बदन पे जिस के शराफ़त का पैरहन देखा वो आदमी भी यहाँ हम ने बद-चलन देखा
खऱीदने को जिसे कम थी दौलत-ए-दुनिया किसी कबीर की मुट्ठी में वो रतन देखा
मुझे मिला है वहाँ अपना ही बदन ज़ख्मी कहीं जो तीर से घायल कोई हिरन देखा
बड़ा न छोटा कोई फ़र्क बस नजऱ का है सभी पे चलते समय एक सा कफऩ देखा
ज़बाँ है और बयाँ और उस का मतलब और अजीब आज की दुनिया का व्याकरन देखा
लुटेरे डाकू भी अपने पे नाज़ करने लगे उन्होंने आज जो संतों का आचरन देखा
जो सादगी है कुहन में हमारे ऐ ‘नीरज’ किसी पे और भी क्या ऐसा बाँकपन देखा
– गोपालदास नीरज