फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार एनआईटी नम्बर दो व तीन के दो स्कूलों में बने कमरों की हालत 10 सालों में ही जर्जर हो चुकी है। सरकार के लाखों रुपये डूब जाने के बावजूद न तो किसी अधिकारी ने इस पर कार्रवाई करने की जरूरत समझी और न ही किसी जनप्रतिनिधि ने जनता के धन की इस लूट की ओर ध्यान देने की जरूरत समझी। केवल एक सामाजिक कार्यकर्ता अजय बहल ने इसकी गम्भीरता को समझते हुए आरटीआई के द्वारा मामले की छान-बीन की। लम्बे समय तक पत्राचार करने के बाद राज्य की एक सूचना आयुक्त ज्योति अरोड़ा ने इस मामले की जांच एडीसी फरीदाबाद द्वारा किए जाने के आदेश दिए हैं। सवाल यह पैदा होता है कि कब तो एडीसी साहब जांच रिपोर्ट तैयार करेंगे और वह किसके पास जाएगी और उस रिपोर्ट पर कोई क्या कार्रवाई करेगा? यह सर्वविदित है कि अव्वल तो यह रिपोर्ट आनी नहीं और यदि आ गई तो इस पर कोई कार्रवाई होनी नहीं। हां, कार्रवाई के नाम पर दोषियों से कुछ न कुछ वसूली करके मामले को रफा-दफा कर दिया जाएगा।
दरअसल इस तरह की जांच कराकर रिपोर्ट मांगने का मतलब ही यह होता है कि मामले को ठंडे बस्ते में लगा दिया जाये। वरना, घटिया निर्माण करने वालों की काली करतूत तो बिना एडीसी जांच के स्वत: सार्वजनिक तौर पर चिल्ला-चिल्ला कर बता रही है। यदि कार्रवाई किसी ने करनी हो तो सबूत सामने खड़ा है। इस तरह यह कोई इकलौता मामला नहीं है। बीते दिनों ‘मज़दूर मोर्चा’ ने भाखरी गांव के उस हाईस्कूल का विवरण भी प्रकाशित किया था जिसकी लाखों रुपये से नव-निर्मित इमारत का इस्तेमाल एक दिन भी न हो सका। उस पर आज तक भी किसी ने कोई कार्रवाई नहीं की।
बीते दो वर्ष पूर्व ‘मज़दूर मोर्चा’ ने गांव सेहतपुर के स्कूल में 60 लाख रुपये की लागत से बनी उस दो मंजिला इमारत का वर्णन किया था जिसे इंजीनियरों द्वारा जांच में कंडम घोषित कर गिराने की सिफारिश की थी। उस इमारत के निर्माण हेतु तत्कालीन डीईओ ने विशेष रूप से एक भ्रष्टतम मास्टर यतींद्र शास्त्री को डीडीओ पावर देकर वहां नियुक्त किया था। दोनों ने मिलकर 60 लाख रुपये का वह ढांचा खड़ा कर दिया जो एक दिन भी काम न आ सका। आज तक न तो उस डीईओ का कुछ बिगड़ा और न ही उस मास्टर यतींद्र शास्त्री का, इमारत ध्वस्त करके एलएंडटी द्वारा नई बिल्डंग तो बना दी गई है लेकिन लूटे गए 60 लाख की न तो कोई रिकवरी हुई और न ही किसी को सजा मिली।
राज्य भर में शायद ही कोई स्कूल ऐसे बचे हों जहां पर इस तरह की लूट कमाई का धंधा अनवरत न चल रहा हो। समझा जा सकता है कि यह धंधा कोई हेडमास्टर अथवा डीईओ अकेला-अकेला नहीं कर रहा हो।
इस काले धंधे में शिक्षा मुख्यालय के साथ-साथ शिक्षा मंत्री की भी हिस्सापत्ती रहती रही है। इसी के चलते आज तक न तो किसी से कोई रिकवरी हो पाई है और न ही किसी को कोई सज़ा। सर्व शिक्षा अभियान ने तो गजब ही कर दिया है। इसके सारा काम अस्थाई कर्मचारियों द्वारा कराए जाते हैं। काम व खर्च का कोई हिसाब-किताब एवं लेखा-जोखा नहीं रखा जाता। यहां करोड़ों रुपये खर्च तो हो जाते हैं पर उनका न तो कोई ऑडिट होता है और न ही किसी की जवाबदेही। इस नाते यहां लूट कमाई करना सबसे सरल व सुरक्षित समझा जाता है। सुधी पाठक यह समझ गए होंगे कि शिक्षा विभाग में धन की कमी नहीं है बल्कि इसमें होने वाली सेंधमारी को रोकने की जरूरत है।