फरीदाबाद-गुडग़ांव मैट्रो की चर्चा चलती रहेगी, रेल नहीं चलेगी फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) कभी मंझावली पुल से जनता को होने वाले फायदों को गिनाते हैं तो कभी एफएमडीए से होने वाला लाभ और अब पिटारे से निकाल लाये हैं फरीदाबाद-गुडग़ांव मैट्रो रेल। करना-धरना कुछ नहीं केवल शगूफेबाजी से ही जनता को बहलाये रखना बहुत अच्छे से आता है भाजपाईयों को।
प्रति दिन आने-जाने वाले लाखों लोगों को खुशफहमी में रखने के लिये भाजपा सरकार बीते आठ-नौ साल से गाहे-बगाहे बयानबाज़ी करती रहती है। नि:संदेह भारी यातायात के चलते इस मार्ग पर आने-जाने वालों को काफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। लेकिन जो सपने भाजपा सरकार जनता को दिखा रही है उनके पूरे होने की कोई सम्भावना दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही। हां, बदरपुर महरौली के रास्ते मेट्रो में फरीदाबाद को गुडग़ांव से जोडऩे का काम निकट भविष्य में पूरा हो सकता है। विदित है कि मौजूदा पहाड़ वाली सडक़ बनने से पूर्व गुडग़ांव जाने का सडक़ मार्ग बदरपुर से महरौली होकर ही जाने का था।
इसमें कोई दो राय नहीं कि फरीदाबाद-गुडग़ांव को सीधे रेल मार्ग से जोडऩे का स्वप्न तो मंझावली पुल वाले से भी कहीं अधिक सुहाना है। परन्तु बड़ा सवाल इस पर खर्च होने वाले 6 हजार करोड़ का है। जो खट्टर सरकार मेडिकल छात्रों की बेतहाशा फीस बढ़ाने के बावजूद भी उन्हें पढ़ाने के लिये पर्याप्त फैकल्टी न दे सके, वेतन बचाने के लिये लाखों पदों को न भर सके, मेडिकल यूनिवर्सिटी को चलाने के लिये अनुदान की बजाय कर्जा देने लगे, वह सरकार 6 हजार करोड़ कहां से लायेगी?
वैसे यह भी कोई बहुत जरूरी नहीं कि इस मार्ग पर चलने वाली रेल को खंभोंं पर ही चलाया जाए। दरअसल खंभों पर अथवा भूमिगत चलाने की अनिवार्यता केवल वहां होती है जहां धरती पर जगह न हो। लेकिन इस मार्ग पर ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है।
इसलिये खंभोंं की बजाय धरती पर भी रेलवे लाइन बिछा कर काम चलाया जा सकता है। परन्तु यहां मकसद काम चलाने का तो है नहीं, केवल शगूफेबाज़ी करने का है जो ये सियासी लोग करते रहेंगे। इसके साथ-साथ मौजूदा सडक़ मार्ग को आवारा पशुओं तथा जगह-जगह विशेषकर शहरी क्षेत्रों में अवैध कब्जों से मुक्त करके भी यात्रियों की समस्या को का$फी हद तक हल किया जा सकता है। इसके साथ-साथ सार्वजनिक परिवहन यानी नाम मात्र को चलने वाली बसों की संख्या में पर्याप्त वृद्धि करके भी आसान किया जा सकता है।