अचानक घरबंदी : मूर्खता का पूरा प्रदर्शन कर रही सरकार
मज़दूर मोर्चा ब्यूरो
पूरे मेक-अप के साथ मोदी जी टीवी के माध्यम से देश के सामने प्रगट होते हैं घोषणा कर देते हें कि रात के 12 बजे से पूरे देश में लॉक-डाउन हो जायेगा। आवागमन के तमाम संसाधन-रेल,बस, ट्रक जहाज आदि सब थम जायेंगे। लोग अपने घरों में ही बंद हो जायेंगे। कोई लक्ष्मण रेखा नहीं लांघेगा। कोरोना के संक्रमण से बचने के लिये, मान लेते हैं कि यह सब जरूरी भी है। परन्तु इस घोषणा को करने से पहले यदि बुद्धि का थोड़ा सा इस्तेमाल करते हुए यह भी सोच लिया जाता कि जिन गरीबों के घर ही नहीं हैं वे कहां जाकर बंद होंगे? लाखों की संख्या में जो मज़दूर सैंकड़ों हज़ारों मील दूर से आकर कहीं-कहीं मज़दूरी कर रहे हैं, वे कहां और कैसे रहेंगे? कच्ची मज़दूरी की बात तो छोडिय़े बड़ी-बड़ी कम्पनियों तक में ताले पडऩे से लाखों मज़दूर लगभग हर बड़े शहर में एकदम बेरोज़गार हो गये हैं।
मामूली से मामूली समझ रखने वाला भी यह समझता है कि हर शहर में आधे से अधिक कामगार बाहर से आकर रह रहे होते हैं। सब कुछ बंद होने की स्थिति में ऐसे लोगों का बेगाने शहरों में टिके रह पाना कठिन होता है। ऐसे में यह सब लोग अपने पैतृक ठिकानों-गांवों आदि की ओर लपकते हैं। लेकिन मोदी जी तो 20-20 घंटों काम करने में इतने व्यस्त रहते हैं कि उन्हें यह सब सोचने समझने का वक्त ही नहीं मिला और कर दी एकदम से घोषणा। यही घोषणा यदि योजनाबद्ध तरीके से की जाती तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता? यह घोषणा कोई नोटबंदी जैसी तो थी नहीं कि लोगों को समय मिलने पर वे अपने नोटों को ठिकाने लगा देते, वह बात अलग हैं कि अचानक घोषणा होने के बावजूद सबने अपना-अपना काला धन ठिकाने लगा दिया था।
लॉक-डाउन की घोषणा से पूर्व यदि दो-चार दिन का समय, लोगों को अपने-अपने ठिकानों तक पहुंचने के लिये दिया जाता और उनके परिवहन की उचित एवं पर्याप्त व्यवस्था कर दी जाती तो क्या आ$फत आ जाती? मोदी की इसी नासमझी के चलते देश के कोने-कोने में मौजूद करोड़ों प्रवासी मज़दूर गहरे संकट में फंस गये हैं। वे लोग सैंकड़ों मील के सफर पर पैदल ही छोटे-छोटे बाल-बच्चों के साथ निकल पड़े हैं। रास्ते में सरकार का सहयोग तो दूर कई नालायक पुलिस वाले उनके साथ मार-पीट करके अपने अहम को संतुष्ट करते हैं। रास्ते में पडऩे वाले गांवों में उन्हें घुसने नहीं दिया जाता क्योंकि सरकार ने उनको भी डरा रखा है।
प्रवासी मज़दूरों के घर वापसी के अलावा बड़ी मुसीबत उन ट्रक चालकों के लिये भी खड़ी कर दी गयी है जो कशमीर से माल लेकर चैनई गया था या त्रिवेंद्रम से माल लेकर देहरादून आया हुआ था अथवा ये लोग रास्ते में थे, इनका क्या होगा?
इतने लम्बे-लम्बे स$फर पांच से दस दिन तक या इससे भी अधिक के हो सकते हैं, ये लोग क्या करेंगे? इतना ही नहीं जो ट्रक जरूरी सामान-फल-सब्जि़यां, राशन, गैस आदि लेकर आ-जा रहे हैं उनको भी अनाड़ी एवं गैर जि़म्मेदार पुलिस वालों का शिकार बनना पड़ रहा है। विदित है कि हज़ारों मील के लम्बे सफर पर चलने वाले ट्रकों के जगह-जगह ठिकाने यानी ढाबे आदि सडक़ किनारे चलते थे, वे सब यकायक बंद कर दिये गये। ऐसे में किसी भी ट्रक का चल पाना असंभव नहीं तो आसान भी नहीं।