएगा और समस्या का समाधान नहीं होने पर मंत्री नेता की भद पिट जाएगी।

इसलिए दरबार का पाखंड कर मीडिया में चमका जाता है। सच्चाई यह है कि ये सारे काम और शिकायतों का निस्तारण लाखों रुपये खर्च कर लगाए जाने वाले दरबार के बिना भी हो सकता है। यदि सभी कार्यालयों में अधिकारी और कर्मचारी अपने कर्तव्यों का पालन ईमानदारी से करें और आने वाली शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई करें तो दरबार लगाने के पाखंड की जरूरत ही न पड़े।

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Mazdoor Morcha
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