रेमडेसिविर के नाम पर कंपनियों ने लूटा

रेमडेसिविर के नाम पर कंपनियों ने लूटा
April 21 14:47 2024

इलेक्टोरल बाँड : दि फार्मा फाइल्स

ध्रुव राठी
इलेक्टोरल बांड का स्कैम न सिर्फ देश का सबसे बड़ा स्कैम पूरी ही दुनिया का सबसे बड़ा घोटाला, ये बात भारत की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के पति परकला प्रभाकर जो कि गए जाने माने अर्थशास्त्री हैं, ने कही है। ये कोई एक घोटाला नहीं है बल्कि घोटालों का भंडार है जिसमें कई छोटे बड़ी हेराफरी, धोखाधड़ी छिपी हुई हैं। कुछ ऐसे घोटाले जहां पर सीधे तौर पर जनता के पैसे की चोरी की गई है तो कुछ ऐसे घोटाले जहां पर बोगस या अयोग्य कंपनियों को सरकार के टेंडर दिए गए हैं। कुछ ऐसे मामले जहां टैक्स चोरी करने वाली कंपनियों को खुलेआम चोरी करने दी गई तो कुछ ऐसे मामले जिनमें कंपनियों से हफ्ता वसूली की गई। लेकिन इन सब के अलावा कुछ ऐसे भी घोटाले हैं जिनमें आम आदमी की जिंदगियों के साथ खेल खेला गया।

अगर कोई इन्सान किसी बीमारी की वजह से मरता है तो लोग कहते हैं कि होनी को कौन टाल सकता है ये तो भगवान की मर्जी थी। लेकिन सोच कर देखिए कि अगर कोई इन्सान घटिया या खराब गुणवत्ता वाली दवाओं के कारण मरता है तो क्या इसे भगवान की मर्जी कहा जाएगा? कल्पना करके देखिए कि अगर सरकारी नियंत्रक किसी कंपनी की घटिया दवाओं की अनदेखी करते हैं और उसकी वजह से लोग मारे जाते हैं, सुनकर लगेगा कि ये किसी राजनीतिक षणयंत्र पर बनी थ्रिलर फिल्म का पार्ट है लेकिन अफसोस ये सच्चाई है जो भारत में घटी है।

रिपोर्टर प्रियंका पुला की दिसंबर 2021 में लाइव मिंट में प्रकाशित रिपोर्ट को देखिए, इस रिपोर्ट में नौ मई 2021 का एक किस्सा बयान किया गया है। देश में कोविड की दूसरी लहर छाई हुई थी। उत्तर प्रदेश के चिरंजीव हॉस्पिटल में काम करने वाले एनेस्थीसियोलॉजिस्ट (बेहोशी करने के विशेषज्ञ) डॉ. जीतेंद्र पाल को नर्सिंग स्टाफ से कॉल आती है। कॉल पर उन्हें बताया जाता है कि दो मरीजों में बड़े अजीबो गरीब लक्षण देखने को मिल रहे हैं, तेज बुखार के कारण वो कांप रहे हैं और अचानक से उनका ब्लड ऑक्सीजन लेवल तेजी से नीचे गिर गया है। इन दोनों मरीजों को एंटी वायरल दवा रेमडेसिविर का पहला शॉट दिया गया था। ये रिएक्शन दवा देने के एक घंटे के बाद उनमें देखने को मिला।

कमाल की बात ये थी कि ये कोई इकलौती घटना नहीं थी, कुछ ही दिन पहले जीतेंद्र पाल ने लाइफ लाइन हॉस्पिटल में भी वहां के चार मरीजों के साथ यही होते हुए देखा था। पड़ताल की गई तो पता चला कि इन दोनों हॉस्पिटल के मरीजों को एक ही बैच वी100167 की रेमडेसिविर दवा का डोज दिया गया था। ये दवा गुजरात स्थित मैन्यूफैक्चरिंग कंपनी जाइडस कैडिला द्वारा बनाया गया था। इस दवा को उत्तर प्रदेश सरकार ने इस कंपनी से लिया था लेकिन जैसे ही डॉक्टरों को पता चला कि मरीजों में रिएक्शन देखने को मिल रहे हैं उन्होंने इस बैच की दवाई को इस्तेमाल करना बंद कर दिया। डॉक्टरों ने कोविड मरीजों के परिजनों को बताया कि वे मरीज पर दूसरी दवाएं इस्तेमाल करें। जितेंद्र पाल ने लाइव मिंट को बताया कि एक बार उन्होंने ये दवा इस्तेमाल करना बंद की तो मरीजों की हालत में सुधार होने लगा। ऐसी ही कहानियां उत्तर प्रदेश के अनेक अन्य अस्पतालों से आ रही थीं। झांसी रानी लक्ष्मी बाई मेडिकल कॉलेज, मेरठ का लाला लाजपत राय मेडिकल कॉलेज, वाराणसी का आशीर्वाद और एपेक्स हॉस्पिटल।

डॉक्टर अनुज कुमार जो एक अन्य हॉस्पिटल में काम कर रहे थे ने भी 7 और 9 मई के बीच कई मरीजों में ऐसी ही समस्या के बारे में जानकारी दी। पांच मरीज जिन्होंने कैडिला जाइडस कंपनी के वी100156 बैच की रेमडेसिविर खरीदी थी उन्हें अचानक तेज बुखार हुआ और सांस लेने में दिक्कत होने लगी। डॉ. अनुज कुमार ने बताया कि हालांकि कोविड के लक्षण भी समान थे लेकिन यहां यह पहचानना और बताना काफी आसान था कि ये समस्या दवा के कारण हो रही थी। कुछ ही दिनों बाद अन्य राज्यों राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार से भी ऐसी ही खबरें आने लगीं, मरीज रेमडेसिविर लेने के बाद और बीमार पड़ जा रहे थे।

इन सभी दवाओं के बैच एक दूसरे से काफी समान थे, वी100153, 156, 166,170 और एल100148। इन सभी मामलों में एक ही कंपनी थी जिसने इन दवाओं का विनिर्माण किया था कैडिला। इन दवाओं को सरकार के स्वामित्व वाली कंपनियों ने कडिला जाइडस से खरीदा था। ढेर सारे अस्पतालों ने इस बात को लेकर आवाज उठाई लेकिन उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात के राज्य (दवा) नियंत्रकों ने ज्यादा कुछ किया नहीं सिर्फ बिहार के रेगुलेटर ने एक लाल झंडा उठाया यानी गुणवत्ता पर संशय व्यक्त किया। उन्होंने इस कंपनी बैच वी100167 की दवा की लैब में जांच कराई। जांच में पता चला कि दरअसल इन दवाओं में बैक्टीरियल एंडोटॉक्सिन (अंतर्जीव विष) मौजूद थे, वो यौगिक जिनके कारण बुखार हो सकता है और अधिक मात्रा में लिया जाए तो सेक्प्टिक (सडऩ पैदा) हो सकती है। जब ये बात सामने आई तो पटना में अक्तूबर 2021 में इस कंपनी के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज किया गया।

आंखें बंद किए बैठा रहा गुजरात एफडीसीए
दरअसल इस कंपनी की मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट गुजरात में थी और गुजरात का फूड एंड ड्रग्स कंट्रोल एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीसीए) की जिम्मेदारी थी कि वो ये जांच करता कि इस कंपनी की सारी दवाएं गुणवत्ता मानकों पर खरी उतर रही हैं या नहीं। सच्चाई ये है कि एफडीसीए ने ही जाइडस कंपनी को ये दवा बनाने का लाइसेंस दिया था। जब ये रिपोर्टें आने लगीं कि इनकी कुछ दवाएं अधोमानक गुणवत्ता वाली यानी घटिया हैं तो बिहार के रेगुलेटर ने गुजरात के एफडीसीए को भी सूचना दी थी। एफडीसीए की जिम्मेदारी थी कि इन बैचों की जांच करे लेकिन कोई जांच नहीं की गई। गुजरात रेगुलेटरी लैब के संयुक्त आयुक्त ने लाइव मिंट को बताया कि जो खराब दवाओं के बैच थे वो कभी उनकी लैब में जांच होने के लिए पहुंच ही नहीं पाए। गुजरात एफडीसीए के कमिश्नर से बार बार सवाल किया गया कि उनके विभाग ने संदिग्ध बैच की दवाओं की जांच क्यों नहीं की लेकिन कोई जवाब नहीं आया। देश के ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स कानून के अनुसार इस दवा की हर एक खराब बोतल को वापस लिया जाना चाहिए था लेकिन इसका भी कोई सुबूत नहीं है कि गुजरात की एफडीसीए ने उन दवाओं को लिया हो। कैडिला कंपनी से जब इस संबंध में प्रश्न पूछे गए तो उन्होंने इनकार किया।

डब्ल्यूएचओ ने मना किया था रेमडेसिविर का इस्तेमाल
इस कहानी में दिमाग को हिला देने वाला एक और सच बाकी है। यह सब होने से छह महीने पहले नवंबर 2020 में ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कह दिया था कि रेमडेसिविर को हमें इस्तेमाल नहीं करना है। डब्ल्यूएचओ ने 35 अलग अलग देशों के 450 अस्पतालों में 14 हजार से ज्यादा लोगों पर एक बहुत बड़ा अध्ययन किया था। अध्ययन में पाया गया था कि रेमडेसिविर कोविड के खिलाफ कामयाब नहीं है लेकिन फिर भी हमारी सरकार ने रेमडेसिविर को न केवल स्वीकृति दी बल्कि इसके उत्पादन को भी बढ़ाने की भी बात की। अप्रैल 2021 को सरकार से जारी की गई प्रेस विज्ञप्ति को देखने से पता चलता है कि इस दवा को एक अमेरिकन कंपनी ने विकसित किया था और भारत में सात कंपनियों को इस दवा के विनिर्माण का लाइसेंस जारी किया गया था।

सवाल उठता है कि इन सबका इलेक्टोरल बॉंड से क्या नाता है? बहुत तगड़ा नाता है लेकिन नाता जानने से पहले इस क्रोनोलॉजी को जानना जरूरी है। पहला विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा कि रेमडेसिविर को नहीं इस्तेमाल किया जाना चाहिए। दूसरा, मोदी सरकार ने डब्ल्यूएचओ की इस सलाह की अनदेखी की और इस दवा का प्रोडक्शन बढ़ाने की स्वीकृति दी। तीसरा, इस दवा को बनाने की अनुमति गुजरात एफडीसीए ने गुजरात की कैडिला जाइडस कंपनी को दी। चौथा पांच अलग अलग अस्पतालों ने रिपोर्ट किया कि रेमडेसिविर के खराब बैच के कारण कोविड मरीजों की हालत बद से बदतर हो गई। पांचवां, बिहार के रेगुलेटर ने पाया कि इस दवा में खराब बैक्टीरियल एंडोटॉक्सिस (विष) मौजूद थे, ये खराब गुणवत्ता वाली दवाएं थीं। छठा, इस सबके बावजूद गुजरात एफडीसीए ने इन खराब बैचों की कोई टेस्टिंग नहीं करवाई।

मोदी ने लोगों की जान की जगह इलेक्टोरल बांड को दी अहमियत
भाजपा की सरकार केंद्र और गुजरात दोनों जगह थी, और अब हमें इलेक्टोरल बॉंड्स के डेटा के जरिए पता चलता है कि जाइडस कैडिला कंपनी ने 18 करोड़ रुपये भाजपा को इलेक्टोरल बॉंड्स के जरिए दान किए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से केवल एक सवाल है कि आम इंसान की जान की भी कोई कीमत नहीं है क्या? इस कंपनी ने तीन करोड़ रुपये कांग्रेस को भी दान किए जो उस समय राजस्थान में सत्तासीन थी और आठ करोड़ रुपये भाजपा की सहयोगी सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा (एसकेएम) को दान दिए जो 2019 से सिक्किम में सत्ता में है। इस राजनीतिक दल को तो पांच कंपनियों से दान मिला था और उनमें से चार फार्मास्यूटिकल कंपनियां (जाइडस, टोरेंट, माइक्रो लैब्स और आईपीसीए) थीं।
सिक्किम को एक फार्मा हब माना जाता है और लगता है कि एसकेएम ने भी इसका पूरा फायदा उठाया। जाइडस कैडिला इकलौती ऐसी कंपनी नहीं है, इसके अलावा ग्लेनमार्क फार्मास्यूटिकल्स है। इसे घटिया दवाओं की वजह से 2022-23 के दौरान पांच नोटिस दिए गए। इनमें से चार नोटिस महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने दिए थे। इस कंपनी की रक्तचाप नियंत्रित करने वाली दवा टेलमा को घटिया बताया गया था। इलेक्टोरल बॉंड का डेटा सार्वजनिक होने पर सामने आया कि इस कंपनी ने नवंबर 2022 में 9.75 करोड़ के इलेक्टोरल बॉंड्स खरीदे थे और इन सभी बॉंड्स की रकम को भाजपा ने भुनाया।

प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ साल पहले फिट इंडिया मूवमेंट लॉंच किया था। क्या यही है मोदी का फिट इंडिया। गुजरात स्थित एक और कंपनी टॉरेंट फार्मा को देखिए, इसकी एंटी प्लेटलेट दवा डिप्लैट 150 सैलसिलिक एसिड टेस्ट में फेल रही थी। 2018 में महाराष्ट्र एफडीए ने इसे खराब गुणवत्ता वाली दवा बताया था। कंपनी की मैन्यूफैक्चरिंग यूनिटों में बार बार दवा के फेल होने पर अक्तूबर 2018 में अमेरिका के एफडीए ने भी इस कंपनी को चेतावनी दी थी। देखने को मिला कि मई 201 से जनवरी 2024 बीच इस कंपनी ने 77.5 करोड़ के इलेक्टोरल बॉंड्स खरीदे। इसमें से 61 करोड़ रुपये भाजपा के पास गया। अमेरिका तक ने जब इस कंपनी की दवाओं की गुणवत्ता को लेकर चेतावनी जारी की थी तो भारत में मौजूद एजेंसियों को भी कम से कम जांच तो करनी चाहिए थी लेकिन गुजरात में मौजूद भाजपा सरकार ने कोई एक्शन नहीं लिया। एक और बड़ी फार्मा कंपनी सिप्ला को उनकी दवाओं के कारण चार कारण बताओ नोटिस जारी किए गए। अगस्त 2018 में जांच की गई तो इस कंपनी का आरसी कफ सीरप जांच में खरा नहीं उतरा।

जुलाई 2021 में इसे दो बार अपनी रेमडेसिविर दवा को लेकर दो बार नोटिस दिए गए, जांच में पाया गया कि दवाओं में रेमडेसिविर की पूरी मात्रा नहीं है। अब हमें पता चला कि इस कंपनी ने 39.2 करोड़ रुपये के इलेक्टोरल बॉंड्स खरीदे थे, जिसमें से 37 करोड़ रुपये चंदा भाजपा को गया और महज 2.2 करोड़ रुपये चंदा कांग्रेस को गया। जिस समय इस मुंबई स्थित कंपनी ने बॉंड्स खरीदे थे उन तिथियों को देख कर आप क्रोनोलॉजी बेहतर ढंग से समझ पाएंगे। जुलाई और अक्तूबर 2019 में इस कंपनी ने इलेक्टोरल बॉंड्स खरीदे लेकिन नवंबर 2019 में भाजपा सत्ता से हट जाती है और उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के नए मुख्यमंत्री बनते हैं। ये जून 2022 तक सीएम बने रहते हैं उसके बाद भाजपा गठबंधन सरकार दोबारा से बनती है, और फिर हमें क्या देखने को मिलता है कि इस कंपनी ने नवंबर 2022 में दोबारा से इलेक्टोरल बॉंड्स खरीद लिए। चंदा दो धंधा लो ये जो स्कीम है ये इलेक्टोरल बॉंड घोटाले का महज एक हिस्सा है। आपको लगेगा कि चलो क्या जा रहा है हमारा, किसी कंपनी ने चंदा दे दिया और उसके बदले में धंधा मिल गया, बाकी कंपनियां का नुकसान हुआ होगा हमारा क्या जाता है।

जहरीला कफ सिरप बनाने वालों पर योगी सरकार रही मेहरबान
कुछ लोग तो ये भी सोच रहे होंगे कि जनता का पैसा है कंपनी को लूट लिया होगा कुछ अतिरिक्त धन दे भी दिया तो हमें क्या, लेकिन क्या इस केस को जानने के बाद भी आप हमें क्या? कहने की हिम्मत जुटा पाएंगे? एक कफ सिरप की दवा न सिर्फ बड़ों को बल्कि छह साल से ज्यादा उम्र वाले बच्चों को भी दी जाती है। दिसंबर 2022 की खबर पर नजऱ डालिए। उज़बेकिस्तान में 18 बच्चों की मौत भारत में निर्मित घटिया कफ सिरप पीने के कारण हो गई। अगले महीने जनवरी 2023 में डब्ल्यूएचओ ने इन बच्चों की मौत के पीछे दो कफ सिरप एंब्रोनॉल और डॉक 1 मैक्स से जोड़ा। लैब में जांच की गई तो पता लगा कि इन दोनों उत्पाद में डाइथाइलीन ग्लाकॉल और एथिलीन ग्लायकॉल की बहुत अधिक मात्रा मौजूद है। इन दोनों कफ सिरप का विनिर्माण उत्तर प्रदेश मौजूद कंपनी मैरिऑन बायोटेक द्वारा किया गया था और उज़बेकिस्तान में क्वारामैक्स मेडिकल के द्वारा वितरण किया गया था। केवल उज़बेकिस्तान ही इकलौता ऐसा देश नहीं था, गांबिया और कैमरून में भी दूषित कफ सिरप के कारण बच्चों की मौत की खबरें सुर्खियों में छाई थीं।

मैरिेओन बायोटेक के अलावा दो और भारतीय कंपिनयों का नाम यहां पर आता है, हरियाणा स्थित मेडन फार्मास्यूटिकल्स और मध्य प्रदेश स्थित रेमान लैब्स। कुल 141 बच्चों की मौत हुई जिसमें मैरिओन बायोटेक की दवा के कारण 68 बच्चों की मौत भी शामिल है। उज़बेकिस्तान में जब ये घटना हुई तो उनकी सरकार द्वारा क्या कार्रवाई की गई। उनकी सरकार ने क्वारामैक्स द्वारा आयात किए जाने वाले सभी ड्रग्स पर प्रतिबंध लगा दिया। वहां के न्यायालय ने जनवरी 2023 में क्वारामैक्स मेडिकल का लाइसेंस भी रद्द कर दिया, निर्णय दिया गया कि इस कंपनी की जो भी दवाएं बची हुई हैं उन सबको नष्ट कर दिया जाए। वहां के न्यायालय ने इस घटना के लिए जिम्मेदार ठहराए गए 23 लोगों को 2 से 20 साल तक कैद की सजा भी दी। सजा पाने वालों में क्वारामैक्स मेडिकल के भारतीय एक्जीक्यूटिव एक राघवेंद्र प्रतार सिंह भी थे, इन्हें बीस साल कैद की सजा सुनाई गई।

भारत में सेंट्रल ड्रग्स कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन के द्वारा मामले की जांच की गई। इस कंपनी द्वारा बनाए गए कफ सिरप के 22 नमूनों की जांच की गई और पाया गया कि सभी मिलावटी थे। समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने रिपोर्ट किया कि मैरिओन बायोटेक कफ सिरप में इस्तेमाल होने वाला यौगिक प्रोपाइलिन ग्लाइकॉल माया केमटेक नाम की ट्रेडिंग कंपनी से खरीद रही थी, इस कंपनी के पास फार्मास्यूटिकल्स ग्रेड सामग्री बेचने का लाइसेंस तक नहीं था, इसे सिर्फ इंडस्ट्रियल ग्रेड का लाइसेंस दिया गया था। फर्क ये है कि इंडस्ट्रियल ग्रेड का प्रोपाइलीन ग्लाइकॉल इंसानों के लिए जहरीला होता है, इसका इस्तेमाल पेंट इंडस्ट्री, लिक्विड डिटरजेंट या कोटिंग आदि में किया जाता है। माया केमटेक ने अपने बचाव में कहा कि उन्हें नहीं पता था कि दूसरी कंपनी उनके प्रोपाइलिन ग्लाइकोल को कफ सिरप बनाने में इस्तेमाल कर रही है।

सवाल उठता है कि मैरिओन बायोटेक ने आखिर ऐसा किया क्यों? इस कंपनी के तत्कालीन हेड ऑफ ऑपरेशंस तुहिन भट्टाचार्य ने रॉयटर्स से स्वीकार किया कि कंपनी वास्तव में इन कफ सिरप को बीते दस साल से निर्यात कर रही थी और इन दस सालों में उन्होंने कभी अपने प्रोपाइलिन ग्लाइकॉल को टेस्ट नहीं किया था। फार्मास्यूटिकल एक्सपोर्ट प्रोमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया ने मैरिओन बायोटेक का पंजीकरण सर्टिफिकेट दिसंबर 2022 में ही निलंबित कर दिया था। उत्तर प्रदेश की अथारिटीज़़ ने इस कंपनी का विनिर्माण लाइसेंस मार्च 2023 में रद्द किया और तीन कर्मचारी गिरफ़्तार भी किए गए। इस कंपनी के दो डायरेक्टर सचिन जैन और जया जैन के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की गई। लेकिन इसके बाद कहानी में आता है एक नया मोड़, उत्तर प्रदेश के पुलिस अधिकारी विजय कुमार बताते हैं कि इनके तीन कर्मचारियों को बाद में जमानत पर रिहा कर दिया गया। अप्रैल 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ऑर्डर देता है कि सचिन जैन और जया जैन के खिलाफ जब तक दोष साबित न हो जाए पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं करेगी।

अक्तूबर 2023 में रिपोर्ट आती है कि इस कंपनी को अपनी फैक्टरी दोबारा खोलने की अनुमति दे दी गई है। पता चला कि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने इस संबध में 14 सितंबर को एक ऑर्डर जारी किया था। ऑर्डर में कहा गया कि जिन उत्पादों में प्रोपाइलिन ग्लाइकॉल का इस्तेमाल होता है सरकार उन्हें बनाने की अनुमति नहीं देती लेकिन अन्य सभी उत्पाद बनाने और बेचने की अनुमति दी जा रही है।

यह भी इकलौता केस नहीं है, ठीक ऐसी ही कहानी एक और कंपनी को लेकर देखने को मिलती है। 13 सितंबर 2023 में दि इकोनॉमिक टाइम्स में प्रकाशित समाचार के अनुसार जनवरी 2020 मे जम्मू कश्मीर के ऊधमपुर जिले में करीब बारह बच्चों की मौत हो गई। इनमें से कुछ बच्चोँ की उम्र तो महज दो महीने की थी, कोई एक साल का था तो कोई दो साल का। इनकी मौत इसलिए हुई क्योंकि इन्होंने एक ऐसी कफ सिरप पी जिसमें डाईइथाईलिन ग्लाइकॉल की बहुत ज्यादा मात्रा मौजूद थी। ये कफ सिरप हिमांचल प्रदेश स्थित डिजिटल विजन फार्मा कंपनी ने बनाया था। जब जांच कराई गई तो पता चला कि ये भी अपनी दवाओं में इंडस्ट्रियल ग्रेड केमिकल्स का इस्तेमाल कर रही थी। इतने सारे बच्चों की मौत जैसे संवेदनशील मामले में चार्जशीट फाइल करने में तीन साल का समय लग गया। रिपोर्ट्स के अनुसार इस घटना के चार साल बाद भी बच्चों की मौत के लिए किसी को गुनाहगार नहीं ठहराया गया है। लेकिन इस घटना से पहले इस डिजिटल विजन फार्मा कंपनी को कई बार चेतावनी जारी की गई थीं। महाराष्ट्र और गुजरात के ड्रग रेगुलेटर ने कम से कम 16 अलग अलग चेतावनी इस कंपनी को जारी कीं। ऐसे उदाहरण आपको अन्य अनेक कंपनियों के भी मिल जाएंगे।

दिसंबर 2023 में सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन ने जब अलग अलग कफ सिरप की जांच की तो पाया गया कि 54 फार्मा कंपनियां ऐसी हैं जिनके कफ सिरप एक्सपोर्ट क्वालिटी टेस्ट में फेल हो गए। हमारे देश की कई सालों से साख रही है कि भारत को फार्मेसी ऑफ दि वल्र्ड कह कर पुकारा जाता है लेकिन पहले उन तीन कंपनियों ने इस साख को नीचे गिराया और फिर ये 54 कंपनियों के कप सिरप का जब विश्लेषण किया गया तो उससे देश की साख पर क्या असर पड़ेगा? ये सब सुन कर आपको लगेगा कि हमारी सरकार देश की फिक्र करती है, देश के लोगों की चिंता करती है तो निश्चित ही उसने कोई कड़ा कदम उठाया होगा। उसने गुणवत्ता सुधारने के लिए मानक और कड़े बनाए होंगे, ऐसे कानून पास किए होंगे जिससे कि दवाओं की गुणवत्ता सुधारी जा सके। लेकिन नहीँ, सच्चाई में सरकार ने कैसे कानून पास किए?

मोदी ने घटिया दवा बनाने वालों को हल्की सजा का बनाया कानून
3 अगस्त 2023 को हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित समाचार के अनुसार कम गुणवत्ता वाली दवाओं पर कम जुर्माना लगाए जाने का बिल सदन में पेश किया गया, यानी जो कंपनियां घटिया दवाएं बना रही हैं उन पर आसान सा जुर्माना ही लगाया जाए। 2 जुलाई 2023 को लोक सभा में जन विश्वास (सुधार) बिल पास हुआ, इसके अनुसार अभी तक 42 कानूनों के तहत कंपनियों द्वारा किए जाने वाले छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी में से निकाल दिया गया। पब्लिक हेल्थ एक्टिविस्ट दिनेश ठाकुर ने कहा कि ये गलत है, ऐसी चीजें अपराध की श्रेणी से बाहर नहीं की जानी चाहिए, कंपनियां लंबे अर्से से मांग कर रहीं थीं कि यदि घटिया दवाओं के कारण किसी के शरीर को क्षति पहुंचती है तो किसी को इसके लिए जिम्मेदार और सजावार न ठहराया जाए, ये बहुत ही ज्यादा गुड गर्वनेंस है। लेकिन सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात थी कि सरकार ने ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के सेक्शन 27 डी में जो बदलाव किए। अगर कंपनी लैब टेस्ट फेल करती तो पहले उसके प्रबंधन को एक से दो साल की कैद की सजा हो सकती थी, लेकिन अब अदालत के बाहर समझौता ही काफी है, यानी पैसा दो और मामला रफा दफा करो। ग्लेनमार्क और सिप्ला इकलौती कंपनी नहीं हैं जिन्होंने अपने लैब टेस्ट फेल किए हों और फिर इलेक्टोरल बॉंड्स के जरिए चंदा दिया हो।

महाराष्ट्र एफडीए ने घटिया दवाओं के लिए हेटेरो कंपनी को छह नोटिस जारी किए थे, इनमें से तीन इनकी रेमडेसिविर दवा को लेकर थे और बाकी तीन एंटीफंगल दावा, इटबोर कैप्सूल और बैक्टीरिया के संक्रमण में इस्तेमाल की जाने वाली मोनोसेफ दवा थी। पूर्व संयुक्त आयुक्त ड्रग्स हमें बताते हैं कि अगर कोई कंपनी नियमों की इस तरह धज्जियां उड़ा रही है तो उस कंपनी का लाइसेंस बड़ी ही आसानी से रद्द किया जाना चाहिए था, लेकिन यहां पर क्या हुआ? कंपनी ने चुपचाप इन खराब दवाओं को वापस लिया और इलेक्टोरल बॉंड्स खरीदे। उस वक्त तेलंगाना में सत्ता में पार्टी थी बीआरएस, हेटेरो गु्रप ने बीआरएस को इलेक्टोरल बॉंड़्स के जरिए 120 करोड़ रुपये का चंदा दिया। यहां तक कि जो कंपनी के संस्थापक और चेयरमैन थे पार्थसारथी रेड्डी, उन्हें तो बीआरएस ने राज्यसभा की सीट भी दे दी। महाराष्ट्र में जब 2022 में भाजपा सत्ता में आई तो इस कंपनी के 15 करोड़ कीमत के बॉंड्स को भाजपा ने भुनाया। घोटालों की सूची बहुत लंबी है, अभी तो सिर्फ फार्मा से संबंधित कंपनियों की बात की है।

प्रधानमंत्री मोदी की बेशर्मी तो देखो जब उनसे इलेक्टोरल बॉंड्स को लेकर सवाल किया जाता है तो कहते हैं कि थोड़ी इंपरफेक्शंस (कमियां) हो गई थीं। बहाना मारते हैं कि मोदी की वजह से पता चला कि किसको कितनी फंडिंग मिली। इलेक्टोरल बॉंड गुप्त राजनीतिक फंडिंग का एक तरीका था और जब सर्वोच्च न्यायालय ने इसे असंवैधानिक घोषित किया और खारिज कर दिया, उसके बाद ही हमें पता चल पाया कि किसने किसको कितना चंदा दिया। सच बात तो ये है कि अगर सर्वेाच्च न्यायलय ने इसे असंवैधानिक न घोषित किया होता तो आपका (भाजपा एवं मोदी) पर्दे के पीछे खेल अच्छे से चल रहा था। फार्मा कंपनियों ने कुल मिला कर 945 करोड़ रुपये का चंदा दिया था।
(ध्रुव राठी जागरूकता वीडियो बनाने वाले प्रसिद्ध यूट्यूबर हैं)

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Mazdoor Morcha
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