शेयर बाजार में शॉर्टसेलिंग एक आम प्रकिया है। इसमें निवेशक शेयरों के किसी बड़े निवेशक या फंड मैनेजर से उधार पर लेता है, और इस उम्मीद से उन शेयर्स को बेच देता है कि इससे उन स्टॉक की कीमत तेजी से गिरेगी, और बाद में उन्हें कम कीमत पर फिर से खरीदा जा सकता है। इसके बाद उन उधार लिए गये शेयर्स को शॉर्टसेलर बाकी बचे मुनाफे को अपने पास रख, वापस लौटा देता है। हिंडनबर्ग ने अडानी समूह के शेयर्स के साथ भी शॉर्टसेलिंग की थी, और मुनाफा कमाया था। लेकिन यह शॉर्टसेलिंग एक व्यापक एवं गहन शोध पर आधारित होती है। जिसमें ऐसा करने वाले को पक्का भरोसा होता है कि अमुक शेयर्स के दाम अपनी असल कीमत से कई गुना ऊपर चल रहे हैं, और आज नहीं तो कल ये बाजार में धड़ाम हो सकते हैं।
शॉर्ट सेलिंग अमेरिकी स्टॉक मार्किट में वैध है। अमेरिका में डॉट.कॉम बबल के दौरान भी जमकर शॉर्टसेलिंग देखने को मिली थी, क्योंकि 1990 के दशक के अंत में डॉट-कॉम कंपनियों ने नई अर्थव्यवस्था के बारे में इतना जमकर प्रचार फैलाया कि इंटरनेट स्टॉक बेतहाशा ओवर वैल्यूड हो गए थे, अर्थात अपनी सही कीमत से कई गुना दामों पर आम निवेशकों के लिए उपलब्ध थे। शॉर्ट सेलर्स ने इस बढ़ते बबल को पहचान लिया था। उन्होंने डॉट-कॉम कंपनियों के खिलाफ दांव लगाया, जिनका राजस्व तो बेहद कम था,लेकिनबाजार पूंजीकरण अरबों डॉलर तक पहुंच गया था।
इस प्रकार शॉर्ट सेलर्स ने भले ही ओवरवैल्यूड स्टॉक की पहचान करके लाभ कमाया, लेकिन साथ ही इसने मौलिक रूप से बेकार व्यवसायों को और भी अधिक पूंजी के गलत आवंटन को रोकने में मदद पहुंचाने का काम किया। इस प्रकार कह सकते हैं कि शार्ट सेलिंग ने शेयर बाजार में कीमतों को वास्तविकता के अनुरूप वापस लाकर बाजार को स्थिर बनाने, इसे सटोरियों के लिए जुए में दांव लगाने और अधिकांश छोटे निवेशकों के लिए लेवल प्लेईंग फील्ड प्रदान करने का मौका दिया।
भारतीय शेयर बाजार की लूट से हो रहा है आम आदमी तबाह इसी वर्ष फरवरी 2024 को चर्चा थी कि भारतीय शेयर बाजार ने 4 ट्रिलियन डॉलर के पूंजी बाजार को पार कर लिया है। अब सोचिये, भारत की कुल जीडीपी अभी भी 4 ट्रिलियन डॉलर पार नहीं कर पाई है, लेकिन हमारे देश के मात्र 6 प्रतिशत श्रम बल को खपा पाने वाले उद्योगों एवं व्यवसायों की मार्केट वैल्यू छप्पर फाड़ गति से बाजार में मूल्यांकित की जा रही हैं। हाल ही में खबर आई है कि रिलायंस ग्रुप ने अपने ग्रुप से लगभग 10 फीसदी कामगारों की छंटनी कर दी है, जिनकी संख्या 42,000 है। वहीं दूसरी खबर यह है कि रिलायंस कंपनी का मूल्यांकन भारत की जीडीपी के 10 प्रतिशत तक हो चुका है। अडानी और अंबानी समूह भारत के दो ऐसे समूह हैं, जिनके पास भारत के महत्वपूर्ण सेक्टर में एकाधिकार लगभग हो चुका है, और इनके इशारे पर भारत की सरकार नाच रही है। कोविड-19 महामारी के बाद से दुनिया में अगर के-शेप इकॉनमी (यानी कुछ सेक्टरों का ग्राफ ऊपर भाग रहा है और बाकी सेक्टरों का ग्राफ गिर रहा है) अगर किसी देश में सर्वाधिक स्तर पर दिखी है, तो उसमें भारत अव्वल स्थान पर बना हुआ है। भारत में सुपर रिच और सुपर प्रॉफिट पर काम हो रहा है। लेकिन सबसे विरोधाभासी चीज यह है कि ये उद्योग न कोई नया निवेश लगा रहे हैं, और न ही बड़े पैमाने पर देश में रोजगार ही उत्पन्न कर रहे हैं। लेकिन मुख्य सेक्टर्स में अपनी मोनोपली स्थापित कर ये भारत में भयानक महंगाई को जन्म दे रहे हैं, और अपने लिए भारी मुनाफा कमा रहे हैं। इनके बैलेंस शीट में भारी मुनाफे का मतलब होता है, इनके शेयर प्राइस में और भी बड़ा उछाल, जिसका फिर से मतलब होता है कि इनके व्यक्तिगत मुनाफे और वैल्युएशन में भारी वृद्धि।
यही कारण है कि आज की प्रमुख खबर में भारती-एयरटेल की खबर बनी हुई है। जिसमें कहा गया है कि सुनील मित्तल की कंपनी ब्रिटेन के सबसे बड़े ब्रॉडबैंड और मोबाइल कम्पनी बीटी ग्रुप में 24.5 प्रतिशत की हिस्सेदारी खरीदने जा रही है। भारतीय उपभोक्ताओं के पास आज के दिन एयरटेल और जिओ के सिवाय कोई विकल्प नहीं है, इसलिए मनमाने ढंग से रेट बढ़ाकर हर तिमाही में हजारों करोड़ रूपये का मुनाफा कमाने वाली कंपनी में से एक, अब इस लूट को ब्रिटेन में लगाने जा रही है। अंधभक्तों के लिए यह खबर गर्व करने वाली हो सकती है, और यह भी संभव है कि वे कहें कि हमें और जमकर लूटो ताकि पूरी दुनिया को खरीद सको, और अडानी-अंबानी-सुनील मित्तल के दुनिया के सबसे धनाढ्य परिवार होने को ही वे विश्वगुरु होना मान सकते हैं। लेकिन यही सब तो बांग्लादेश में हो रहा था, जिसका हश्र देखकर उनका कलेजा मुंह में आ रहा है।
सवाल यह नहीं है कि भारत में आज भी डी-मैट अकाउंट की संख्या कुछ करोड़ ही है। कोई अगर यह समझता है कि भारतीय शेयर बाजार में हेराफेरी से उसे क्या फर्क पड़ता है, छोटे निवेशक यदि लाखों की संख्या में अपने लाखों करोड़ रुपये से हाथ धो बैठते हैं तो उसे क्या फर्क पड़ेगा। नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। आज करोड़ों आम भारतीयों के जीवन बीमा निगम में जमा धनराशि, प्रोविडेंड फंड और पेंशन फंड का लाखों करोड़ रुपया भारत सरकार ने शेयर बाजार में झोंक रखा है। आप जिस म्यूच्यूअल फंड या सिप में अपनी बचत राशि हर माह या सालाना जमा कर रहे हैं, वो सब वहीं झोंका जा रहा है। जिसकी चीफ माधवी बुच हैं, या चित्रा रामकृष्ण जैसे लोग हैं। जो पूर्व में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की चेयरपर्सन रही हैं। जिन्हें उनके सपनों में हिमालय में रहने वाले कोई योगी ज्ञान देकर बताते थे कि मार्किट को कैसे चलाना है, जिन्हें वे ईमेल के माध्यम से एनएसई की कई अहम सूचनाएं साझा किया करती थीं।
इसे विडंबना नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे, कि रिकॉर्ड सातवीं बार देश का बजट पेश करने वाली वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के मंत्रालय के अधीन ही प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और सेबी की चेयरपर्सन आती हैं, लेकिन माधवी बुच को इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर करने और उनके खिलाफ जांच बिठाने के बजाय ईडी के द्वारा नेता प्रतिपक्ष के कसबल ढीले किये जाने की तैयारी हो रही है।
फिर कैसा बजट, कैसी जीडीपी और विकास या रोजगार का सवाल? आज देश में पारदर्शिता और लोकतंत्र एक सपना सरीखा हो चुका है, लेकिन तानाशाही जैसे-जैसे चरम पर पहुंचती है, भूखे और असंतुष्ट जनता के लिए इसे सहन कर पाना दिनों-दिन असंभव हो जाता है। अब बारी न्यायपालिका की है, जिसे असल में इस समय खुद को ठगा महसूस होना चाहिए, क्योंकि उसने जिसे अडानी मामले की जांच का जिम्मा सौंपा था, उसकी मुखिया खुद उस आर्थिक भ्रष्टाचार में दिन के उजाले में लिप्त पाई गई हैं। -साइबर नजर