शाहिद अख्तर उम्र के इस मोड़ पर आकर पीछे मुड़ कर जब मैं देखता हूँ तो खुद को खुद से ही अजनबी पता हूँ। शिनाख्त की, पहचान की एक कशमकश में खुद को उलझा हुआ पाता हूँ। “मैं” और “समाज” एक दूसरे के मुक़ाबल हैं। मैं जो हूँ, समाज में उसे माना नहीं जा रहा और जो मैं नहीं हूं, उसे बताया जा रहा है। कुछ दशक पहले यह अंतरद्वन्द्व नहीं था। काम से काम महसूस नहीं होता था।
तकरीबन पचास साल पहले की बात करूँ। जाड़ा खत्म हो रहा था। मैं और मेरे बड़े भाई दोनों कुछ कपड़े चुन रहे थे। होली कुछ हफ्ते बाद थी और हम दोनों उसकी ही तैयारी में मशग़ूल थे। होली के लिए हम पहले से अपने कपड़े चुन लिया करते थे। हम कॉलेज में नए नए पहुंचे थे। मैंने और मेरे बड़े भाई दोनों ने एक ही साथ मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। हमारे दोस्त क़ैसर और शकील ने भीहमारे साथ कॉलेज में प्रवेश किया था। उनके पिता डीएसपी थे, मेरे पिता टीचर। हम चारों साथ-साथ वॉलीबाल खेलते। कई बार फिल्में भी साथ-साथ देखते। होली भी साथ-साथ मनाते। होली की हमारी टोली छोटी सी थी, हम चारों को मिल कर आठ नौ लोगों की। मेरा मुहल्ला मोरिया घाट मुसलमानों का मुहल्ला था। उससे लगी एक छोटी सी कालोनी थी, “बड़ी बाग” के नाम से जानी जाती थी। क़ैसर और शकील वहीं रहते थे। नीरज, पंकज, मुन्ना और दूसरे दोस्त भी उसी कालोनी के थे। हम होली की शुरुआत बड़ी बाग से करते और मोरिया घाट से निकलतेऔर किरानी घाट से होते हुए चौक पर पहुँचते। हमारी टोली अपनी भयंकर हुड़दंगई के लिए पूरे शहर में मशहूर थी। लोग आम तौर पर हमारे साथ होली खेलने से कतराते और हमें देख कर इधर उधर हो जाते । हुड़दंगों की हमारी यह टोली किसी को भी अटपटी नहीं लगती। रंगों में तर-बतर हम आराम से घर लौटते। घर में या पड़ोस में कोई हमें नहीं रोकता या टोकता था।
कॉलेज का शुरुआती दौर होली-दीवाली और ईद-बकरीद साथ-साथ मनाते हुए गुजऱा। हर त्योहार में हमारे बीच एक जैसी गर्मजोशी होती। कुछ आपसी नोक-झोंक के बावजूद मजहब शायद ही कभी हमारे आड़े आया। जब मैंने इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया तो चीज़ें बदली-बदली थीं। दामोदर नदी के पूर्वी घाट पर स्थित साढ़े चार सौ एकड़ में फैला हमारा कॉलेज पूरी तरह रेजिड़ेंशियल है। छात्र और टीचर कॉलेज कॅम्पस में रहते। फस्र्ट ईयर में कॉमन मेस था जिसे कॉलेज की तरफ से चलाया जाता था। उसके बाद स्टूडेंट्स खुद ही मेस चलते। मेस की जगह और पकाने के कुछ बर्तन कॉलेज की तरफ से जातिगत आधार पर वितरित किए जाते। मुस्लिम स्टूडेंट्स को अलग मेस मिलता। यह दौर था जब बिहार के इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में “जातीय दंगे” आम थे। मुस्लिम उसमें गुटनिरपेक्ष की स्थिति में रहते। इंजीनियरिंग कॉलेज में ही मैंने पहली बार “मियां” और “क्या रे पाकिस्तानी?” का जुमला सुना। कुछ लड़के मज़ाक में भी हमें पाकिस्तानी से संबोधित करते, लेकिन कुछ गंभीरता से बोलते। हर मुस्लिम छात्र के लिए यह व्यक्तिगत परीक्षा की घड़ी होती कि वह इस सम्बोधन से कैसे निबटता है।
यह वह दौर था जब क्रिकेट और खास तौर पर हॉकी में हिंदुस्तान और पाकिस्तान की टीमें मज़बूत थीं। दोनों के बीच जब भी मुक़ाबला होता, सभी कमेन्टरी सुनने के लिए उत्सुक होते। जिसके पास ट्रांजि़स्टर होता, उसके कमरे में लड़कों की भीड़ जमा हो जाती। मुस्लिम लड़के इस भीड़ से परहेज करते। दरअसल, ये मैच मुस्लिम लड़कों के लिए बहुत अहम होते। उन्हें हॉस्टल के कमरे से निकलने से पहले मैच का हालचाल जानना जरूरी होता था। अगर भारत मैच में पिछड़ रहा है, तो उन्हें अपने चेहरे पर उदासी ओढनी पड़ती थी। और अगर भारत की बढ़त चल रही है तो बुखार में भी चेहरे पर मुस्कान लादनी होती थी।
इन सब के बावजूद हमारे रिश्ते कभी तल्ख नहीं हुए। मजे की बात है कि हॉस्टल में जिन लोगों से मेल-मिलाप था, भाई बंदगी थी, आज कॉलेज के व्हाट्सएप ग्रुप में उनके साथ रहना मुहाल है। इंजीनियरिंग कॉलेज में सेकंड ईयर में मैं एक वामपंथी छात्र संगठन में सक्रिय हो गया। इसके बाद तो मंजऱ बदल गया। जो “पाकिस्तानी” कह कर चिढ़ाने की कोशिश करते थे, वे अब मुझसे कतराने लगे। यह वह दौर था जब पंजाब में उग्रवाद चरम पर था। उन लड़कों का अब ज्यादा गुस्सा सिखों पर निकलता। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिख विरोधी दंगा में हम वामपंथी छात्रों ने हस्तक्षेप किया था और कई सिखों, खास कर सिख ट्रक ड्राइवरों को बचा कर एक आदिवासी गाँव में पहुंचाया था जहां के ज़्यादातर लोग हमारे समर्थक थे।
इसी क्रम में हम कुछ छात्र एक सिख परिवार के यहाँ गए थे। उनसे हमारी अच्छी जान पहचान थी। वो हमारा समर्थन करते थे। हम पहले भी कई बार उनके यहाँ जा चुके थे। वहां हमने दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन किसी ने दरवाज़ा नहीं खोला। जब हमने बहुत ज़ोर दिया और बताया कि हम उन्हें सुरक्षित जगह पहुँचाने आए हैं, तो सरदार जी ने दरवाज़ा खोल दिया। हट्टे-कट्टे सरदार जी बुरी तरह डरे थे। उनके हाथ में एयरगन थी। उनके पीछे उनकी पत्नी खड़ी थी जिसके हाथ में तलवार था। सबसे पीछे उनकी बेटी थी। उसके हाथ में सब्जी काटने वाला चाकू था। उनके चेहरे पर छाया ऐसा ही डर अब भी देखा जा सकता है, कुछ खास इलाकों में, कुछ खास लोगों के चेहरे पर।
सिख विरोधी दंगे के दौरान आदिवासी गाँवों में कई दिन बताने के बाद मैंने नौकरी करने की जगह पूर्णकालिक कार्यकर्ता बनने की राह अपनाई। बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में दंगे हुए थे। इन दंगों की जांच करने हमारी एक टीम बंबई (अब मुंबई) और गुजरात के कुछ शहरों – सूरत, अहमदाबाद और भरूच जाने वाली थी। यह 1993 मार्च का वाकया है। मुंबई में सीरियल बम ब्लास्ट हो चुके थे। पटना स्टेशन पर जब मैंने बर्थ रिज़र्वेशन के लिए स्लिप बढ़ाया तो वहां बैठे शख्स ने उसे बड़े गौर से देखा, और मुझसे मुखातिब हो कर बोला, “आपने स्लिप पर 24 मार्च की तारीख डाली है।” मैंने इसपर हामी भरी। उसने मुझे देखा और पूछा, “क्या आप 24 मार्च को सफऱ करेंगे?” मैंने फिर हामी भारी। उसने अजीब सी निगाह से मुझे घूरते हुए कहा, “शाहिद साहब, 24 मार्च को ईद है।” पूर्णकालिक कार्यकर्ता के तौर पर दिल्ली में मेरा कुछ साल गुजऱा था। पार्टी से हटने के बाद मैं फिर दिल्ली लौटा था। यह स्ट्रगल का दौर था। दिल्ली में सर छिपाने के लिए एक आशियाना चाहिए था। मेरे एक वकील दोस्त ने एक शख्स से बात की और मुझसे कहा, “तुम वहां चले जाओ, तुम्हें चाभी मिल जाएगी। मकान-मालिक प्रगतिशील और साहित्यिक रुचि के हैं। तुम्हें पसंद आएंगे।” मकान-मालिक बहुत नफासत पसंद और सौफिस्टिकेटेड लगे। वे मुझसे बहुत गर्मजोशी से मिले। जिस कमरे में, मैं बैठा था, उसमें किताबों से भरी कई अलमारियाँ थीं। सोफ़ा बहुत कीमती और खूबसूरत था। सेंटर टेबल पर कई पत्रिकाएं बिखरी थीं। लगभग पाँच मिनट की मुलाक़ात में मैं उनसे बेहद प्रभावित हो चुका था। लेकिन मुलाकात का अंत मेरी उम्मीदों के बरखिलाफ़ हुआ। हुआ यह कि चाभी बढ़ाते हुए उन्होंने मुझसे मेरा नाम पूछ लिया। जाहिर है, मेरा नाम जानने के बाद उस सज्जन पुरुष ने मुझे किराये पर मकान देने से इनकार कर दिया।
यह तीसरा मौक़ा था जब मकान और मेरे बीच मेरा नाम आड़े आया था। लिहाज़ा, मैंने अपने लिए मकान खोजने की अपनी मुहिम रोक दी और अपने एक दोस्त का ऑफर स्वीकार करने का फैसला कर लिया। मेरा दोस्त जिस मकान में रहता था, मकान मालिक का परिवार भी उसके एक हिस्से में रहता था। उस मकान में मुसलमानों का प्रवेश वर्जित था। मैं भी अपना सामान ले कर वहां पहुँच गया, लेकिन शाहिद अख्तर की हैसियत से नहीं। मेरे दोस्त मुझे आलोक शर्मा कह कर बुलाते। स्वाभाविक था कि मकान मालिक भी “शर्मा जी” कह कर मुझे संबोधित करता था।
संघर्ष का एक दौर खत्म होने के बाद मैंने एक समाचार एजेंसी में पत्रकार के बतौर काम करना शुरू किया था। दिल्ली में मेरे सीमित मित्र थे। परमानंद उनमें से एक थे। उनसे मेरा रिश्ता ज्यादा गहरा था। उनके ताऊजी भी साथ रहते थे। ताऊजी ने ही उन्हें पाला था। एक दिन ताऊजी गिर गए और उनके कूल्हे की हड्डी टूट गई। हम लोगों ने उन्हें निकट के एक सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया।
आम सरकारी अस्पतालों की जो स्थिति होती है, उस अस्पताल की भी स्थिति वैसी ही थी। डॉक्टर कभी-कभार आते थे। नर्स शायद ही कभी दिखती। दवा बाहर से लाना होता था। लिहाज़ा, ताऊजी को हर वक़्त एक अटेंडेंट की जरूरत थी। मैं भी उस वक़्त रोहिणी में रहता था और मित्र भी वहीं थोड़ी दूर पर रहते थे। हालात देखते हुए मैंने दिन में उनकी तीमारदारी करने की जिम्मेदारी ले ली, और ऑफिस में अपनी शिफ्ट शाम वाली करवा ली। परमानंद एक सरकारी अधिकारी थे। उनके ऑफिस का टाइम टेबल फिक्स था। लिहाज़ा, वह ताऊजी को शाम में अटेंड करते।
ख़ास बात यह कि ताऊजी पक्के आर्यसमाजी । उन्हें मुसलमानों से, बिहार के रहने वालों से और साथ ही साथ, कम्युनिस्टों से बहुत चिढ़ थी । इत्तेफाक से मेरे साथ तीनों ही चीज़ें जुड़ीं थीं। यह भी एक मजेदार इत्तेफाक था कि परमानंद की दोस्ती जिन लोगों से थी, उनमें से ज़्यादातर बिहार के वामपंथी झुकाव वाले थे।
न जाने क्यों ताऊ जी को मेरा असली नाम पता नहीं था जबकि मैं हफ्ते में दो-तीन बार तो जरूर उनके घर जाया करता और जब भी जाता वहां घंटों बिताया करता। ताऊजी से बातचीत होती । इन सब के बावजूद ताऊजी को लगता था कि मैं कोई पहाड़ी ब्राह्मण हूँ। मुझे बहुत बाद में पता चला कि वो मुझे पंतजी कहा करते थे। ताऊजी उत्तराखंड के थे और उनकी गिनती पहाड़ के शुरुआती आर्यसमाजी नेताओं में होती थी। मित्र के पिता भी आर्यसमाज से जुड़े थे।
अस्पताल में ताऊजी के बेड के बगल में जिस शख्स का बेड था, वह बिहार का एक झोला छाप मुस्लिम डॉक्टर था। वह ताऊजी से बातचीत करने की बहुत कोशिश करता, लेकिन ताऊजी को वह शख्स जरा भी नहीं सुहाता। वह अकसर उसमें कोई न कोई नुक्स निकालते और कहते, “पंतजी, कितना गन्दा रहता है यह!”
मैं हमेशा डरता कि अगर ताऊ जी को पता चल गया कि उनको अटेंड करनेवाला शख्स कोई “पंतजी” नहीं बल्कि “शाहिद अख़्तर” है और उसका ताल्लुक़ भी बिहार से है तो उनकी स्थिति बहुत अजीब सी हो जाएगी। शायद उनको पीड़ा भी होगी। यह सवाल भी बना रहता था कि क्या “शाहिद अख्तर” साथ उनके रिश्ते उतने सहज और सरल बने रहेंगे जो “पंत जी” की हैसियत से मेरे साथ हैं। इन्ही सवालों की वजह से मैं चुपचाप उनकी तीमारदारी करता। उनकी बात सुनता और कोई जवाब नहीं देता।
तीमारदारी का यह सिलसिला कई हफ्ते चला। डॉक्टर ऑपरेशन कर ताऊजी की कूल्हे की हड्डी जोडऩा चाह रहे थे। इसके लिए कई बार उनका टेस्ट किया गया, लेकिन वह ऑपरेशन के लिए फि़ट नहीं पाए गए। बाद में ट्रैक्शन का तरीक़ा अपनाया गया और अस्पताल से उन्हें घर भेज दिया गया। वहां भी उनसे मुलाक़ात होती रही। ताऊ जी का बहुत साल पहले निधन हो गया। मुझे खुशी है कि मेरी वजह से उन्हें कोई पीड़ा नहीं पहुंची। मैं उनके लिए हमेशा “पंतजी” बना रहा। ये कहानियां “ओल्डइंडिया” की हैं। “न्यूइंडिया” की जड़ें “ओल्डइंडिया” में दूर-दूर तक फैली हैं।
तक़लीफ़ होती है कहते हुए, पर “2014” ऐसे ही अचानक नहीं आ जाता!