फरीदाबाद (म.मो.) बीते सप्ताह एनडीटीवी ने वीनस नामक एक स्थानीय कंपनी के उन 26 श्रमिकों की व्यथा कथा का बखान किया जिनके हाथ अथवा उंगलियां मशीनों की भेंट चढ़ चुके थे और अब लॉकडाउन के नाम पर उन्हें नौकरी से भी निकाल दिया गया। इस चैनल द्वारा लगातार दो दिन तक श्रमिक शोषण के इस मुद्दे को उठाया, जो अच्छी बात है, लेकिन हर बार इस मुद्दे को स्थानीय कांग्रेसी विधायक नीरज शर्मा के माध्यम से उठाते हुए उन्हें श्रमिकों का मसीहा स्थापित करने का कुत्सित प्रयास किया गया।
दिल्ली से सटे इस क्षेत्र की कवरेज करते समय चैनल ने एक बार भी यह बताने की जरूरत नहीं समझी कि आखिर यह कांग्रेसी विधायक चीज़ क्या है और श्रमिकों के दुख में इतना दुबला क्यों हुआ जा रहा है? सर्वविदित है कि सन् 2009 से 2014 तक इनके पिता शिवचरण शर्मा हरियाणा के श्रम मंत्री रहे थे इस दौरान नीरज शर्मा ने न केवल राज्य भर के श्रम विभाग को अपनी लूट कमाई का साधन बना लिया था, बल्कि अन्य महकमों में भी हाथ साफ करने से नहीं चूकता था। श्रम विभाग सीधे पिता श्री के आधीन होने के चलते नीरज ही यह फैसला लेते थे कि विभाग का कौन कर्मचारी/अधिकारी कहां तैनात होगा।
वैसे तो एक-आध अपवाद को छोड़ कर सभी श्रम मंत्री मलाईदार तैनातियों के लिये ‘पुडिय़ा’ लेते रहे हैं।
श्रम विभाग में प्रचलित एक विशेष कोड वर्ड है जिसे लेने व देने वाले बखूबी समझते हैं, यह पुडिय़ा तो केवल एक बार तैनाती के लिये ली जाती थी, उसके बाद तैनाती पर बने रहने के लिये नीरज शर्मा की अन्तहीन फटीकें भुगतनी पड़ती थी। किसी मामले में खुद मंत्री जी तो किसी में नीरज सीधे ही कम्पनी मालिकों से सांठ-गांठ करके मज़दूर हितों को बेच खाते थे। नहर पार विकसित हो रहे ग्रेटर फरीदाबाद में बड़े पैमाने पर बिल्डर इमारतों का निर्माण कार्य कर रहे थे। मंत्री महोदय अपने फैक्ट्री विंग के अफसरों पर बेजा दबाव डाल कर आसामियां बुलवा कर काटते थे। इसके बदले उन्हें सुरक्षा एवं श्रम सम्बन्धी कानूनों की उल्लंघना करने की पूरी छूट थी जिसके चलते आये दिन कोई न कोई मज़दूर मारा जाता था।
भवन निर्माण के अलावा फैक्ट्रियों में भी इसी तरह सुरक्षा नियमों की धज्जियां उड़ाई जाती थी जिस कारण न केवल वीनस के उक्त 26 श्रमिक विक्लांग हुए बल्कि उस दौरान आये दिन किसी न किसी फैक्ट्री में मज़दूर अपने हाथ-पांव कटवा बैठते थे और कई बार तो जान से भी हाथ धो बैठते थे। सुरक्षा नियमों की अनदेखी के अलावा इन दुर्घटनाओं का दूसरा बड़ा करण अनट्रेंड हैल्पर से ऐसी मशीनें चलवाना जिनके लिये वह ट्रेंड नहीं होता। ट्रेंड ऑपरेटर की अपेक्षा हैल्पर सस्ता होने की वजह से उत्पादन लागत कम पड़ती है।
गौरतलब है कि उक्त 26 श्रमिकों में अपवादस्वरूप इक्का-दुक्का मज़दूर ही नया होगा वरना सारे के सारे उस काल के मारे हुए हैं जब नीरज के पिता संवैधानिक तौर पर मज़दूर हितों के संरक्षक बन कर मज़दूरों का लहू पीने में लगे हुए थे। आज जो बात करते हैं कि अंग-भंग होने पर उन्हें मुआवजा क्यों नहीं दिया गया? मुआवज़े के बदले केवल नौकरी ही क्यों दी गयी? यह सवाल तो तत्कालीन श्रम मंत्री शिवचरण लाल शर्मा पर भी तो बनता है, वे उस वक्त क्या कर रहे थे? उन्होंने क्यों नहीं मज़दूर को मुआवज़े के साथ-साथ उन्हें पक्की नौकरी दिलाई?
चैनल पर मज़दूर यह भी कहते सुने गये कि ईएसआईसी उन्हें नाम मात्र की पेंशन देकर उनका मज़ाक उड़ा रही है। बात तो उन बेचारों की बिल्कुल दुरूस्त है, परन्तु उस समय श्रम मंत्री होते हुए उन्होंने इस मुद्दे को ईएसआईसी के साथ क्यों नहीं उठाया? विदित है कि ईएसआईसी के तमाम सेवायें केन्द्रीय एवं राज्य के श्रम मंत्री के आधीन आती हैं। श्रम मंत्री होते हुए उन्होंने कभी ईएसआई अस्पतालों व डिस्पेंसरियों की दुर्दशा की ओर ध्यान देने की कभी फुर्सत नहीं मिली। जबकि यह सेवा पूर्णतया उनके आधीन थी। इसके लिये उनका मंत्रालय बजट बनाता था मात्र 100-125 करोड़ का, जबकि जरूरत होती थी 500-600 करोड़ की। इसके लिये राज्य सरकार को मात्र आठवां भाग देना होता है शेष सारा कार्पोरेशन खर्च करता है। परन्तु मंत्री जी ने कभी इसकी सुध नहीं ली।
विधायक नीरज की समस्या
जिस नीरज ने बिना विधायक होते हुए पिता श्री के राज में मोटी मलाई खा रखी हो और आज विधायक बनने के बावजूद उसकी टके सेर भी पूछ न हो तो बेचारा क्या करे? सत्तारूढ दल के विधायक तो सत्ता की धौंस- पट्टी के बल पर या कोई पद हथिया कर अपने लिये मोटी न सही छोटी मलाई का जुगाड़ कर लेते हैं। परंतु विपक्षी विधायक कहां जाये, क्या करे? लिहाजा उसने सरल उपाय
खोज निकाला, अपना वही पुराना श्रम विभाग।
जब सत्ता का डंडा हाथ में न हो तो मज़दूरों को ही जैसै-तैसे बेवकूफ बना कर अपने इर्द-गिर्द जोड़ो। इसके लिये नीरज ने सर्वप्रथम जेसीबी के गेट पर, 104 निकाले गये कर्मचारियों को बांधना चाहा। इसके लिये उन्होंने गेट पर रामायण पाठ की नौटंकी शुरू की।
जेसीबी के कर्मचारी तो दो-चार दिन आकर पूरा खेल समझ गये। इसके बाद नीरज ने वीनस के उक्त विक्लांगों को अपने साथ जोडऩे का प्रयास किया। इन मज़दूरों को अपना जलवा-दिखाने के लिये नीरज ने एनडीटीवी के एक संवाददाता को पटा कर उनका मामला राष्ट्रीय स्तर पर उछाल दिया। ऐसा करने से न केवल वीनस के बल्कि अन्य मज़दूरों को भी जाल में लपेटना आसान हो जायेगा, साथ ही श्रम विभाग पर भी कुछ हद तक धाक जम ही जायेगी।