फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) यातायात पुलिस के लिए 2021 में लाखों रुपये खर्च कर लाए गए वर्दी में लगाए जाने वाले बॉर्डी कैमरे पुलिस गोदाम में पड़े बेकार हो रहे हैं। कैमरा धारण करने वाले यातायात पुलिस कर्मी की ड्यूटी के दौरान की गई सारी कवायद इसमें रिकॉर्ड हो जाती है। यानी इन कैमरों को पहनने का मतलब है पूरी तरह से ईमानदारी से काम करना, अब जो पुलिस वाला यातायात पुलिस में तैनाती पाने के लिए अफसरों को मोटी भेंट देता है भला वो कैसे कैमरा धारण करेगा। अफसर भी कैमरा पहनने पर इसलिए जोर नहीं देते कि अगर ऊपरी कमाई नहीं होगी तो फिर उन्हें हिस्सा भी नहीं मिलेगा। कल्याणकारी शासन के उलट जनता से किसी भी बहाने वसूली करने वाली मोदी-खट्टर सरकार ने सुरक्षित और जाम मुक्त यातायात व्यवस्था के भले ही कोई प्रबंध नहीं किए लेकिन यातायात नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माने की राशि पांच से दस गुना तक बढ़ा दी। जुर्माना राशि कम से कम पांच सौ रुपये होने पर यातायात पुलिसकर्मियों की चांदी हो गई, चालान काटने के बजाय सौदेबाजी कर सौ दो सौ रुपये लेकर चालक को छोड़ दिया जाता है।
खट्टर सरकार ने यातायात पुलिस में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से मार्च 2021 में महानगरों की यातायात पुलिस को बॉडी कैमरे दिए। शहर के जोनल ट्रैफिक अफसरों के लिए भी 36 कैमरे आए। इन कैमरों को पहनने का फायदा ये है कि यातायात का उल्लंघन करने वाले वाहन और चालक की वीडियो बन जाती है, वह कौन से दस्तावेज दिखा रहा है, उससे क्या बात की जा रही है वो सब भी रिकॉर्ड हो जाता। किस वाहन चालक का कितने का चालान काटा ये भी कैमरे में दर्ज हो जाता। यानी इसको पहनने वाले अधिकारी और चालक की सारी करतूतें भीं इसमें रिकॉर्ड हो जातीं।
नियमानुसार वाहन का चालान हेड कांस्टेबल रैंक से ऊपर के अधिकारी कर सकते हैं। इसके विपरीत अधिकृत अधिकारी तो जीप में आराम करते हैं या कभी कभी तो मौके पर भी नहीं होते और होमगार्ड या सिपाही चालान काटता है। अगर कैमरा पहनना पड़े तो साहब को ही सडक़ पर उतर कर चालान काटना पड़ेगा। इसी तरह सर्दी के मौसम में पुलिस वाले वर्दी के ऊपर जैकेट पहनते हैं जिससे उनकी नेम प्लेट और रैंक छिप जाती है। इस तरह से पहचान छिपाकर वाहन चालकों से उगाही की जाती है। कैमरा लगाने से पहचान उजागर हो जाएगी।
वाहनों से वसूली करने के लिए ही सडक़ पर उतरने वाले पुलिसकर्मियों को समझ में आ गया कि ये कैमरे चालकों की गलतियां तो बाद में पकड़ेंगे, पहले उन्हीं की मॉनिटरिंग करेंगे। इनके लगाने से रोजाना होने वाली ऊपरी कमाई खत्म हो जाएगी तो फिर आला अधिकारियों का हिस्सा कैसे पहुंचाएंगे। कैमरा लगाने से होने वाले नुकसान की आशंका देख इनसे छुटकारा पाने के उपाय किए जाने लगेे। चालाक अधिकारियों ने इनमें कोई न कोई गड़बड़ी कर खराब होना बता कर गोदाम में जमा करवा दिया। फार्मूला कामयाब होता देख इसी तरह करीब 25 कैमरे खराब कर जमा करवा दिए गए। बाकी बचे कैमरों का इस्तेमाल रैली, जुलूस, वीआईपी ड्यूटी आदि में किए जाने के लिए रख दिया गया। यानी कैमरों का इस्तेमाल काफी हद तक बंद कर दिया गया।
यातायात पुलिस में काफी समय तक रह चुके एक पुलिस कर्मी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यहां बिना चढ़ावा चढ़ाए तैनाती नहीं मिलती। विभाग में तैनाती हो भी जाए तो मोटी कमाई वाले चौक चौराहों की बाकायदा बोली लगती है। ज्यादा रकम चुकाने वाले को ही चौक-चौराहा दिया जाता है। मोटी कमाई तो भारी वाहन गुजरने वाले रास्तों पर होती है। वाहन चालकों से ओवरलोडिंग, बिना बिल्टी-पर्ची के माल ढुलाई के नाम पर हजारों रुपये वसूले जाते हैं। दो-पहिया चार पहिया वाहन वालों से ओवरस्पीडिंग, ड्राइविंग लाइसेंस, नंबर प्लेट, प्रदूषण के जुर्म में चालान राशि की आधी-चौथाई रकम वसूली जाती है। यदि बॉडी कैमरा पहन कर काम करेंगे तो हो चुकी उसकी कमाई। इन हालात में केवल उन्हीं वाहनों से कमाई संभव है जो अधिकारियों से मासिक लेनदेन तय कर लें, जाहिर है इसके तय होने पर उनको सडक़ पर रोका टोका भी नहीं जाएगा।
अब तो सरकार वाहनों के चालान काटने का प्रतिदिन कोई न कोई लक्ष्य देती है। पिछले सप्ताह प्रत्येक यातायात अधिकारी को एक दिन में ब्लैक फिल्म, ओवरस्पीड, म्यूजिकल हॉर्न, प्रेशर हॉर्न आदि के दो सौ चालान करने का फरमान सुनाया गया था। लक्ष्य शायद इक्का दुक्का अधिकारी ने ही हासिल किया हो लेकिन आदेश के नाम पर जम कर ऊपरी कमाई की गई, पांच सौ का चालान काटने के बजाय सौ दो सौ का चढ़ावा लेकर सख्त हिदायत के साथ जाने दिया गया। सब इंस्पेक्टर रतन सिंह का मामला तो सुधी पाठकों का याद ही होगा, करीब चार महीने पहले उसे सीएम लाइंग स्क्वाड ने ऑफलाइन पीओएस मशीन से वसूली गई जुर्माने की रकम हड़पने में गिरफ़्तार किया था। वह वाहन चालक से जुर्माने की रकम नकद वसूल कर मशीन से पर्ची भी देता था। बाद में यातायात कार्यालय के डेटा सेंटर में काम करने वाले ऑपरेटर की मदद से चालान का यह डेटा डिलीट कर रकम की बंदरबांट होती थी। रतन सिंह अकेले ही यह रकम हजम नहीं कर सकता था, एसीपी तक पहुंचाने की बात उसने कही थी। खास बात यह है कि रतन सिंह की तरह ही कई अन्य जेडओ वही ऑफलाइन पॉस मशीनें इस्तेमाल करते थे जिन्हें डंप किया जा चुका था। पुलिस आयुक्त ने रतन सिंह को तो जेल भिजवा दिया लेकिन गहन जांच करवाने की हिम्मत नहीं जुटा सके, उन्हें भी मालूम है कि यदि जांच हुई तो अन्य सब इंस्पेक्टर ही नहीं विभाग के आला अफसर भी चपेट में आने से बच नहीं पाएंगे। समझा जा सकता है कि पुलिस आयुक्त राकेश आर्य आज तक यातायात पुलिस के जेडओ को बॉडी कैमरे क्यों नहीं पहना सके। लाखों रुपये कीमत के ये कैमरे स्टोर रूम में रखे रखे ही खराब हो जाएंगे, लेकिन वर्दी पर नहीं टांके जाएंगे।
सरकार ने कैमरे जिस मकसद से दिए हों विभाग के लिए ये भी कमीशन की कमाई का ही साधन बन कर रह गए है। कैमरों की खरीद में वेंडर से हस्बे मामूल कमीशन वसूल कर कमाई की गई। बिना इस्तेमाल किए ही कुछ समय बाद इन्हें कंडम घोषित कर दिया जाएगा, इसके बाद इस इलेक्ट्रॉनिक कबाड़ को बेचने में भी अच्छा खासा कमीशन मिल जाएगा।