विधायक, घर से दफ्तर तक के चक्कर कटवाता है पर मना नहीं करता कि खाना नहीं दूंगा, खाना मिलता भी नहीं।

विधायक, घर से दफ्तर तक के चक्कर कटवाता है पर मना नहीं करता कि खाना नहीं दूंगा, खाना मिलता भी नहीं।
April 20 05:09 2020

मोदी जी भी बोले तो बहुत, पर कहा कुछ नहीं!

ग्राउंड जीरो से विवेक कुमार की रिपोर्ट

 

कोरोना का असर भारत में अपने पैर तेजी से पसार रहा है, ठीक वैसे ही जैसा पूरी दुनिया के उन देशों में पसारा जिनकी सरकारों ने इस महामारी को बातों में टालने या इसकी गंभीरता को छुपाने में समय लिया। करोना के साथ करोड़ों बेरोजगार हुए लोगों को प्रशासनिक बदइन्तजामी का भयानक दौर भी भुगतना पड़ रहा है। अब यदि इसमें मात्र कोरोना को दोषी बनाया जाए तो लोक कल्याण की अवधारणा पर बात ठीक नहीं उतरती।

एक विडियो सोशल मीडिया पर वायरल किया गया जिसे मेरठ की गाँधी कालोनी का बताया गया। विडियो में एक तिलकधारी लडक़ा बढिय़ा प्रेस की हुई एलेन सोली की कमीज पहने अपनी गाड़ी में खाने के डिब्बे दिखाता है। ये लडक़ा बस्ती की झुग्गियों में घुस-घुस कर जो खाना गरीबों ने जमा किया हुआ है उसको दिखा कर वहां के लोगों पर खाने की जमाखोरी का लांछन लगाता है। सतही रूप से देखने वाले हमारे समाज ने एक नजर में करोना लॉकडाउन के मारे गरीबों को जमाखोर और न जाने क्या-क्या कहना शुरू कर दिया। कुछ ने कहा कि पका खाना जो खराब होगा उस तक को भी इन लोगों ने जमा कर रखा है। जबकि सच्चाई बिल्कुल वैसी नही है।

लॉकडाउन की अकस्मात् घोषणा से उपजे डर को सबने अपने-अपने तरीके से व्यक्त किया। जिसके पास पैसे की ताकत थी उसने राशन भर लिये और जिसके पास नहीं थी वह जो मिल रहा है उसे जमा करना चाहता है। क्योंकि आगे की राह कैसी होगी इसकी अनिश्चितता सभी के मन में है।

क्या मजदूर सिर्फ खाना न मिलने से हैं परेशान?

 सेक्टर 11 और 12 फरीदाबाद को अलग करने वाली सडक़ पर भाजपा विधायक नरेन्द्र गुप्ता का दफ्तर है। 15 अप्रैल की दोपहर दो बजे कुछ मजदूरों का एक झुण्ड उनके दफ्तर के बाहर खड़ा था। सभी के चेहरे धुप में लाल थे। आँखे, माथे से बहते पसीने को सँभालते-सँभालते लाल हो गई थीं, मुंह सूख कर काँटा होता जा रहा था और जबान बार-बार होठों को चाट कर गीला कर रही थी ताकि बोल सके। एक ने नाम बताया प्रमोद।

45 वर्ष के प्रमोद फरीदाबाद की एक फैक्ट्री में काम करते थे। लॉक डाउन होने से सपरिवार फंस गए हैं। मामूली तनख्वाह पाने वाले प्रमोद जो ओल्ड फरीदाबाद में रहते हैं के पास पैसे से लेकर राशन सब समाप्त हो चुका है। थाने गए तो पुलिस ने कहा अपने पार्षद या विधायक से जा कर मांग, वही देंगे।

प्रमोद, अन्य कई साथियों को साथ लिए अपने क्षेत्र के विधायक नरेन्द्र गुप्ता का पता लगाते हुए सेक्टरों की ठोकर खाने लगे। किसी ने सेक्टर -15 भेजा तो किसी ने कहा सेक्टर -9 में उनका घर है। अंत में सेक्टर 11-12 को अलग करने वाली सडक़ पर उनका दफ्तर मिला। पर खाना नहीं मिला। प्रमोद ने बताया, ओल्ड फरीदाबाद से कई जगह पुलिस से बचते और मार खाते यहाँ पहुंचे हैं, अब यहाँ कोई है ही नहीं और जो गार्ड हैं वो कहते हैं कि खाना वहीं मिलेगा जहाँ रहते हो।

विधायक के दफ्तर के बाहर तीन मोबाइल नंबर चिपकाए पडे हैं जिन पर लिखा है कि अति आवश्यक कार्य हो तो संपर्क करें। दिए गए नम्बर का एक व्यक्ति सनी सिंह भी सामने ही खड़ा था और मजदूरों को यह बता रहा था कि कैसे उनके इलाके में खाना पहुँच जाएगा। जबकि उसके सामने ही दसियों भूखे मजदूर खड़े थे। खैर, सनी सिंह ने मजदूर प्रमोद का नंबर लेकर उन्हें चलता किया, यह कहकर कि आपके वार्ड में तैनात हमारा नुमाइंदा कल आएगा खाना देने; जबकि, तब से प्रमोद और साथियों को विधायक की तरफ से कोई न फोन गया न खाना।

पुन: फोन पर हुई बातचीत में प्रमोद ने बताया कि सिर्फ राशन नहीं मिलता तो अलग बात है पर असल समस्या है कि कोई जवाब ही नहीं मिलता। कोई कहता है इस वार्ड में जाओ तो कोई उस वार्ड में भेजता है, वार्ड के नंबर बताते हैं पुलिस वाले लोग, पर किसी भी वार्ड का सही पता नहीं बताता कोई। विधायक, घर से दफ्तर तक के चक्कर कटवाता है पर मना नहीं करता कि खाना नहीं दूंगा, खाना मिलता भी नहीं। मोदी ने थाली बजाने को बोला था, बजाई, दिया जलवाया था तो वह भी जलाया। अब और क्या करूँ?

क्या मोदी को लोग सुनते भी हैं?

14 अप्रैल को मोदी ने टीवी पर आ कर हमेशा की ही तरह बस बोला, पर कहा क्या किसी को नहीं पता। एक तरफ मोदी संबोधन में सभी से गरीबों का ख्याल रखने की बात कह रहे थे दूसरी तरफ इसी भाजपा शासित राज्य हरियाणा के फरीदाबाद बाईपास पर गरीबों को उनके कमरेनुमा घर खाली करने का हुक्म उन महान मोदी का दम भरते देशभक्तों ने दे दिया जिन्होंने मोदी जी के कहने से दिए जला कर संकल्प उठाये थे।

23 वर्षीय पूजा जिसे मैंने किसी के माध्यम से कभी राशन पहुँचाया था, का फोन रात के पहले पहर आया। घबराई हुई आवाज में बोली भईया हमारी मदद करो। पूछने पर बताया, मकान मालिक ने गालियां दी हैं और कहा, या तो किराया दो या मैं तुम लोगों का सब सामान रख लूँगा। ये कहकर मकान मालिक ने धमकी भी दी कि दो दिन में यदि नहीं खाली किया तो वह खुद ही सबको पीट कर निकाल देगा कमरे से। अब पूजा दो दिन बीत जाने का इंतजार कर रही है। उसके बाद क्या होगा नहीं मालूम।

पूजा जैसे सैकड़ों परिवार फरीदाबाद बाईपास की झुग्गियों में फंसी पड़ी है। इनमे से एक कौशल्या का रोज खाना खाने का बंदोबस्त उन घरों की दया पर निर्भर करता है जिनमे कौशल्या काम करती हैं। तीन दिन के अंतराल पर अलग-अलग घर में जाती हैं ताकि कुछ राशन ला सकें। पुलिस वाला जाने नहीं देता तो बहुत लम्बी दूरी तय कर पहुंचती हैं। जिस 9 सेक्टर में पहले 15 मिनट पैदल चल कर पहुंचती थीं वहां अब दो-दो घंटे का चक्कर लगाना पड़ता है ताकि पुलिस न देख ले। लॉकडाउन बेशक जरूरी भी है, लेकिन पुलिस इन्हें घर से निकलने दे यह भी एक आवश्यकता है; खायें  क्या, इससे बड़ा सवाल भूखे के लिए कोई दूसरा तो नहीं हो सकता।

अमित शाह के फर्जी दावे

गृहमंत्री अमित शाह कोरोना के मौसम में ऐसे गायब हुए हैं जैसे आजकल आसमान से जहाज। फर्क मात्र इतना था कि जहाजों पर रोक लगने से वे थम गए, पर गृहमंत्री खुद ही गायब हुए। चुनावों के मौसम में उनके लौटने की उम्मीद है। या फिर जब लॉकडाउन खुलेगा तब चुनी हुई सरकारों को चुन-चुन कर गिराने के लिए तो जरूर वह बरसाती मेंढक की तरह बाहर आएँगे। इस बीच उनका एक बयान आ गया है, जिसमे गृहमंत्री से कहा कि देश में खाद्यान्न और दवाइयां भरपूर मात्रा में हैं और जनता को घबराने की जरूरत नहीं। ये बयान ऐसा ही था जैसा शादी में फूफा जी सबको गाते देख कर खुद भी एक घिसा-पिटा सा शेर मार दें।सच्चाई यह है कि बेशक खाद्यान्न के भण्डार भरे हुए हैं पर भंडारण और वितरण की उचित व्यवस्था न होने के कारण काफी अनाज सडऩे को मजबूर है।

फरीदाबाद-बल्लभगढ़ में फंसे बिहार किशनगंज के सैकड़ों मजदूरों में एक अजमल ने अपने गाँव वाले लडक़े जो पुरानी दिल्ली के एक रईस परिवार के घर में खाना बनाने का काम करता है, के मार्फत उसके मालिकों को अर्ज पहुचाई। इस अर्ज में उन्होंने बताया कि वे कई रोज से खिचड़ी खा कर जी रहे हैं और अब वह भी समाप्त है। बल्लभगढ़ की राजीव कॉलोनी जो जेसीबी चौक के पीछे बसी है, में अफजल और हजारों मजदूर इसी हाल में हैं। अजमल को तो दिल्ली की शीबा फहमी नामक भद्र महिला ने राशन पहुंचवा दिया पर बाकी गरीब इस देश में भूखे मरने को मजबूर हैं।

रही बात अमित शाह की दवाइयों वाले बयान की। तो कोरोना की दवा फिलहाल बनी नहीं है और जिन बीमारियों की दवाएं हैं उनका इलाज ही आजकल ठप पड़ा है अस्पतालों में। ऐसे में किस दवा की कमी-बेसी की बात गृहमंत्री बरसाती मेंढक वाले अंदाज में बोल गए, ये वही जानें।

फरीदाबाद की हालत यह है कि हरियाणा के उच्च कोरोना प्रभावित क्षेत्र में इसका नाम है और साथ ही फरीदाबाद-बल्लभगढ़ में फैक्ट्रियों के हजारों मजदूर और ऐसे गरीब जो घरों में साफ सफाई करके या दिहाड़ी से जीवन निर्वहन करते हैं, भूखों मरने की तरफ बढ़े जा रहे हैं।

कोरोना और भूख से मरने वालों में प्रतियोगिता

कोरोना से अब तक भारत में मरने वालों की संख्या 500 पार हो गई है। जबकि इससे संक्रमित लोगों की संख्या 1500 से ऊपर हो गई है। यानी कि मृत्यु की आशंका 3 प्रतिशत के लगभग। वहीँ कोरोना के नाम पर अपनी बिना तैयारी और चेतावनी के लॉकडाउन में भारत सरकार लगभग 200 गरीबों की जान ले चुकी है। राजेश और कनिका के “द प्रिंट” में दिए आंकड़ों पर यकीन करें तो भूख से मरने वालों, चिकित्सीय सुविधा न मिलने और भूख के कारण आत्महत्या करने वालों की संख्या ही 50 से ऊपर है।

वहीं करोना भगदड़ में फंसे 35 लोगों को सडक़ पर वाहनों ने कुचल दिया। न जाने कैसे वाहन चालक थे जिनको लाइसेंसे मिला गाड़ी का और जो इतनी खाली सडक़ पर भी लोगों को कुचल पाने में सफल रहे। मरने वाले अधिकतर लोग वही गरीब हैं जो सैकड़ों किलोमीटर पैदल अपने घर जा रहे थे। 39 लोगों ने मात्र इस लिए आत्महत्या कर ली क्योंकि उन्हें शक था कि वे कोरोना से संक्रमित हैं।  21 अन्य लोगों की मौत के मिलेजुले कारण हैं।

विश्व में कोरोना के कन्फर्म केस 21 लाख 65 हजार हैं जिनमे से एक लाख पैन्तालिस हजार की मृत्यु हुई है। जबकि लगभग 40 करोड़ लोग इस वक्त अकेले भारत में करोना जनित लॉकडाउन से बेरोजगारी और भुखमरी के सीधे संपर्क में है। ये सभी असंगठित क्षेत्र के प्रवासी मजदूर हैं। इनमे मरने वालों की संख्या क्या हो सकती है इसका अंदाजा भर ही आपके रोंगटे खड़े कर देने के लिए काफी होना चाहिए। बशर्ते उस स्थिति को सोचा जा सके।

सरकार के पास कोई प्लानिंग है?

प्लानिंग का सच है कि नाड़ी पकडक़र रोग के इलाज बताने वाले हकीम के अंदाज में अपनी रणनीतियां पेश करने वाले मोदी के पास इस महामारी से गरीबों को बचाने की कोई तैयारी ही नहीं है। कार्यप्रणाली में मोदी के चरणों का अनुसरण करने वाले हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर के पास एकमात्र प्लान है मोदी स्टाइल में बकैती करना।

एक दिन खट्टर भी टीवी पर अपनी ट्रॉपिकल फारेस्ट स्टाइल की मूंछों की ट्रिमिंग करवा विवाहित दम्पतियों को कैसे आपस में सामंजस्य बैठाना चाहिए, सिखा रहे थे। इतना ही नहीं, दिल के दर्द को छलकाते हुए बताया की उन्हें ऐसा सुख न प्राप्त होने का कितना मलाल है। इसलिए हे पतियों, अपनी पत्नियों का घरेलू कामों में हाथ बंटाओ।

इस भरी भसूड़ी में सूबे का मुख्यमंत्री और देश का प्रधानमन्त्री सत्संग मोड में फिर रहे हैं वो भी अलग-अलग डिज़ाइन के गमछे लपेटे या लखटकिया जाकेट बदलते। जबकि इन्ही की आँखों के सामने एक-एक कर सब ध्वस्त हो रहे हैं कामकाज और देश के लोग खून के घूँट पी-पी कर इनकी थोथी मन की बातें सुनने को मजबूर हो रहे हैं। और अभी तो शुरुआती दिन हैं।

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Mazdoor Morcha
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