इतने वर्ष में योजना में हुआ यही है कि बीएसएनएल के नाम से सेवाओं को बर्बाद कर उसकी साख को गिराया फिर दूसरे चरण में बीएसएनएल को कलंक बता जिओ जैसी निजी कंपनी को घुसाया और अब शर्तिया तीसरे चरण में बीएसएनएल को निकाल बाहर किया जाने के बाद बेच दिया जाएगा। और इस तरह भारतनेट परियोजना का नया नामकरण होगा ‘मुकेश अम्बानी भाई परियोजना।

इतने वर्ष में योजना में हुआ यही है कि बीएसएनएल के नाम से सेवाओं को बर्बाद कर उसकी साख को गिराया फिर दूसरे चरण में बीएसएनएल को कलंक बता जिओ जैसी निजी कंपनी को घुसाया और अब शर्तिया तीसरे चरण में बीएसएनएल को निकाल बाहर किया जाने के बाद बेच दिया जाएगा। और इस तरह भारतनेट परियोजना का नया नामकरण होगा ‘मुकेश अम्बानी भाई परियोजना।
September 05 14:36 2020

फरीदाबाद के गांवों में डूब रहा है बीएसएनएल, मलाई काट रहा है जिओ… किसने तैयार की जमीन

विवेक कुमार की ग्राउंड रिपोर्ट

फरीदाबाद : सरकारी कम्पनी बीएसएनएल की बर्बादी फरीदाबाद के गांवों में भी शुरू हो चुकी है। मुकेश अम्बानी की कम्पनी जिओ फाइबर फरीदाबाद के गांवों तक जा पहुंची है। हाल ही में मजदूर मोर्चा ने जिले के सबसे बड़े गांव तिगांव और सोतई का दौरा कर पाया कि बहुत जल्द फरीदाबाद के गांवों में बीएसएनएल का नामोनिशान मिट जायेगा। बीएसएनएल ने गांवों में आप्टिकल फाइबर का जो जाल बिछाया था वो बर्बाद हो चुका है। जबकि असली मलाई जिओ काट रहा है।

आजादी की 74वीं वर्षगाँठ के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि अगले तीन साल में देश के 6 लाख गाँवों में इन्टरनेट का जाल बिछ जाएगा। मोदी ने यह भी कहा कि उनकी पहली सरकार के आने के कार्यकाल तक मात्र 60 गाँव में ही ऑप्टिकल फाइबर था। पर जबसे मोदी जी की सरकार बनी है तबसे अब तक डेढ़ लाख गाँव में ऑप्टिकल फाइबर पहुँच चुका है। सच्चाई है कि भारतनेट कार्यक्रम की शेखियां बघारते हुए पिछली मोदी सरकार में उनके खुद के संचार मंत्री रहे मनोज सिन्हा ने 2018 में ट्वीट किया था कि 2019 तक कोई भी गाँव ऐसा नहीं होगा जो हाई स्पीड इन्टरनेट से जुड़ा नहीं हो। इसी प्रकार रविशंकर ने 2019 में घोषणा की थी कि मार्च 2019 तक भारत के सभी इलाकों में फाइबर नेट/वाईफाई होगा।

अब मोदी जी ने कहा कि ये नयी योजना है जिसे तीन साल में पूरा कर देंगे। वैसे खुद प्रधानमन्त्री ने 2014 में लाल किले से दिए अपने भाषण में गाँव को इन्टरनेट से जोडऩे की योजना की बात कही थी। खैर झूठ के पंख भी होते हैं जिससे वो उडक़र 2020 में आ जाता है। 6 लाख गाँव में नेट जब पहुंचेगा तब पहुंचेगा, पर प्रधानमन्त्री आवास से चंद किलोमीटर दूर फरीदाबाद और इसके ग्रामीण इलाकों में नेट ने पहुँच कर क्या कुछ धमाल मचाया है इसे जानते हैं।

सोतई फरीदाबाद स्थित सरकारी स्कूल में बीएसएनएल के फाइबर ऑप्टिकल का बक्सा तो लगा है पर उसमे कनेक्टिविटी नहीं है। एक शिक्षक ने बताया कि कुछ रोज पहले बीएसएनएलन नार्थ जोन के डीजी दौरे पर आये थे तो उनके साथ आये अधिकारी ने बताया कि बीच में फाइबर केबल टूटी पड़ी हैं जिस वजह से कनेक्टिविटी संभव नहीं हो सकती। थोड़ा आस-पास देखने पर पाया कि बहुत सारे फाइबर केबल के टुकड़े लोगों के घरों में कपड़े सुखवाने में मदद कर रहे हैं तो कुछ जगह भैंस गाय को रोकने में भी।

राहुल, फरीदाबाद के सबसे बड़े गाँव तिगांव में साइबर कैफे चलाते हैं और उन्होंने बताया कि उनके पास दो साल तक बीएसएनएल का कनेक्शन था पर दो साल में मुश्किल से सिर्फ 6 महीने ही बीएसएनएल का नेट चला होगा। बेकार सर्विस और कनेक्टिविटी के कारण मजबूरन उन्हें निजी कंपनियों का कनेक्शन लेना पड़ा है। बीएसएनएल के मुताबिक गाँव भर में सस्ता इन्टरनेट देने के लिए ऑप्टिक फाइबर केबल बिछा दिए गए हैं, लेकिन वाईफाई देने का काम बीबीएनएल का है। इसलिए पूरे इलाके में कितने कनेक्शन चल रहे हैं इसकी जानकारी भी बीएसएनएल के पास नहीं है। इस योजना के तहत 100-200 रुपये में ही गाँव तक इन्टरनेट को पहुँचाना था।

2017-18 में ग्रामीण विकास मंत्रालय ने मिशन अन्त्योदय सर्वे के तहत बताया कि देश में 16 प्रतिशत घर ऐसे हैं जहाँ 1-8 घंटे बिजली रहती है तो 33 प्रतिशत घर ऐसे हैं जहाँ बिजली 9-12 घंटे चमकती है। 12 घंटे बिजली आपूर्ति पाने वाले घरों की संख्या 42 प्रतिशत ही है।

वहीं 2017-18 के नेशनल सेम्पल सर्वे में मालूम पड़ा कि देश में मात्र 24 प्रतिशत लोगों के पास ही नेट की सुविधा है जबकि 66 प्रतिशत गाँव में रहने वाली आबादी में 15 प्रतिशत के पास ही नेट है। सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि अनुच्छेद 19 और 21 की ही तरह इन्टरनेट भी एक मौलिक अधिकार है। पर जमीन पर इस मौलिक अधिकार को किस तरह रौंदा जा रहा है देखा जा सकता है।

13 अगस्त 2020 की इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट बताती है कि बीएसएनएल को दूसरी बार टेंडर कॉल करने पर भी ऑप्टिकल फाइबर के रख रखाव के लिए कोई बिडर नहीं मिला इसलिए मेंटेनेंस का काम रुका पड़ा है। यह टेंडर बीते अप्रैल माह में निकाला गया था और पहले  भी एक बार बिडर के अभाव में टेंडर कैंसिल हो गया।  इसका मतलब है कि पिछले लगभग एक वर्ष से ऑप्टिकल फाइबर केबल की मेनटेनेंस ही नहीं की, और आगे न जाने कब तक नहीं होगी।

बीएसएनएल के हाल देशवासियों को पता ही होंगे कि उसके कर्मचारी बिना तनख्वाह पाए ही काम करने को मजबूर हैं। पर भारत नेट और बीएसएनएल की अन्य योजनायों को देखते हुए लगता नहीं कि अब इन कर्मचारियों के पास काम करने को कुछ खास बचा है।

वैसे भाजपा के सांसद अनंत हेगड़े ने इन कर्मचारियों को देश पर कलंक के साथ- साथ गद्दार और देशद्रोही भी बता दिया है। गद्दार का पता नहीं पर हाँ इस संस्था के कर्मचारी अपनी रीढ़ जरूर फेंक आये हैं वरना खुद के लिए ऐसा सुनने के बाद भी बिलों में दुबके रहना उनकी आदत न होती।

इसी तर्क के तहत हेगड़े ने बीएसएनएल को बेच देने की बात कही। वैसे हेगड़े की इस परिभाषा पर खरीद फरोख्त हो तो ये देश ही बेचना पड़ जाएगा।

कोरोना काल में पढ़ाई भी इन्टरनेट के भरोसे हैं, ऐसे में बच्चों और गाँव की गरीब जनता के पास जहाँ बीएसएनएल का सस्ता इन्टरनेट होना था वहां अब जिओ और एयरटेल के महंगे नेट कनेक्शन लेने को मजबूर हैं। सोतई के प्रवीण ने बताया कि जिस लाइन मैन का नंबर उन्हें बीएसएनएल की ओर से मिला था वो खुद मूलभूत सुविधाओं के अभाव में मारा-मारा फिरता था तो प्रवीण की समस्याओं का क्या निदान करता। बीएसएनएल में 10-10 दिन बाद जा कर शिकायतें दर्ज होती हैं तो सेवाओं के मिलने की बात ही दूर है।

25 अक्टूबर साल 2011 में मनमोहन सरकार ने नेशनल ऑप्टिकल फाइबर नाम से इस योजना को लॉन्च किया और 2013 तक 3 लाख किलोमीटर ऑप्टिकल फाइबर बिछाने का लक्ष्य रखा। असलियत में मनमोहन सरकार 2014 तक सिर्फ 350 किलोमीटर तक ही फाइबर बिछा सकी और योजना की मियाद 2015 तक बढ़ी। पर अब सत्ता में मोदी सरकार बैठी थी और उसने भाजपा की अपनी ‘नया नामकरण’ योजना के तहत इसका नाम बदल कर ‘भारतनेट योजना’ कर दिया।

भारतनेट योजना के दूसरे चरण की शुरुआत नवम्बर 2017 में हुई जिसकी मियाद मार्च 2019 रखी गई। इस बार इसमें जिओ, एयरटेल, आइडिया जैसे निजी खिलाड़ी भी शामिल हो गए। अब 2020 में मोदी जी ने योजना को नया बता कर तीन साल और आगे खिसका दिया। इतने वर्ष में योजना में हुआ यही है कि बीएसएनएल के नाम से सेवाओं को बर्बाद कर उसकी साख को गिराया फिर दूसरे चरण में बीएसएनएल को कलंक बता जिओ जैसी निजी कंपनी को घुसाया और अब शर्तिया तीसरे चरण में बीएसएनएल को निकाल बाहर किया जाने के बाद बेच दिया जाएगा। और इस तरह भारतनेट परियोजना का नया नामकरण होगा ‘मुकेश अम्बानी भाई परियोजना।

 

 

 

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