फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) गांव दयालपुर में बीते करीब 10 साल से नर्सिंग कॉलेज खोलने का ढोल पीटा जा रहा है। अब कहा जा रहा है कि कॉलेज तैयार हो गया है और उद्घाटन की तैयारी है। साढ़े छ: एकड़ भूखंड पर 44 करोड़ की लागत से ‘हूडा’ विभाग ने इसके लिए भवन का निर्माण पूरा करके स्वास्थ्य विभाग को सूचित करते हुए इसका कब्जा लेने का आग्रह किया है। ‘मज़दूर मोर्चा’ का मानना है कि सम्बन्धित विभाग इसका कब्जा लेने की अपेक्षा इसके निरीक्षण के लिए एक टीम भेज कर निर्माण में कुछ कमियां बता कर, उन्हें दूर करने की बात कहते हुए अपना पल्ला झाड़ लेगा। अगले कई वर्षों तक यही खेल चलता रहेगा जिस पर करदाता का लाखों-करोड़ों रुपया तो बर्बाद होगा ही और बनी-बनाई बिल्डिंग का सत्यानाश होना भी शुरू हो जाएगा। नियमानुसार किसी भी नर्सिंग कॉलेज का निर्माण किसी बड़े अस्पताल के साथ होना जरूरी है, जबकि दयालपुर के आस-पास कोई भी अस्पताल नहीं है। हां, खानापूर्ति के लिए एवं नियमों को धता बताने के लिए छांयसा के उस अटल बिहारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल को जोड़ा जा सकता है जहां मरीज़ ही नहीं है। जोडऩे को तो इसे $फरीदाबाद के बीके अस्पताल से भी जोड़ा जा सकता है जो कि बिल्कुल निरर्थक होगा।
किसी भी नर्सिंग कॉलेज को चालू करने के लिए नर्सिंग काउंसिल ऑफ इन्डिया से स्वीकृति लेना आवश्यक होता है। काउंसिल कॉलेज भवन के साथ-साथ स्टाफ एवं अन्य आवश्यक सामग्रियों का निरीक्षण करने के पश्चात ही कॉलेज को चालू करने की स्वीकृति देती है। इसमें पढऩे वाले छात्रों का चुनाव भी मेडिकल कॉलेज की तरह नीट परीक्षा के द्वारा होता है। सुधी पाठक जान लें कि उद्घाटन का ढोल पीटने वाले यह नहीं बताते कि नर्सिंग काउंसिल ने इसे अपनी स्वीकृति प्रदान की है या नहीं? स्वीकृति तो काउंसिल तब प्रदान करेगी न जब उसे कोई निरीक्षण के लिए बुलाए। बुलाए तो तब न जब वहां कोई स्टा$फ हो, नर्सिंग की पढ़ाई के लिए आवश्यक साजो सामान हो।
विदित है कि इस तरह के कॉलेज के लिए एक प्रिंसिपल जिसके पास कम से कम एमएससी नर्सिंग की डिग्री हो तथा 30 शिक्षक भी लगभग इसी स्तर के होने चाहिए। इसके साथ-साथ अन्य सहायक स्टाफ तो होना ही चाहिए। लेकिन हरियाणा सरकार ने, खबर लिखे जाने तक इस कॉलेज के लिए किसी भी प्रकार के स्टाफ के लिए कोई पद स्वीकृत नहीं किए हैं और न ही 2025-26 के बजट में इसके लिए कोई प्रावधान किया गया है। जाहिर है इन सब बखेड़ों से बचने के लिए हरियाणा सरकार का डायरेक्टर मेडिकल एजुकेशन एन्ड रिसर्च बनी-बनाई बिल्डिंग को कब्जे में लेने से बचने को उपरोक्त रास्ता ही अपनाएगा। ————————————————————————————————————————————————————————————————–
ईएसआईसी का नर्सिंग कॉलेज प्लान भी ठप बीते वर्ष मोदी जी की इच्छा का हवाला देते हुए केन्द्रीय श्रममंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने $फरीदाबाद के ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज के साथ नर्सिंग कॉलेज इसी वर्ष चालू करने की घोषणा की थी। इसके लिए अस्थायी तौर पर सेक्टर 47 स्थित केन्द्रीय श्रम विभाग की इमारत जिसका अधिकांश भाग खाली पड़ा है, का चुनाव भी कर लिया था। परन्तु जब काम करने की नीयत न हो तो बिल्डिंग व पैसा किसी काम नहीं आता। नर्सिंग कॉलेज चलाने की घोषणा तो कर दी। इसके लिए राज्य सरकार से एसेंशियलिटी सर्टिफिकेट पाने का आवेदन भी कर दिया, इसकी जांच करने जब हरियाणा सरकार का अधिकारी आया तो उसने पाया कि स्टाफ तो स्वीकृत ही नहीं है। इसी आधार पर उनका आवेदन रद्द कर दिया गया। नर्सिंग काउंसिल तक आवेदन करने की नौबत ही नहीं आई क्योंकि एसेंशियलिटी सॢटफिकेट मिलने के बाद ही दिंसबर तक आवेदन दाखिल करना होता है। जिस नर्सिंग कॉलेज मेें इस वर्ष दाखिला शुरू हो जाना चाहिए था, कॉर्पोरेशन के निकृष्ट एवं हरामखोर अधिकारियों की काहिली के चलते नहीं हो सका। स्टाफ स्वीकृत करने मेें कोई पहाड़ नहीं तोडऩा था, विलायत की महारानी से परमीशन नहीं लेनी थी, मुख्यालय में बैठे चंद हरामखोरों ने चंद कागज ही तो काले करने थे, जो समय पर नहीं किए जाने से यह बनता-बनता काम बिगड़ गया। दुख तो इस बात का है कि मंत्री महोदय ने इसके लिए किसी को उत्तरदायी ठहराकर जवाब तलबी नहीं की। जानकार बताते हैं कि इतना सब कुछ हो जाने के बाद अब पिछले हफ्ते मुख्यालय ने कॉलेज के लिए पद स्वीकृत किए हैं। यानी कि फसल सूखने के बाद पानी लगा दिया। इस बीच एक चर्चा यह भी सुनने में आ रही है कि केन्द्रीय श्रम विभाग की जिस बिल्डिंग में ये कॉलेज प्रस्तावित था, उसके अस्थाई हस्तांतरण में भी मंत्रालय के किसी अधिकारी ने कोई अड़ंगा फंसा दिया है। मंत्री जी को कतई फुर्सत नहीं कि वे इस तरह की अड़ंगेबाजी व अपने निकम्मे अफसरों से निपट सकें। मानदंडों के अनुसार पीजीआईएमईआर (पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च) रोहतक को वर्तमान में 3,000 से अधिक नर्सिंग स्टाफ की आवश्यकता है। नर्सों पर अत्यधिक बोझ है और वे अक्सर आदर्श संख्या से तीन से चार गुना अधिक रोगियों की देखभाल करती हैं। अकेले इमरजेंसी वार्ड में हर वक्त करीब 3500 मरीज मौजूद रहते हैं, लेकिन ड्यूटी पर सिर्फ सात से आठ नर्स ही रहती हैं। इसका मतलब है कि एक नर्स एक बार में लगभग 50 मरीजों को सम्भाल रही है। न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में नर्सिंग एवं पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी है। इस कमी का लाभ उठाते हुए केरल सरकार ने अपने राज्य में इस क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं। इसके परिणामस्वरूप राज्य में बेरोजगारी तो दूर हुई सो हुई वहां के निवासी देश-दुनिया में काम करके अच्छी कमाई कर रहे हैं। यह छोटी सी बात केन्द्रीय व अन्य राज्य सरकारों की समझ में क्यों नहीं आती?